03 मई 2012
संपादकीय
अगले राष्ट्रपति के लिए कई तरह के नाम हवा में हैं। कुछ लोग मौजूदा उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का नाम ले रहे हैं तो कुछ लोग प्रणब मुखर्जी का। कुछ लोग पहले राष्ट्रपति रह चुके अब्दुल कलाम के नाम को बढ़ा रहे हैं तो कुछ लोग आज के मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी का नाम ले रहे हैं। इन चर्चाओं के बीच आज मुलायम सिंह यादव ने अपनी समाजवादी पार्टी की यह सोच सामने रखी कि राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को ही बनाना चाहिए जिसको राजनीति का अनुभव हो। यह बात एक नजर में हमें ठीक लगती है क्योंकि विज्ञान और तकनीक की दुनिया से आए हुए अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में जिन लोगों ने देखा है उन्हें उनकी सादगी पसंद आई और एक ईमानदार के रूप में उनकी साख भी उन्हें बहुत इज्जत दिला गई थी। गांधी का यह देश एक ऐसी दुर्गति में पहुंच गया है कि ईमानदारी और सादगी एक काबिलीयत गिनी जाने लगी हैं। डॉ. कलाम को लोग इसलिए भी बेहतर समझते थे और समझते हैं कि उनका कोई परिवार नहीं था, उनका कोई खर्च नहीं था, उनकी कोई फिजूलखर्ची नहीं थी, और वे राष्ट्रपति रहते हुए कतार में लगकर वोट डालने पहुंचे थे और अपने कार्यकाल के बाद वे प्रतिभा पाटिल की तरह किसी खास रिहायशी साम्राज्य की हसरत नहीं रखते थे। उनके विदेश प्रवास में किसी ने उनके कुनबे के किसी को नहीं देखा और जब उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तब भी उनके रिश्तेदार दक्षिण भारत से चुपचाप ट्रेन का सफर करके दिल्ली पहुंचे थे और उसके बाद पांच बरस किसी ने उनके घर के किसी की चर्चा भी नहीं सुनी थी। लेकिन उनका पूरा कार्यकाल किसी संवैधानिक संकट के बिना गुजर गया था इसलिए शायद उनके सामने किसी लोकतांत्रिक-संसदीय-संवैधानिक फैसले की दुविधा नहीं आई थी। लेकिन वे गैरराजनीतिक पहले राष्ट्रपति नहीं थे, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी विश्वविद्यालय के क्लास रूम से निकलकर राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे। इसलिए गैरराजनीतिक होने से कोई कमजोर हो जाता हो ऐसा भी हम नहीं मानते। और पांच बरस तक भारत के राष्ट्रपति रहते हुए डॉ. कलाम ने राजनीति को करीब से देखा है और बिना किसी चूक के, बिना किसी बदनामी के उन्होंने पूरे कार्यकाल का अनुभव हासिल कर लिया है। उनके पक्ष में एक दूसरा तर्क यह भी है कि वे किसी पार्टी के, या किसी राजनीतिक विचारधारा के हाथ बिके हुए नहीं हैं।
लेकिन आज राष्ट्रपति चुनने के लिए देश भर में जिस तरह के राजनीतिक समर्थन की जरूरत पड़ेगी वह यूपीए या एनडीए के अकेले के बूते का नहीं है और एक अधिक व्यापक सहमति की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में कांगे्रस के आज के सबसे बड़े मंत्री, प्रणब मुखर्जी का नाम जब लिया है तो यूपीए को अपने भीतर की बागी ममता बैनर्जी के समर्थन का भरोसा रहता है क्योंकि एक बंगाली को राष्ट्रपति न बनाकर वे अपने राज्य में लोगों की नाराजगी नहीं झेल सकतीं। दूसरी तरफ वामपंथी दलों को भी शायद अपने खंडहर पश्चिम बंगाल में किसी भी किस्म की वापसी के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम पर मंजूरी देना ठीक लगे। लेकिन उनके भीतर सारी काबिलीयत रहते हुए भी आज की तारीख में हम उनको राष्ट्रपति पद के लिए सबसे कम लायक मानते हैं। इसकी वजह यह है कि आज वे यूपीए सरकार को तकरीबन अकेले ही चला रहे हैं। आज केंद्र सरकार के सारे फैसलों के पीछे सबसे अधिक वजन उन्हीं का है। वे यूपीए सरकार के शायद तीन चौथाई मंत्री-समूहों के मुखिया हैं। और अनगिनत मामलों में वे अदालतों और संसदीय सलाहकार समितियों के सामने चल रहे मामलों में सरकार की तरफ से जवाब तय करने वाले हैं। ऐसे व्यक्ति के सामने अगर राष्ट्रपति रहते हुए यूपीए सरकार के दस बरसों के मामले पहुंचेंगे और उन्हें उन पर कोई संवैधानिक फैसला लेना होगा, तो हमारा मानना है कि उनके सामने एक बहुत ही स्पष्ट हितों का टकराव खड़ा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में अगर प्रणब बाबू कोई भी राजनीतिक नैतिकता और ईमानदारी दिखाते हैं तो वे खुद ही राष्ट्रपति बनने से मना कर देंगे। बहुत से मामलों में यूपीए सरकार के दोनों कार्यकाल से जुड़े मामले अगले राष्ट्रपति के सामने पहुंचेंगे और इन फैसलों के पीछे रहा हुआ सबसे ताकतवर मंत्री किस तरह निष्पक्ष और ईमानदार होकर राष्ट्रपति का जिम्मा पूरा कर सकेगा?
लेकिन आज जितने नाम चल रहे हैं उनमें दो बातें खुलकर दिख रही हैं। या तो बंगाली या फिर मुस्लिम। हालांकि भारत में राष्ट्रपति एकदम क्षेत्रीयता के आधार पर तय नहीं हुए हैं लेकिन कभी-कभी धर्म और जाति के आधार पर उनका फैसला हुआ है। आज यूपीए सरकार तृणमूल कांगे्रस के भीतर रहते हुए भी उससे किसी शर्तिया समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकती इसलिए उसका ध्यान भी रखना पड़ेगा। और अगर आज के उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति बनाने की बात आती है तो फिर दोनों पदों पर एक साथ लोगों को चुना जाएगा और उस मौके पर जाति, धर्म और क्षेत्र को ध्यान में रखना पड़ेगा। आज इस मुद्दे पर लिखते हुए मकसद यह है कि मुलायम सिंह की इस बात से सहमति जाहिर करना कि राष्ट्रपति राजनीतिक समझ वाला होना चाहिए और इस बात से असहमति जाहिर करना कि प्रणब मुखर्जी जैसे अतिविवादास्पद सरकार के अतिसक्रिय मंत्री को राष्ट्रपति के लिए सोचना। देश के लोगों को इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए और बारीकी से इसकी जटिलताओं पर विचार भी करना चाहिए।

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