04 मई 2012
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के चुनाव में बुरी तरह फ्लॉप हो जाने के बाद कई हफ्ते गुजर गए और आज उमा भारती की एक खबर आई। उत्तर-भारत में लाखों आस्थावानों से सैकड़ों करोड़ रुपए इक_े करने वाले और चालीस टेलीविजन चैनलों पर अपना प्रचार करने वाले निर्मल बाबा पर इन दिनों मीडिया में चल रहे हमले के खिलाफ उमा ने कहा कि अगर आस्था से लोगों की दिक्कतों का समाधान या उनका इलाज करने पर किसी कानून के तहत कोई कार्रवाई होनी है तो फिर दक्षिण भारत में इसी तरह से काम करने वाले एक ईसाई प्रचारक पर भी कार्रवाई हो।
उनकी बात में एक हद तक तर्क है कि आस्था को लेकर लोगों को बेवकूफ बनाने का काम कोई करता है तो धर्मों से परे सभी पर बराबर कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ एक बात यह है कि निर्मल बाबा के नाम से जो आदमी सैकड़ों करोड़ रुपए आस्था की मार्केटिंग से जुटा चुका है, वह पैसा जुटाना एक अलग किस्म का मुद्दा है और आस्था के नाम पर किसी धर्म की चंगाई सभा या उसका कोई और आयोजन एक अलग मुद्दा है। अगर निर्मल बाबा रुपयों के इस कारोबार को न करके सिर्फ आस्था-चिकित्सा करते या आस्था-समाधान करते तो वे बहुत से दूसरे ऐसे लोगों की तरह बिना विवाद के बचे रहते। लेकिन उन्होंने भारत की बैंकों का इस्तेमाल करके एक चतुर कारोबारी के अंदाज में जिस तरह से पैसे इक_े किए और सैकड़ों करोड़ का जैसा निजी इस्तेमाल किया वह एक अलग मुद्दा है। और हिंदू या ईसाई धर्म से परे जो कोई पैसों का इतना बड़ा कारोबार कर रहा है वह भारत के कुछ कानून के प्रति जवाबदेह तो है ही।
उमा भारती अपनी निजी राजनीतिक और साम्प्रदायिक विचारधारा के तहत निर्मल बाबा के मुद्दे पर ईसाईयों पर हमले करने का एक तर्क पाकर आज खबरों में हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि पैसों का ऐसा कारोबार किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति भी करता है तो उस पर भी ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन अगर कोई बिना पैसों के यह काम कर रहा है तो उसे निर्मल बाबा जैसे के साथ कैसे गिना जा सकता है? लेकिन आज का सवाल उमा भारती का भी नहीं है। इस देश की आबादी में कमसमझ लोगों का एक काफी बड़ा हिस्सा है जो कि बाबाओं के चक्कर में अपना पैसा और वक्त दोनों बर्बाद कर रहा है। ऐसे लोगों के बीच अगर 21वीं सदी में भी तर्कशक्ति विकसित नहीं हो पाई है, अंधविश्वास उनसे अलग नहीं किया जा सकता है, जिनमें लगातार बेवकूफ बनने की अंतहीन हसरत है, तो समाज की यह हालत सोचने लायक है। और फिर इसी समाज से सरोकार का दावा रखने वाले मीडिया की यह हालत भी सोचने लायक है जिसके चालीस चैनल इस बाबा को घंटों दिखाकर करोड़ों की कमाई करते हैं। आज जब इसके खिलाफ देश भर में कानूनी कार्रवाई शुरू हो रही है तब भी ये चैनल लगातार इस प्रचार में लगे हैं, जबकि अरबपतियों के ऐसे चैनल अपनी मर्जी से ऐसे किसी विवादास्पद प्रसारण की मनाही करने के लिए आजाद भी हैं। हमारा यह मानना है कि जिस तरह बहुत से जालसाजी के इश्तहार मीडिया में सोच-समझकर छपते और प्रसारित होते हैं, जबकि पहली नजर में ही वे धोखेबाजी के दिखते हैं, वैसे ही निर्मल बाबा के विज्ञापन सारे शक के बावजूद इस तरह से घंटों चैनलों पर दिखाए जाते हैं जिनसे लोग धोखा खाते हैं। इतने विवाद के बावजूद इस वक्त हमारे सामने टीवी के परदे पर जो प्रसारण निर्मल बाबा का चल रहा है उसे विज्ञापन बताने वाले चार अक्षर अंगे्रजी के हैं, जिनको बहुत सी आबादी पढ़ भी नहीं सकती। एक हिंदी के प्रसारण में विज्ञापन की सूचना अंगे्रजी के संक्षिप्त अक्षरों में देना हमारे हिसाब से जालसाजी का एक हिस्सा ही है।
भारत में जिन लोगों को पाखंड के खिलाफ समझ है, उन लोगों को ऐसे मौके पर अपने आसपास के दायरे को खुलकर जागरूक करने का जिम्मा निभाना चाहिए क्योंकि जो समाज अवैज्ञानिक, अंधविश्वास पर भरोसा करके चलता है वह अपने समझदार लोगों के लिए भी कई तरह के खतरे वाला रहता है।

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