31 मई 2012
संपादकीय
पेट्रोल की महंगाई के खिलाफ बहुत से गैरकांगे्रसी दलों ने आज भारत बंद करवाया। उसकी कामयाबी कितनी रही, यह खबर धीरे-धीरे आएगी लेकिन इस पर कुछ चर्चा दोपहर के इस वक्त भी हो सकती है। पेट्रोल की महंगाई को रोकने के लिए केंद्र सरकार कोई सबसिडी को, उसके खिलाफ दो दिन पहले ही हमने इसी जगह अपनी बात लिखी। आज उसी को यहां दुहराने का कोई मतलब नहीं है और आज के इस बंद से फिर वही बात सामने आती है कि इस बंद की सबसे बड़ी मार रोज कमाने-खाने वाले उन छोटे मजदूरों या फुटपाथी व्यापारियों पर पड़ी है जिनका पेट्रोल से कोई लेना-देना ही नहीं है। ऐसे लोग अपनी एक दिन की कमाई खो बैठे हैं।
हम नीतिगत रूप से बंद के पीछे की वजहों को अलग-अलग करके नहीं देखते कि किस मांग को लेकर बंद जायज है और किस मांग को लेकर नहीं। हम दरअसल पूरे के पूरे बंद के खिलाफ हैं जो कि हमारे हिसाब से एक राजनीतिक स्वतंत्रता न होकर एक धाक और दबदबे से लोगों पर लादा गया प्रदर्शन होता है जिसकी मार सबसे गरीब पर सबसे अधिक पड़ती है। देश की कई अदालतों ने समय-समय पर इस बारे में कहा भी है, और अदालतों के कहे हुए से परे भी हमारा अपना यह मानना है कि कोई भी बात किसी दूसरे पर हिंसक तरीके से नहीं थोपनी चाहिए। आज कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र तक कई जगहों पर हिंसा के साथ बसों को जलाया जा रहा है। जलती हुई बसों की तस्वीरें तो दिखती हैं, लेकिन ऐसी हर बस से परे हजारों लोग अपने आज के जरूरी काम को नहीं कर पाते, कोई अस्पताल नहीं जा पाते, तो कोई अपने छोटे से कारोबार में नुकसान झेलते हैं। और मजे की बात यह है कि आज के इस बंद के पीछे भारतीय जनता पार्टी सहित बहुत सी ऐसी पार्टियां हैं जिनकी सरकारें अलग-अलग प्रदेशों में काबिज हैं, और बढ़े हुए पेट्रोल-रेट पर इन सरकारों ने अधिक टैक्स भी पाना शुरू कर दिया है। हमारा सवाल यह है कि जो पार्टियां पेट्रोल की महंगाई के खिलाफ हैं, जो मुख्यमंत्री इस महंगाई के खिलाफ बयान देते हैं, वे इस बढ़े हुए रेट पर अधिक टैक्स किस हिसाब से ले रहे हैं? इसलिए पेट्रोल को लेकर इस तरह का आंदोलन किसी नैतिक अधिकार वाला नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी राज्य की भाजपा सरकार केंद्र के बढ़ाए हुए दाम पर टैक्स वसूल रही है। भाजपा के लोग आज सड़कों पर बंद करवाते हुए घूम रहे हैं। जनता को उनसे पूछना चाहिए कि अगर केंद्र सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों का रेट बढ़ाना गलत है, तो उस बढ़े हुए रेट पर छत्तीसगढ़ सरकार का टैक्स वसूलना कैसे सही है?
आज के इस बंद को करवाते हुए जो लोग घूम रहे हैं, उनको इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि पेट्रोल की सबसिडी जनता के जिस खजाने से अब तक जा रही थी, उस खजाने पर देश की जिस ऐसी गरीब आधी आबादी का भी तो हक है जो पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करती, ऐसी आबादी गाड़ी चलाने वालों को राहत क्यों दे? जब यह देश आधी से अधिक आबादी को सस्ता अनाज देता है, तो ही हर दिन दो वक्त उनका पेट भर पाता है। ऐसी आबादी के हक के पैसे को गाडिय़ां चलाने वाले लोगों को क्यों दिया जाए? इसलिए यह बंद पूरी तरह से नाजायज है, और हम पेट्रोल पर सरकारी अनुदान को भी ऐसा ही नाजायज मानते हैं। चूंकि देश का मीडिया शहरी मध्यम वर्ग के हितों का ध्यान रखने वाला हो गया है, राजनीतिक दल भी संसद के भीतर उच्च वर्ग वाले हो गए हैं, इसलिए इस मुद्दे को उठाने वाले लोग कम रह गए हैं कि पेट्रोल की सबसिडी सबसे गरीब पर बोझ है।
और बात सिर्फ पेट्रोल की नहीं है। डीजल पीते हुए आज शहरी संपन्न तबके की इतनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ां एक-दो सवारियों को लेकर चलती हैं, जितनी बड़ी गाडिय़ों के लिए अमरीका जैसा देश बदनाम है। ऐसी गाडिय़ों वाले लोगों को डीजल पर भी कोई रियायत क्यों दी जाए? कल केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी यह बात उठाई है कि आज हर आटोमोबाईल कंपनी डीजल कारें और गाडिय़ां इसलिए बना रही हैं क्योंकि पेट्रोल और डीजल के दामों में खासा फर्क है। जब बीस लाख से पचास लाख रूपये की गाडिय़ां लोग अकेले के चलने के लिए लेने का दम रखते हैं, लेते हैं, सड़कों को रौंदते हैं, तो फिर उन्हें रियायती डीजल क्यों मिले?
हमें हैरानी इस बात की है कि सबसे गरीब के हक वाले सरकारी खजाने पर पडऩे वाले पेट्रोल-डीजल की रियायत के नाजायज इस्तेमाल को वामपंथी दल भी अनदेखा कर रहे हैं और अपने शहरी वोटों की खातिर वे भी इस बंद में शामिल हैं और पेट्रोल महंगाई के खिलाफ हैं। हम पेट्रोलियम सबसिडी और आज के बंद दोनों को गरीब-विरोधी मानते हैं और इन दोनों के खिलाफ हैं।

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