21 अप्रैल 2012
संपादकीय
सिविल सर्विस दिवस पर प्रधानमंत्री ने देश के आला अफसरों से कहा है कि वे फैसले लेने में न हिचकें। अगर बिना किसी दुर्भावना के उनके फैसलों में कोई गलती हो जाती है लेकिन उनकी नीयत ठीक रहती है तो सरकार उन्हें बचाने का ध्यान रखेगी। उन्होंने यह भी कहा कि नौकरशाहों के किसी तरह के राजनीतिक दबाव में नहीं आना चाहिए। और साथ ही भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर किसी सरकारी अफसर को नहीं फंसाना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह बयान देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु के बयान के बाद आया है। दरअसल, बसु ने शुक्रवार को बयान दिया था कि देश में बढ़ रहे घोटालों की वजह से नौकरशाह फैसला लेने से हिचकते हैं।
मनमोहन सिंह आज पता नहीं किस नैतिक साहस के साथ ऐसी बात कह पाए होंगे। यह भी हो सकता है कि उन्हें ऐसा लिखकर दे दिया गया हो और उन्हें सामने खड़ा करके उनके जैसी आवाज में किसी और न ऐसी बातें कही हों। क्योंकि कोई भी शरीफ और ईमानदार इंसान मनमोहन सिंह की जगह रहते हुए आज इतनी बड़ी-बड़ी बातें तो कह नहीं सकते। और यह पूरा सिलसिला ऐसी शर्मनाक नौबत में आकर खड़ा हो गया है कि दिल्ली अब यह चर्चा है कि केंद्र सरकार को कुछ ताकतवर मंत्री पार्टी हाईकमान से कह चुके हैं कि उन्हें संगठन में कोई महत्वपूर्ण जगह दे दी जाए और वे सरकार में नहीं रहना चाहते। हम आज फिर यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी के बारे में लिखना नहीं चाहते जो कि आज भी कतार में सबसे आगे हैं, आलोचना पाने के लिए। लेकिन आज का मौका देश में नौकरशाह कहे जाने वाले अफसरों पर बात करने का है, जो कि सचमुच एक तनाव से गुजर रहे हैं।
दरअसल भारतीय नौकरशाही की सारी ट्रेनिंग और सोच जिस तरह से ढली है, वह देश के आज के मौजूदा, कुछ अधिक, पारदर्शी और जवाबदेह माहौल के साथ फिट नहीं बैठ रही है। सूचना के अधिकार के आने के बाद, अदालतों के सक्रिय हो जाने के बाद, और भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं या जांच एजेंसियों के अधिक ताकतवर हो जाने के बाद अब सरकारी अफसरों पर एक यह तलवार तो टंग ही गई है कि उनके फैसले के पीछे कोई बेईमानी या बदनीयत तो नहीं है। मनमोहन सिंह इस सरकार के मुखिया रहते हुए इस देश के आखिरी के सौ-दो सौ लोगों में आने चाहिए जिन्हें कि अफसरों को कोई नसीहत देने का हक हो। येदियुरप्पा और मायावती, राजा और कलमाड़ी जैसे चुनिंदा सौ लोगों को जितनी मसीहाई नसीहत देने का हक होना चाहिए, गले-गले तक भ्रष्ट यूपीए के मुखिया होने के नाते मनमोहन सिंह को भी करीब-करीब उतना ही हक मिलना चाहिए। इसलिए आज जब वे इस बात को कह रहे हैं तो हमारा अंदाज यह है कि इस देश के ईमानदार और काबिल नौकरशाह एक बहुत बड़ी हिकारत और नफरत के साथ इस बात को पढ़ रहे होंगे। यूपीए के भीतर कांगे्रस और उसके कुछ भागीदार दलों ने मिलकर जिस तरह से देश को लूटा है, वह अभूतपूर्व तो है ही, ऐतिहासिक भी है। जिस तरह आपातकाल में कांगे्रस को लोकतंत्र की हत्या का एक दाग बची पूरी जिंदगी के लिए दिया था, उसी तरह सरकार की बेईमानी का इस बार का मिला हुआ दाग मानो मतदान की स्याही से यूपीए, और खासकर कांगे्रस के माथे पर लगा है, जो कि मिटने वाला नहीं है, और ऐसे में अफसरों को नसीहत देना परले दर्जे की बेशर्मी ही है।
जहां तक भारत में अफसरों का सवाल है, तो बड़े अफसरों के बारे में देश की जनता का दो तरह का अनुभव है। एक तरफ तो मनमोहन सिंह जैसे लोग अफसरों को हौसले के साथ फैसले लेने को कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के बहुत से नेताओं का यह मानना है कि नौकरशाह दर्ज में आने वाले बड़े अफसरों का हौसला इतना अधिक होता है कि वे निर्वाचित लोकतंत्र पर हावी हो जाते हैं, और बहुत से राज्यों में कुछ सरकारों के बारे में समय-समय पर ऐसी बातें कही जाती हैं कि सरकार पर नौकरशाही हावी है। खासकर जो राजनीतिक दल विपक्ष में रहता है वह इस बात को एक मुद्दा भी बनाकर चलता है। इस बात में कई जगहों पर बहुत सच्चाई होती है और कई जगहों पर निर्वाचित नेता अपने जिम्मे के नीतियों के काम को छोड़कर जब ठेका और तबादलता उद्योग की प्राइवेट पै्रक्टिस शुरू कर देते हैं, तो उनके अफसर लोकतंत्र को चलाने का बोझ उठाते हुए उन पर हावी भी हो जाते हैं। कहीं-कहीं इन दोनों तबकों के काबिल और बेईमान होने से यह पै्रक्टिस एक भागीदारी फर्म की तरह चलने लगती है, और हमारे लिए यह सोच पाना खासा मुश्किल है कि इसका हौसला और बढ़ जाएगा तो जनता का क्या होगा? आला अफसरों में एक तबका ऐसा भी है जो बहुत काबिल है, बहुत ईमानदार है और उसका अक्सर कुछ बिगड़ नहीं पाता। भारतीय शासन और प्रशासन व्यवस्था में पूरी तरह से ईमानदार का कुछ बिगाड़ पाना थोड़ा मुश्किल ही होता है। वे ही लोग तलवार के नीचे खड़े होते हैं जो कि कुछ कमजोर होते हैं, और जिनमें कुछ या अधिक कमजोरियां होती हैं।
हम आज के इस सिविल सर्विस डे पर अफसरों के भीतर अधिक हिम्मत की जरूरत को किसी अहमियत का नहीं मानते। भारतीय संसदीय लोकतंत्र में अफसरों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सरकार के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों का संतुलन बहुत अच्छे से बना हुआ है। जब तक इनमें से किसी एक तबके, या दोनों ही तबकों के भीतर कोई बदनीयत न हो, जब तक किसी का अहंकार उसे तानाशाह सा न बना दे, जब तक सत्ता की नीतियां सरकार का बेजा इस्तेमाल करने पर उतारू न हो जाएं, तब तक किसी अतिरिक्त साहस की जरूरत अफसरों को नहीं है। और जिस तरह से सरकार के दूसरे तबके काम करते हैं, उसी तरह से बड़े अफसरों को भी काम करते रहना चाहिए, और उनके लिए किसी अलग साहस की जरूरत क्यों होना चाहिए।
वैसे आज का दिन और आज का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण, देश के लोगों में साहस पैदा करने के लिए एक बड़ी मिसाल है, कि किस तरह यूपीए सरकार का मुखिया भी आज नसीहत का साहस दिखा सकता है।

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