07 मई 2012
दुनिया के बहुत से विश्वविद्यालयों में औद्योगिक घराने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं अलग-अलग किस्म के कोर्स के लिए दान देते हैं। उनकी पसंद के मुताबिक वैसे कोर्स शुरू होते हैं, उनके भीतर के मुद्दे तय होते हैं और स्कॉरशिप दी जाती हैं। दानदाताओं के प्रतिनिधि ऐसे पाठ्यक्रमों को तय करने वाली कमेटियों में भी रखे जाते हैं। मतलब यह कि जैसे-जैसे विश्वविद्यालयों की आर्थिक हालत खराब होती है, सरकार उनका हौसला बढ़ाती है कि वे कहीं से दान जुटाएं, और दानदाता चाहते हैं कि उनकी मर्जी के कोर्स शुरू हों। धीरे-धीरे दुनिया में पढ़ाई ऐसी ही होने लगेगी जैसी कि बाजार चाहेगा। इस तरफ बढऩा शुरू हो चुका है और यह सिलसिला लोगों को एकदम से समझ नहीं आ रहा है। लेकिन अमरीका जैसे बड़े और विकसित देश में यह फिक्र उस जागरूक तबके में हो रही है जो कि वहां की वित्तीय तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर है।
दुनिया की बहुत सी ताकतें अलग-अलग देशों में कई किस्म के आंदोलनों के लिए दान देती हैं। भारत जैसे देश में कई बार यह चर्चा होती है कि यहां के आंदोलनों के पीछे क्या विदेशी हाथ है? और चूंकि इंदिरा गांधी के समय से हर मुसीबत के लिए एक अदृश्य विदेशी हाथ पर तोहमत लगाने की फैशन शुरू हो गई थी इसलिए वह बात विश्वसनीयता खो चुकी है और लोग अब इसे एक सरकारी बहाने की तरह मानते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि दुनिया का बाजार, दुनिया की सरकारें अपने एकाधिकार के लिए, अपने फायदे के लिए जितने किस्म की साजिशें करती हैं, उनके तहत ऐसे आंदोलन तो उनके लिए सबसे सस्ता हथियार रहते ही होंगे। किसी देश में किसी टेक्नालॉजी के खिलाफ आंदोलन करने से कुछ दूसरी कारोबारी ताकतों का भला अगर होता है तो वे दूसरी ताकतें इसके लिए किसी गैरसरकारी संगठन के मार्फत कुछ पैसा क्यों नहीं भेज सकतीं?
देश के भीतर भी पैसों की ताकत वाले लोग अपने विरोधियों के लिए किस तरह की दिक्कतें खड़ी कर सकते हैं यह देखना हो तो हर बरस बहुत से इलाकों में चुनिंदा शराब दूकानों के खिलाफ होने वाले विरोध को देखा जा सकता है जो धूमकेतु की तरह शुरू होते हैं और रहस्यमय तरीके से गायब हो जाते हैं। इसलिए जब तमिलनाडु में परमाणु बिजलीघर के खिलाफ एक विरोध शुरू हुआ और केंद्र सरकार ने उसके पीछे विदेशी पैसों की बात कहते हुए कुछ संगठनों और विरोधियों पर कार्रवाई की, तो मुझे वह पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं लगा। हो सकता है कि सरकार ने एक फर्जी कार्रवाई की हो, लेकिन यह भी पूरी तरह से हो सकता है कि कुछ दूसरी किस्म के बिजलीघर बनाने वाले लोग ऐसे विरोध के पीछे हों जिनका बाजार परमाणु बिजलीघर के आने से खराब होने जा रहा हो। ऐसी कई बातें बाजार की साजिशों के पीछे हो सकती हैं।
पैसों की इस तरह की ताकत दुनिया में चिकित्सा विज्ञान के शोध में आम है। पैसों की ताकत रखने वाले संभावित ग्राहकों की खरीदी को ध्यान में रखते हुए दवा कंपनियां और शोध कंपनियां कुछ गैरजरूरी दवाओं को विकसित करने पर भी बड़ी रकम खर्च करती हैं और गरीब देशों के गरीब लोगों की बीमारियों के लिए बनने वाली सस्ती दवाओं पर रिसर्च के लिए बजट मुश्किल से निकलता है। इसका नतीजा यह होता है कि विज्ञान की शोध और खोज की, आविष्कार की ताकत बाजार की जरूरत के हिसाब से मोड़ दी जाती है, न कि इंसानों की जरूरत के मुताबिक।
बाजार की बढ़ती ताकत के हिसाब से अब अलग-अलग देशों में हमलों की जरूरत खड़ी की जाने लगी है, झूठे सुबूत गढ़कर किसी देश पर हमला किया जाने लगा है क्योंकि उससे हथियारों के कारखानेदारों के टकसाल चलते हैं। और किसी देश को तबाह करने के बाद वहां पर दुबारा बसाहट के नाम पर अमरीका जैसे देश की कंपनियां खरबों का भ्रष्टाचार करती हैं और वैसी कंपनियां वहां के राजनीतिक दलों के या तो पहले, या बाद में दान देती हैं। इसलिए बाजार की हिंसा इस हद तक बढ़ चली है कि दुनिया पर खतरा पैदा करके, जंग छेड़कर बाजार अपना कारोबार बढ़ाता है। यह कुछ उसी किस्म का है कि किसी कब्रिस्तान का मजदूर लोगों की मौत का सामान करने लगे ताकि उसका खुदाई का काम बढ़ता चला जाए।
जिन लोगों ने हिंदुस्तान में अभी तक यह महसूस नहीं किया है कि यहां का ताकतवर और बड़ा कारोबारी मीडिया किस तरह जनहित के मुद्दों को एक गढ़ी हुई जनरूचि के मुद्दों से दबाते चल रहा है, उन लोगों को तब समझ में आएगा जब उनके दिल-दिमाग पर मीडिया इसलिए जख्म पैदा करने लगेगा कि उससे मरहम के इश्तहार बढ़ेंगे। आज भी मीडिया भारत में जिस तरह गैरअखबारनवीसी के कामों में लग गया है वह अपने-आपमें भयानक है।
दुनिया पैसों की साजिश की शिकार होकर अब जिस तरफ बढ़ चली है उससे किसी वापिसी की उम्मीद मुझको नहीं दिखती क्योंकि भारत में लोकतंत्र के तीनों पाए बाजार की ताकत के सामने या तो खुद होकर बिछ गए हैं या फिर अदालत जैसे मामलों में इंसाफ के पूरे सिलसिले पर पैसों की ताकत से घोषित और अघोषित रूप से असर डालने का काम बाजार कर रहा है। महंगे वकीलों और महंगे विशेषज्ञों की गवाही से लेकर अदालत में कई जगहों पर चलने वाली रिश्वत में भी धनबल का असर बढ़ते चल रहा है। संसद धीरे-धीरे बाजार की पसंद, बाजार की ताकत और बाजार पसंद करने वाले लोगों से भरते चल रही है, भर चुकी है। यही हाल राज्यों में विधानसभाओं का है। मीडिया को भी असंगठित गरीबों के बजाय संगठित और संपन्न ग्राहकों वाले बाजार से जुडऩा फायदेमंद लगने लगा है और अखबार बाजार के प्रचार अधिकारियों की तरह काम करने लगे हैं।
जिस अमरीका में पैसों का दबदबा दुनिया में आज सबसे अधिक हो गया है वहीं पर इस दबदबे के खिलाफ सबसे पहले एक आंदोलन चल रहा है। अमरीकी की वित्तीय राजधानी न्यूयॉर्क की वॉलस्ट्रीट पर कब्जा करने के नारे के साथ लोग सड़कों पर हैं, और इस प्रतीक को बाकी के अमरीका में भी बढ़ाया जा रहा है। भारत में अगर लोकतांत्रिक लोगों में बाजार की साजिशों के खिलाफ जागरूकता नहीं आती है तो फिर ऐसे मुद्दों को उठाने वाले नक्सली ही अपनी ताकत बढ़ाते जाएंगे।
एक वक्त कहा जाता था कि कण-कण में भगवान, वैसा किसी को दिखा हो या नहीं, यह तो नहीं मालूम, लेकिन कण-कण में बाजार तो अब पूरे वक्त दिख ही रहा है।

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