लतीफों से परे सचिन और रेखा


27 अप्रैल 2012
संपादकीय
राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर को मनोनीत करने का यूपीए सरकार का फैसला रेखा और जया के लतीफों में डूबकर रह गया। लेकिन कुछ लोगों ने यह सवाल जरूर उठाया कि सचिन तेंदुलकर का सम्मान किया जाना तो ठीक है, उन्हें राज्यसभा में क्यों भेजा जा रहा है। इस मामले को देखने के दो नजरिए हो सकते हैं। एक तरफ जब झारखंड में राज्यसभा चुनाव को अरबपति करोड़ों खर्च करके इस तरह खरीद रहे हैं कि देश में पहली बार चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनावों को वहां पर रद्द कर दिया। तब दूसरी तरफ देश के सबसे लोकप्रिय खिलाड़ी, और अब तक विवादहीन भी रहे हुए सचिन तेंदुलकर का राज्यसभा जाने का हक एक खिलाड़ी की हैसियत से तो बनता है और इसके पहले भी देश की इस उच्च संसद में खिलाड़ी मनोनीत हुए हैं। अब सवाल यह है कि कोई चित्रकार, कोई संगीतकार, कोई गीतकार और कोई गायक या खिलाड़ी जब राज्यसभा में जाते हैं, और ये राज्यसभा में प्रतिभावान लोगों के लिए रखी गई अलग सीटों पर जाते हैं तो क्या उसका देश की संसद को कोई फायदा होता है या फिर वे एक सम्मान देने के लिए इस सदन में भेज दिए जाते हैं? हम बहस के लिए यह भी मान लेते हैं कि सचिन तेंदुलकर राज्यसभा की चर्चा में हो सकता है कि कुछ अधिक जोड़ नहीं पाएं और हो सकता है कि वे मकबूल फिदा हुसैन की तरह वहां पर चित्र बनाने जैसे किसी काम को करते बैठे रहें, लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्यसभा में सारे ऐसे ही लोग भेजे जाते हैं जो कि वहां कि बहस में कुछ जोड़ते हों? हमने इसी सदन में समाजवादी मुलायम सिंह यादव के भेजे हुए देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक अनिल अंबानी को देखा, समय-समय पर समाजवादी पार्टी या झारखंड मुक्तिमोर्चा की तरफ से वहां रहस्यमय तरीके से पहुंचने वाले अरबपतियों को देखा, विजय माल्या जैसे विवादास्पद खरबपति को देखा, और भी किस्म-किस्म के लोगों को वहां देखा जिन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में शायद ही किसी बहस में शायद ही कुछ जोड़ा। इसलिए संसद का यह उच्च सदन सिर्फ काम करने वाले लोगों को देखने के लिए नहीं जाना जाता है। और राष्ट्रपति के कोटे की कही जाने वाली, लेकिन हकीकत में केंद्र सरकार द्वारा तय की जानी वाली इन सीटों पर मोटे तौर पर एक सम्मान के लिए लोगों को पहले भी लाया जाता रहा है, और उसी दौरान कभी-कभी ऐसे लेखक-पत्रकार भी इस कोटे से राज्यसभा में पहुंचे हैं जिन्होंने वहां बहुत कुछ कहा भी है।
यह समझने की जरूरत है कि ब्रिटेन से ली हुई इस संसदीय प्रणाली में उच्च सदन की कल्पना ऐसे लोगों के लिए की गई थी जो कि खुरदुरे चुनावों को लड़कर और जीतकर कभी संसद नहीं पहुंच सकते। ऐसे रचनात्मक और कल्पनाशील, प्रतिभावान और हुनरमंद विशेषज्ञों को यहां लाने का एक यह मकसद भी रहते आया है कि उनकी खूबियों का थोड़ा बहुत जितना भी फायदा सदन को मिल सके वह मिलना चाहिए। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था जिस तरह राजशाही और सामंती है उसके चलते वहां पर कुछ खानदानी लोगों को सीधे संसद में पहुंचाने का भी यह एक चक्कर था जो कि भारत में खानदानी तो नहीं रह पाया लेकिन यह किसी भी तरह की प्रतिभा न रखने वाले नेताओं के लिए भी बिना चुनाव यहां पहुंचने का एक जरिया बना दिया गया। चुनाव हारे हुए लोग, चुनाव न लड़ पाने लायक लोग बिना मेहनत अपनी पार्टी की मेहरबानी से राज्यसभा में पहुंचते आए हैं और बहुत से मनोनयन यहां पर अलग-अलग पार्टियों ने ऐसे किए हैं जिनसे कि इस सदन की इज्जत कम हुई है। आज सचिन तेंदुलकर या फिल्म अभिनेत्री रेखा के मनोनयन से कम से कम ऐसी नौबत तो नहीं आई है। रेखा के बारे में यह मजाक चारों तरफ जरूर चल रहा है कि अमिताभ और जया से हिसाब चुकता करने के लिए कांगे्रस ने 'उसेÓ भी यहां भेज दिया है ताकि पूरे कार्यकाल जया बच्चन का मुंह कड़वा रहे। लेकिन इस निजी चर्चा से परे हकीकत तो यह है कि रेखा को अपने अभिनय के लिए देश के सारे बड़े पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। इसी तरह सचिन तेंदुलकर कोई बेजुबान पुतले जैसे नहीं हैं और अपने लंबे-लंबे इंटरव्यू के अलावा भी वे हर मैच के बाद में अपनी बात को तर्कसंगत और प्रभावशाली तरीके से रखते आए हैं। इसलिए हम इस बात को लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं हैं कि सचिन को राज्यसभा में लाकर कांगे्रस पार्टी उनकी लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुना रही है। यह मौका तो भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के पास महाराष्ट्र में हमेशा से रहा है कि वे जब चाहते तब सचिन को अपनी तरफ से मनोनीत करके राज्यसभा भेज सकते थे। इसलिए सचिन पर बहस और रेखा पर लतीफे, इन दोनों को हम एक बहुत हल्की मजाक के लायक मानते हैं और इन दोनों को हम इस सदन में इस कोटे के तहत मनोनयन के लायक समझते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें