धर्म को सरकारी मदद के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का एक अच्छा फैसला


08 मई 2012
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार द्वारा हज यात्रा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी की आलोचना की है और इसे खत्म करने को कहा है। अपने फैसले में कोर्ट ने हज यात्रियों को टिकट में मिलने वाली छूट के प्रावधान को खत्म कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस (सब्सिडी देने की) नीति को खत्म करना ही ठीक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीर्थ स्थानों पर जाने वाले लोगों को इस तरह की सब्सिडी देना अल्पसंख्यकों को लुभाने के समान है। हालांकि कोर्ट ने हज यात्रा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को खत्म करने के लिए 10 साल की समयसीमा तय की है और कहा है कि इस समयवधि में इसे धीरे-धीरे खत्म किया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने हज यात्रा पर मुफ्त जाने वाले सरकारी अधिकारियों की संख्या में कटौती करते हुए 60-70 से घटाकर 2 कर दिया है।
अल्पसंख्यक धर्मों के धार्मिक रीति-रिवाजों में सरकारी खर्च से अनुदान देने के भारत के संवैधानिक प्रावधान के चलते भारत के संपन्न मुसलमान भी हज जाने के लिए सरकारी अनुदान पा रहे हैं। हम सुप्रीम कोर्ट की इस आपत्ति से पूरी तरह सहमत हैं। पहले भी हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सरकारी पैसों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हालांकि कानून के कुछ जानकार लोगों का यह कहना है कि बहुसंख्यक धर्मों के लिए संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है लेकिन अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के लिए ऐसा इसलिए जरूरी है कि वे भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए भी हैं और बहुसंख्यक समाज की तरह वे अपने धार्मिक कार्यक्रम नहीं कर पाते। 
जब कभी जनता के पैसों से किसी धर्म को बढ़ावा देने की बात आती है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले या धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले देश में राज करने वाली सरकारें अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं के मुताबिक या अपनी-अपनी चुनावी प्राथमिकताओं के मुताबिक खर्च करने में जुट जाती हैं। छत्तीसगढ़ में हम राजिम कुंभ के नाम पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च होते देखते हैं और हिंदू धर्म के कार्यक्रम सरकारी खर्च पर इस राज्य में इतने अधिक होते हैं कि बाकी धर्मों के लोगों को एक शिकायत बनी ही रहती है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के धर्म के लिए सरकारी खर्च की जो बात रखी गई है उसमें यह फेरबदल करने की जरूरत है कि ऐसी कोई भी मदद सिर्फ उसी काम के लिए की जाए जो कि उस धर्म के बहुत गरीब लोगों के लिए जरूरी हो। गरीबी की रेखा के नीचे के किसी इंसान के लिए अगर सरकार हज जाने के लिए कुछ अनुदान देती है तो उसे एक बार समझा जा सकता है। लेकिन बाकी लोगों को, जिनके पास अपने खर्च से हज करने की ताकत है, उनको क्यों सरकार हज कराए? नतीजा यह होता है कि भाजपा के राज वाले छत्तीसगढ़ सहित शायद एक-दो और राज्यों में भी अब मानसरोवर की यात्रा के लिए हिंदुओं को (या शायद सभी को) अनुदान देना शुरू किया गया है। और यह अनुदान सभी आय वर्ग के लोगों को मिल रहा है। अभी एक पखवाड़े पहले ही मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने यह घोषणा की है कि वह सभी धर्मों के बुजुर्गों को सरकारी खर्च पर तीर्थयात्रा करवाएगी। यह पूरा सिलसिला खतरनाक होगा क्योंकि भारत में शहरी संगठित धर्मों के अलावा बहुत से असंगठित धर्म भी हैं और हज की तरह अगर कल कैथोलिक ईसाई वेटिकन जाने के लिए अनुदान मांगने लगेंगे, पारसी लोग ईरान जाने के लिए अनुदान मांगने लगेंगे, यहूदी इजराइल जाने के लिए अनुदान मांगने लगेंगे तो यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा? सरकार को धर्म से अपने-आपको अलग करना चाहिए। जो संपन्न लोग हैं उनको अपनी निजी आस्था के लिए, अपने निजी इलाज के लिए सरकारी मदद क्यों लेनी चाहिए? 
जहां तक मुस्लिमों की मदद की बात है कि वे आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं, कम पढ़े-लिखे हैं, तो उनको सामाजिक संपन्नता में बराबरी की तरफ लाने की कोशिशें होनी चाहिए। एक पुरानी कहावत चली आ रही है कि आप किसी को दान में एक मछली देते हैं तो उसका एक दिन पेट भरता है। और अगर आप उसको मछली पकडऩा सिखाते हैं, तो बची जिंदगी उसका पेट भरता है। अगर एक वक्त संविधान बनाते हुए ऐसी सोच भी थी कि गरीबों को उनके धार्मिक रीति-रिवाज के लिए सरकारी मदद दी जाए, तो भी यह सिलसिला लंबे समय पहले इसलिए खत्म हो जाना था कि किसी एक को जन्नत तक पहुंचाने के लिए जब सरकार हज करवाती है, तो उनकी पूरी बिरादरी बहुत से दूसरे धर्मों की हिकारत झेलते हुए जीते-जी जहन्नुम झेलने को मजबूर होती है। और यह हमारा अकेले का सोचना नहीं है, मुस्लिम समाज ने अदालत में खुलकर यह कहा है कि इसे बंद होना चाहिए, लेकिन वोटों की राजनीति के चलते कोई मछली पकडऩा सिखाना नहीं चाहता, मछली परोसना सब चाहते हैं। 
भारत में अब ऐसा लगने लगा है कि समाज सुधार के फैसले, धर्मांधता के खिलाफ फैसले, जातिवाद के खिलाफ फैसले लेने का काम अकेले सुप्रीम कोर्ट का रह गया है क्योंकि जजों को चुनाव नहीं लडऩा पड़ता। सिलसिला कुछ ऐसा बना हुआ है कि सत्ता हांकने वाले राजनीतिक दल भावनात्मक फैसले लेते चलते हैं और उनको खारिज करने का कड़वा काम अदालत पर छोड़ते हैं। हम न सिर्फ इस हज अनुदान को खत्म करने के खिलाफ हैं बल्कि गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और अगर बाकी और कोई राज्य हैं तो वहां भी, किसी भी तरह की तीर्थयात्रा अनुदान को खत्म करने की कड़ी सिफारिश करते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछली कांगे्रस सरकार के समय से करोड़ों की लागत से जैतखंभ बनना शुरू हुआ है जो कि इस सरकार द्वारा पूरा किया जा रहा है। यह सिलसिला भी इसलिए ठीक नहीं है कि महान संत गुरू घासीदास ने अपनी नसीहतों में जिस सादगी को सिखाया था, और अब तक उनके अनुयायी एक साधारण से जैतखंभ से अपनी धार्मिक मान्यताएं पूरी करते आए थे, उसकी जगह कुतुबमीनार जैसे आसमान छूते जैतखंभ को सरकारी खर्च पर बनाने से इस समाज के लोगों का अलग से कोई भला नहीं होगा, और होना तो यह चाहिए था कि गरीब लोगों वाले इस समाज के आस्था के केंद्र गुरू घासीदास के नाम पर पढ़ाई या प्रशिक्षण के ऐसे केंद्र शुरू होने थे जिनसे कि लोगों का वास्तविक भला होता। किसी भी गरीब तबके को अगर मदद करनी है तो वह शैक्षणिक और आर्थिक मदद होनी चाहिए।
राज्य को अपने-आपको धर्म से अलग रखना चाहिए वरना वह हमेशा भेदभाव के विवादों से घिरा रहेगा। भारत सरकार से लेकर देश के राज्यों तक, हर किसी को सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले से कुछ सीखने की जरूरत है।

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