संपादकीय
12 अप्रैल 2012
दिल्ली में नगर निगम चुनावों में एक वार्ड के भाजपा पार्षद, अपनी पार्टी के एक नेता की हत्या के आरोप में गिरफ्तार हो गए। बताया जाता है कि मरने वाले को इस भाजपा ने इस पार्षद के मुकाबले इस वार्ड से टिकिट देने से इंकार कर दिया था। भाजपा के लिए यह घटना सियासी तौर पर इसलिए ज्यादा मुश्किलें खड़ी करने वाली है कि हत्या के दिन ही उसने आने वाले बरसों के लिए विजन 2025 दस्तावेज जारी करते हुए। सत्ता में आने पर एक भयमुक्त,और सुरक्षित दिल्ली का वायदा किया था। यह वायदा पार्टी ने तब किया है जबकि, चुनाव और प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं पर नजर रखने वाली एक संस्था के मुताबिक, उसने सबसे बड़ी तादाद में आपराधिक रिकार्ड वाले उम्मीदवारों को टिकिटें दी हैं। अब इस घटना के बाद चूंकि उसने हत्या के आरोप में पकड़ाए अपने पार्षद और उम्मीदवार को फौरन पार्टी से निकालने से मना कर दिया है, उसके दो उम्मीदवार जेल की सलाखों के पीछे से चुनाव लडेंग़े। एक, वार्ड चुनाव में टिकिट के लिए उससे मुकाबला करने वाले साथी नेता की हत्या के आरोप में, तो दूसरा दिल्ली बम धमाके के शामिल होने के आरोप में दिल्ली नगरनिगम चुनावों में टिकिट बंटवारे के मुद्दे पर भाजपा में बहुत हंगामा और असंतोष हुआ, और इसने बगावत करने वाले कई नेताओं को निष्कासित भी किया। लेकिन दिल्ली के संगम वार्ड के इन दो नेताओं का किस्सा चुनाव में टिकिट न मिलने पर नाराजगी जितनी छोटी बात नहीं है। एक वार्ड में हो रहे चुनाव के टिकिट न मिलने पर इतनी नाराजग़ी, और जताई गई नाराजग़ी का ऐसा जवाब बहुत कुछ कहता है। यह घटना हमारे समाज का आईना है जिसमें मुकाबले में जीत या हार, मुकाबले से भी ज्यादा अहम हो चुकी है, जिसमें जीत के लिए किसी भी हद तक जाने को लोग तैयार दिखते हैं। बात- बात को हार-जीत का मुद्दा बनाने की बहुत सी घटनाएं पिछले कुछ दिनों में हमने देखी,जिनमें औरतों को नंगा करके घुमाने, उनके बाल मुंडाकर घुमाने, चुनाव में समर्थन नहीं करने पर मकान गिरा डालने , नकल नहीं करने देने वाले शिक्षकों की हत्या, या उनका सिर फोडऩे जैसी बातें हुईं। इनमें से कौन सी घटना ज्यादा गम्भीर है, नहीं कह सकते, लेकिन दिल्ली की घटना इसलिए बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है, कि ऐसे तमाम दुस्साहसों से बच निकलने में मदद करने वाली सियासी ताकत पाने, और उसे बचाए रखने की जि़द में यह घटना हुई। इस तरह के जुर्म कर के भी बेखौफ जीने की चाभी जो सियासी ताकत है, उसके झगड़े में एक ने जान गंवाई और दूसरा जान लेने के इल्ज़ाम में जेल गया है।
पहला सवाल तो यह कि वार्ड के चुनावों तक के लिए लोगों में इतना आग्रह क्यों है? यह तो सुनने में आता रहा है कि पंजाब जैसे सम्पन्न राज्य में, चुनावी टिकिट पाने के लिए लोग करोड़ों रुपये तक खर्च करने को तैयार रहते हंै और खर्च करते भी हैं। यह भी समझ में आता है कि यह करोड़ों रुपयों का निवेश किस किस तरह से कैसे-कैसे गलत काम कर के वसूला जाता है। पिछले दिनों एक सूचना अधिकार याचिका के जवाब में राज्य सभा ने बताया कि उसकी कई समितियों में ऐसे सदस्य है, जिनके अपने फूलते पनपते व्यवसाय है और समितियों में उनके मतों से लिए गए फैसले उनके व्यावसायिक हितों को प्रभावित करते हैं, लेकिन फिर भी ज्यादातर सदस्यों ने नैतिकता के आधार पर खुद को ऐसी समितियों से अलग नहीं किया। उल्टे यह देखने में आया कि कुछ सांसदों ने अपने फायदों, और अपने व्यावसायिक प्रतिस्पर्धियों के नुकसान के लिए समिति या सदन में अपने मत का इस्तेमाल किया। व्यावसायिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों की कानून बनाने वाले सदनों में पहुंचने की कोशिश की वजह इससे पता चलती है। झारखंड में एक एन आर आई व्यापारी की राज्यसभा में पहुंचने की कोशिश के चलते जैसा कीचड़ उछला, वह बेवजह नहीं था, उसकी जद में यही रजनीतिक ताकत थी जिसे हथियाना आज बहुतों को इतने काम का लग रहा है कि इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। वहीं दिल्ली की घटना बताती है कि देश का ऊपरी सदन कहलाने वाली राज्य सभा से यह रेला बहकर वार्डों के चुनावों तक पहुंच चुका है ,जहां अब लाखों करोड़ों रुपये खर्च करने की बातें देखने में आती हंै। छत्तीसगढ़ में भी एक वार्ड के चुनाव पर 50 लाख से एक करोड़ रुपये तक खर्च करने की खबर सुनने में आई थी।
आखिर इतने छोटे चुनावों पर इस तरह जान की बाजी, राजनीतिक भविष्य की बाजी, और इतना रुपया किस उम्मीद से लगाया जाता है? जाहिर है उसे कई गुना वापस वसूलने की उम्मीद से। पार्टियां भी अपने नारों, सिद्धांतों को ताक पर रखकर प्रत्याशियों को टिकिट चुनाव जीतने की उनकी क्षमता के मद्देनजर ही क्यों देती हंै? उन्हें जीत के बाद अपनी राजनीति अस्मिता के बदले किस वसूली की उम्मीद होती है, यह सोचने की बात है। अकेले भाजपा की ही बात नहीं है,उत्तर प्रदेश में हाल में हमने देखा कि समाजवादी पार्टी ने टिकिट बांटते समय साफ छवि की हिमायत का ढोंग करते हुए डी पी यादव की टिकिट काटी, और मंत्री पद देने का समय आया तो राजा भैया के हाथों जेल महकमा सौंप दिया। सियासत में ऐसे निवेश और फैसले किस तरह के फायदे पाने और अहसान चुकाने के लिए किए जाते हंै? सता की ताकत कैसी है, यह हम उत्तर प्रदेश में आजकल देख रहे हंै,जहां एक बार जीत जाने के बाद समाजवादी पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं को न कानून का खौफ रह गया है , न जनता की शर्म, आखिर कौन सी ताकत है जिसके दम पर इतनी हिम्मत आ जाती है? इस ताकत के दम पर कहां-कहां, और कैसे-कैसे गलत काम किए जाते हंै? क्या कोई भी गलतकाम कर के बेदाग बच निकलने की यह ताकत ही है कि लोग आज तमाम बदनामी के बावजूद सियासत का पेशा अपना रहे हंै? आज तक सियासी भीड़ में खुद को अलग बताती, शुचिता की बातें करती भाजपा , या समाजवाद के नाम पर खड़ी हुई समाजवादी पार्टी या दलितों के उद्धार के लिए बनाई गई बहुजन समाज पार्टी से लेकर हर कहीं,सब करोड़ों रुपये खर्च कर के चुनाव जीतने के इस खेल को बढ़ावा दिया है।
चुनावी प्रक्रिया को अपराध से आजाद रखने के लिए जब तक कोई कारगार तरीका नहीं अपनाया जाता तब तक न राजनीति का अपराधीकरण खत्म होगा, न ही ताकत पाने के लिए टिकिट की यह दौड़ थमेगी, न ही इस दौड़ का ईनाम वसूलने का भ्रष्टाचार। पद से जुड़े फायदों की लालसा ही वह बात है जो लोगों को किसी भी कीमत पर टिकिट पाने , टिकिट पा जाने के बाद चुनाव जीतने, को उकसाती है, और एक बार कहीं से चुन लिए जाने पर उस चुनाव क्षेत्र को अपने कुनबे की जागीर में शामिल करने की वासना भी यही सियासी ताकत, और उसके फायदों से जुड़े लालचों के चलते जागती है। यह एक विष चक्र है जिसने हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था को जकड़ लिया है जिसमें बेसहारा जनता का दम घुटना तय है। जो माया और उनके घोटालेबाज मंत्रियों की जकड़ से खुद को छुड़ाती है, तो मुलायम अखिलेश और राजाभैया के चंगुल में फंस जाती है। आज खबर है कि जब मध्य प्रदेश के बैगा आदिवासियों ने अपने पेड़ों की रक्षा के लिए वन विभाग के खिलाफ तीर कमान उठा लिए हंै, तब अधिकारी उन्हें छत्तीसगढ़ के वामपंथी उग्रवादियों का बरगलाया हुआ कह रहे हैं। लेकिन गरीब बेबस जनता को हथियार उठाने से रोकने के लिए यह दलील बहुत बोगस और बेदम है। इसका जवाब हमारी राजनीतिक और चुनावी व्यवस्था में खोजने, और उसका उपाय करने से ही मिलेगा।

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