07 मई 2012
संपादकीय
कल रात से टीवी पर फिल्म अभिनेता आमिर खान का कोई एक शो सत्यमेव जयते शुरू हुए है और इसे लेकर मीडिया, इंटरनेट और लोगों के बीच एक खलबली सी मची दिख रही है। इस कार्यक्रम के बारे में अभी हमने जितना सुना है उसके मुताबिक यह भारत के कुछ मुद्दों को लेकर बना है जिनमें सबसे अधिक चर्चा कन्या भू्रण हत्या के बारे में आमिर खान की कही बातों पर सबसे अधिक हो रही है। कल सुबह ही हमने कन्या भू्रण हत्या के मुद्दे पर इसी जगह लिखा था और समाज से उम्मीद की थी कि उसके बीच के लोग अजन्मी और जन्मी बच्चियों को बचाने के लिए कोशिश करें। रात होते-होते आमिर खान एक आदर्श की तरह, मिसाल की तरह और मार्गदर्शक की तरह लोगों को लगने लगे।
हम अभी इस कार्यक्रम या इस अभिनेता और अब शायद टीवी प्रस्तुतकर्ता के बारे में कुछ कहना नहीं चाहते लेकिन भारत की इस नौबत की चर्चा करना चाहते हैं जिसमें एक अभिनेता अचानक देश के मार्गदर्शक की तरह एक घंटे में ही लोगों को कम से कम आज तो लगने ही लगा है। एक फिल्म अभिनेता से आमतौर पर ऐसे किसी बहुत व्यापक असर की उम्मीद आमतौर पर नहीं की जाती जिसमें कि समाज के बहुत ही गंभीर मुद्दों पर बात की गई हो। लेकिन कुछ तो अपनी फिल्मों की कहानियों में और कुछ फिल्मों से परे अपने बयानों से इस कलाकार ने अपनी एक ऐसी तस्वीर लोगों के बीच बनने दी है जो कि एक अभिनेता से कुछ हटकर है और असल, कड़वे मुद्दों की चर्चा करने वाली भी है।
जिन लोगों का काम राजनीति और सार्वजनिक जीवन, सरकार में और जनआंदोलनों में रात-दिन काम करना है, उनसे परे का एक व्यक्ति अगर घंटे भर में ऐसी हलचल खड़ी करता है तो एक तो वह समाज में लीडरशिप के स्तर पर एक अविश्वास और शून्य दोनों का संकेत है, दूसरी तरफ यह एक ऐसी संभावना का सुबूत भी है कि समाज में पे्ररणास्रोत बनने के लिए चुनाव लडऩा जरूरी नहीं होता और न ही किसी ओहदे पर आना जरूरी होता। ऐसा काम बीच-बीच में कुछ सामाजिक आंदोलनकारियों ने भी किया और अपने उबाल के कुछ महीनों में बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक बहुत से लोग देश में एक पे्ररणास्रोत की तरह सामने आए और फिर वे भाप की तरह कहीं खो गए। लोकतंत्र के सामाजिक जीवन में हम किसी भी किस्म के सकारात्मक पे्ररणास्रोत को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि भारत जैसी चुनावी राजनीति में और यहां के लोकतंत्र के पतन के चलते सत्ता से जुड़े लोग विश्वसनीयता खो बैठे हैं। इसलिए राजनीति और सत्ता से दूर के कुछ लोग अगर सामने आकर लोगों को झकझोर सकते हैं तो यह एक बड़ी संभावना है और इसकी कोशिश की जानी चाहिए। दूसरी तरफ हमारा बहुत बुरा अनुभव ऐसी संभावनाओं के साथ यह रहा कि ये कई किस्म के विवादों से घिरकर तेजी से हवा में घुल जाती हैं, और उस किस्म का मूर्तिभंजन लोगों के विश्वास को हिलाकर रख देता है। बाबा और अन्ना ने पिछले एक-दो बरस में इस देश का सबसे बड़ा नुकसान यह किया है कि उन्होंने सामाजिक आंदोलनों की विश्वसनीयता खत्म करने के बहुत से काम किए और आज उनके पीछे गिनती के लोग खड़े हैं क्योंकि उनके सामने मीडिया के कैमरे खड़े हैं।
जब पे्ररणास्रोतों का अकाल पड़ा हुआ हो और सामाजिक खामियों की फसल लहलहा रही हो तब चाहे किसी इंसान की शक्ल में या किसी टीवी कार्यक्रम की शक्ल में, या फिर किसी और आंदोलन की शक्ल में, जिस तरह से भी लोगों के बीच निराशा को कम करके, बेइंसाफी को कम करके मानवीय कहे जाने वाले मूल्यों को बढ़ावा देने का काम हो सके, वह बात बहुत मायने रखती है। हम किसी एक कलाकार या किसी एक टीवी कार्यक्रम की कामयाबी को लेकर फिक्रमंद नहीं हैं, लेकिन अगर इस बहाने लोगों के बीच कोई अच्छी चर्चा होती है जिससे कि समाज की बुरी बातें कम हो सकें, कुछ बच्चियों की हत्या कम हो सके, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। तकलीफ की बात यह है कि जो नेता रात-दिन मुफ्त में खबरों में जगह पाते हैं, वे या तो ऐसी महीन बातों को मुद्दा बनाकर कोई आंदोलन छेडऩा वोटों के फायदे का नहीं पाते, या फिर उनकी इतनी विश्वसनीयता नहीं रह गई है कि वे किसी नैतिक वजन के साथ नसीहत की कोई बात कहें।
कुल मिलाकर विश्वसनीयता की कंगाली के बीच अगर कोई एक नौजवान आकर लोगों को हिला रहा है और अच्छाई की तरफ मोड़ रहा है, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?

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