संस्कृतियों और पीढिय़ों के टकराव से हत्या-आत्महत्या


29 मई 2012
संपादकीय
इटली में बसे हुए एक भारतीय ने अपनी पत्नी को इसलिए मार डाला क्योंकि वह पश्चिमी फैशन के कपड़े पहनती थी और यह पति उसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ पाता था। ऐसे कुछ और हादसे दुनिया के अलग-अलग शहरों में कुछ मुस्लिम परिवारों में भी हुए हैं और कभी फैशन को लेकर तो कभी पे्रम-प्रसंग को लेकर हत्याएं हुई हैं। भारत में हत्या से कम कई किस्म के तनाव रहन-सहन और जीवनशैली को लेकर होते आए हैं। फिल्मों और टीवी के रास्ते पश्चिम का जो उदार फैशन अपने खुलेपन के साथ भारत पहुंचा है और इसे लेकर अलग-अलग पीढिय़ों के बीच एक तनातनी का माहौल खड़ा होते ही रहता है। संस्कृतियों का टकराव और संस्कृतियों के बीच अंतरसंबंध सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं दुनिया के बहुत से ऐसे समाजों में तनाव पैदा करते रहते हैं जहां पर परंपराओं से लेकर पाखंड तक बहुत सी बातों को लेकर पीढिय़ों की सोच में फर्क रहता है। एक दूसरी खबर आज ही सुबह हरियाणा के कुरूक्षेत्र इलाके की है जहां पर कि एक लड़की को उसके भाई ने इसलिए मार डाला क्योंकि उसके फोन पर बहुत सी कॉल आती थीं और भाई को लगता था कि बहन किसी गलत चक्कर में पड़ गई है। हरियाणा और आसपास के इसी इलाके में हर बरस दर्जनों ऐसे मामले होते हैं जिनमें पे्रम-प्रसंग की वजह से परिवार अपनी लड़कियों की हत्या करवा देते हैं। दूसरी तरफ पे्रम और विवाह की इजाजत न मिलने पर हर बरस हिंदुस्तान में हजारों आत्महत्याएं होती हैं।
भारत में जिन मुद्दों को लेकर हम नौजवान पीढ़ी में तनाव देखते हैं उनमें से फैशन एक है और पे्रम-संबंध एक दूसरा मुद्दा है। आधुनिक रहन-सहन की छूट भी जो परिवार अपने बच्चों को देते हैं, उन परिवारों में भी जब इस तरह से, इस माहौल में बड़े हुए बच्चे अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनना चाहते हैं तो उन्हें सलीम और अनारकली की तरह करार देते हुए मां-बाप पल भर में शहंशाह अकबर बन जाते हैं। फिर देश का एक बड़ा छोटा हिस्सा ही ऐसा है जहां पर आज बड़े हो रहे बच्चों को अपनी मर्जी के फैशन की छूट मिलती है। कुछ तो फैशन ऐसे होते हैं जिनकी वजह से परिवार से परे भी समाज में एक तनाव खड़ा हो सकता है और भारत में बहुत से शहर इससे भी जूझ रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ बच्चों से परे बहुत से संयुक्त परिवार ऐसे हैं जहां पर एक साधारण सी फैशन के लिए भी परिवारों के बुजुर्ग मनाही कर देते हैं और घर की बहू या बच्चे लगातार तनाव या कुंठा में जीते हैं। और अब तो योरप के सबसे फैशनेबल देश इटली में बसे हुए हिंदुस्तानी ने जब अपनी बीवी को मार डाला है तो भारत में बहुत लोगों को इससे एक मिसाल भी मिलेगी।
हम हत्या जितनी बड़ी किसी घटना के पहले तक की जिस कुंठा को आज जिस तरह से अनदेखा किया जाता है उसकी बात करना चाहते हैं। आज महिलाओं और बच्चों का उठना-बैठना भी बहुत तरह के लोगों के साथ होता है। उनमें से बहुत से लोगों की हसरतें आज के जमाने के तौर-तरीकों का सुख पाने की रहती हैं। इनमें फैशन से लेकर पे्रम-संबंधों और पे्रम-विवाह तक लोग अपनी मर्जी के कई काम करना चाहते हैं और उसकी पारिवारिक या सामाजिक इजाजत न मिलने पर वे जिस तरह के तनाव में रहते हैं, उनसे उनकी सामाजिक उत्पादकता भी कम होती है। दुनिया में जो देश जितनी कम रोक-टोक के समाज वाले रहते हैं, उनमें अपनी संभावनाओं तक पहुंचने की संभावना उतनी ही अधिक रहती है। दुनिया के कट्टर देश, देशों के कट्टर समाज पिछड़ जाते हैं। ऐसे में किस तरह के देश में, कैसे माहौल में रहा जाए और वहां के उदार वातावरण के साथ कैसे तालमेल बिठाया जाए, इसे लेकर हमारी कोई सीधी सलाह नहीं हो सकती, लेकिन गैरजरूरी रोक-टोक और गैरजरूरी दकियानूसी रीति-रिवाज समाज का कोई भला नहीं करते हैं। इसलिए परिवारों को अपनी पारिवारिक सीमाओं को गैरजरूरी तरीके से तंग रखना छोडऩा चाहिए।

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