बुढ़ापे की जरूरत


23 मई 2012
संपादकीय
एक ब्रिटिश अखबार की खबर है कि मौत के करीब पहुंच चुके लोगों के बीच सामाजिक संबंधों के लिए एक सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट शुरू की गई है। ऐसा इसलिए किया गया है कि वे अपनी ही तरह के उन लोगों से बातचीत कर सकें जो मौत का इंतजार कर रहे हैं, बहुत बुरी तरह बीमार हैं या बहुत बूढ़े हो चुके हैं। माई लास्ट  विश नाम की यह वेबसाईट दुनिया भर के ऐसे एक-दूसरे से अनजान लोगों को जोडऩे का काम करेगी जो कि अलग-अलग किस्म के दायरों से आए हुए हैं। 
इस खबर से हमें दुनिया के दूसरे विकसित देशों में आज की एक दूसरी समस्या याद पड़ती है कि किस तरह बुजुर्गों की बढ़ती आबादी, छोटे होते परिवार, बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक तंगी के चलते निम्न और मध्यम आयवर्ग के भीतर बुजुर्गों की देखभाल कैसे एक बड़ी दिक्कत बन रही है। आगे-पीछे भारत के बड़े शहरों में यही हाल होना है और एक कड़वी हकीकत तो यह है कि एक नामौजूद भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के सम्मान के नारे से परे, बुजुर्गों की हालत बहुत जगह बहुत खराब है। आज इस चर्चा का यह मकसद बिल्कुल नहीं है कि ऐसी कोई वेबसाईट भारत के बुजुर्गों के काम आएगी, लेकिन यह जरूर है कि इस बहाने यहां की बुढ़ापे की दिक्कतों पर बात करने की जरूरत है। भारत में भी बहुत से परिवारों में बुजुर्गों को ठीक से रखने में दिक्कत होती है, या नई पीढ़ी इस जिम्मेदारी से बचना चाहती है। नतीजा यह होता है कि पाखंड का हमारा राष्ट्रीय चरित्र मां-बाप की सेवा के गुणगान करते हुए उनकी जरूरतों को बहुत से मामलों में अनदेखा करते चलता है। जिस तरह गाय को मां कहते हुए उसे घूरे पर छोड़ दिया जाता है उसी तरह परिवार के बुजुर्गों को किसी बहुत अच्छी हालत में रखना कई लोग नहीं कर पाते, या नहीं करते। ऐसे में समाज और सरकार को एक पहल करके बुजुर्गों के लिए ऐसी जगह बनाने की जरूरत है जो कि भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों को मुंह में कंकड़ की तरह खटकेगी, लेकिन हकीकत यह है कि उनसे इन बुजुर्गों में से बहुतों की हालत सुधर जाएगी। ऐसी जगह समाजसेवा के हिसाब से समाज या सरकार भी चला सकते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं, उनके लिए भी ऐसी जगह बननी चाहिए जहां पर कि वे अपनी पीढ़ी के लोगों के साथ रह सकें, सुरक्षित रह सकें और उनकी सेहत की देखभाल एक अधिक संगठित और व्यवस्थित तरीके से हो सके। अब मिसाल के तौर पर जिन लोगों के बच्चे दूसरे देशों में बस गए हैं और मां-बाप किसी वजह से वहां जाकर नहीं रह पाते, यहीं रह जाते हैं, और उनकी रोज की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं। ऐसे लोगों के लिए उनकी आर्थिक क्षमता के मुताबिक भुगतान करके रहने की ऐसी जगह रहनी चाहिए जहां पर वे वक्त बेवक्त इलाज भी पा सकें, और उनका वक्त अच्छे से कट भी सके। 
वृद्धाश्रम शब्द से बहुत से लोगों को परहेज है, ठीक उसी तरह जैसे कि लोगों को कसाईखाने से परहेज है। लेकिन जब गाय को बचाने के नाम पर उसे घूरे पर छोड़ दिया जाता है और मां-बाप को सिर्फ कुछ रकम भेजकर लोग उससे अधिक कुछ नहीं कर पाते, तो समाज में एक संगठित इंतजाम का विकल्प तो होना ही चाहिए। इसके बाद भी जो लोग अपने घर में रहना चाहें या जिन्हें उनकी औलादें अपने घर में रखना चाहें, वह तो रहे ही, लेकिन जिनकी दुर्गति हो रही है, कम से कम वे तो दूसरी जगहों पर एक नजर डालकर अपनी बची हुई जिंदगी की बेहतरी सोच सकें। सरकार को सामाजिक संस्थाओं को जोड़कर मुफ्त के और भुगतान वाले ऐसे अलग-अलग बसेरे बनाने चाहिए, क्योंकि अच्छा लगे या बुरा लगे, यह आज की जरूरत तो है ही।

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