30 मई 2012
संपादकीय
आंध्र के हजार आबादी वाले एक छोटे से गांव को कल तंबाकू मुक्त घोषित किया गया। दो ही दिन पहले केरल की खबर थी कि वहां पर तंबाकू और गुटखा के पाऊच पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिए गए हैं। इसके पहले भी कुछ राज्यों ने ऐसी रोक लगाई थी लेकिन किसी कानूनी कमजोरी की वजह से वह रोक देश की बड़ी अदालतों में बहुत मोटी फीस पाने वाले वकीलों ने तेजी से हटवा भी दी थी। लेकिन अगले दो दिन तंबाकू विरोधी दिवस की खबरों से भरे रहेंगे इसलिए इसके बारे में कुछ बात होनी चाहिए।
हमारे नियमित पाठक जानते हैं कि हम अपने अखबार में लगातार तंबाकू से होने वाले नुकसान के बारे में अपनी तरफ से एक अभियान चलाते हैं और इस बारे में जागरूकता का कोई सा भी मौका नहीं चूकते। लेकिन यह कोशिश अकेले बिल्कुल भी किसी काम की नहीं होगी अगर सरकार का कानून और लोगों के बीच एक अभियान इसी किस्म का नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ में भी एक बार राज्य सरकार ने ऐसी कोशिश की थी लेकिन उसने कानूनी सीमाओं का ध्यान रखे बिना ऐसा आदेश निकाला गया था जो आसानी से अदालत में खारिज हो गया। लेकिन सरकारें तो अपना काम करें या न करें, समाज को यह सोचना चाहिए कि वह किस तरह से तंबाकू के जहर को पीढिय़ां खत्म करने से रोक सकते हैं। आज गांव-गांव तक छोटे-छोटे बच्चे गुटखा के पाऊच खरीदते और चबाते दिखते हैं। शहरों में स्कूल-कॉलेज के बच्चे चौराहों और फुटपाथों पर सिगरेट पीते दिखते हैं। सरकार तो रात-दिन चौकसी करके भी इसकी बिक्री को कमउम्र लोगों से दूर नहीं रख सकती लेकिन समाज के लोग चाहें तो जरूर ऐसा कर सकते हैं। हममें से हर कोई अपने और पराए बच्चों का फर्क किए बिना अगर तंबाकू खाते या उड़ाते लोगों को रोकना शुरू करें, तो हो सकता है कि शुरू में ऐसे लोग एक नाराजगी दिखाएं। लेकिन अगर उन्हें समझाने के लिए बहुत सस्ते से पर्चे छपवाकर लोग लेकर चलें, और उन्हें बांटें तो यह काम किसी ईश्वर के नाम पर बांटे जाने वाले पर्चों के मुकाबले बेहतर होगा और असरदार भी होगा।
केंद्र सरकार के स्तर पर तंबाकू पर रोक के लिए जिस तरह की चेतावनी को बढ़ावा मिलना था, उस पहल को तंबाकू कारोबारियों की खरबपति लॉबी ने कुचलकर रख दिया। और इसमें इतनी मोटी कमाई है, और दिल्ली में फैसले लेने और नीतियां बनाने वाले लोगों में से इतने लोग इस कदर बिकाऊ हैं कि जहर के इन व्यापारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कभी हो ही नहीं पाएगी। इसलिए जनता को खुद होकर अपने बच्चों को, आने वाली पीढिय़ों को इस शर्तिया कैंसर से बचाना होगा। आज यह काफी नहीं है कि हमारे खुद के बच्चे तंबाकू नहीं खाएं और सिगरेट-बीड़ी न पीएं। अगर ऐसी अच्छी बात कुछ लोगों के परिवारों में है तो वह इस पीढ़ी को भी पूरे का पूरा नहीं बचा पाएगी, क्योंकि यार-दोस्तों के बीड़ी-सिगरेट के धुएं से भी आसपास के फेंफड़े छलनी होना तय होता है और यह कैंसर तक का पक्का सफर होता है। दूसरी तरफ तंबाकू का सिलसिला अगर कायम रहता है तो आपकी आने वाली कई पीढिय़ों को वह अपनी जकड़ में लेने की ताकत रखता है, और आज आपके बचाए बच्चों के बच्चे जब बड़े होंगे तो हो सकता है कि उस वक्त वे इस जहर से न बच पाएं। इसलिए सिर्फ अपने बच्चों को बचाना बिल्कुल ही नाकाफी है।
लोगों को सरकार पर यह दबाव डालना चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर कड़ाई से रोक लगाई जाए और समाज के भीतर के जिम्मेदार सरोकारी लोगों को पहल करनी चाहिए कि वे अपने इलाकों में, या जहां भी वे जाते हैं वहां, किसी को आसपास सिगरेट-बीड़ी नहीं पीने देंगे। इसके लिए जरा सा हौसला करके लोगों को नियम-कानून तोडऩे वालों को समझाना होगा और इस पर भी वे न मानें तो अफसरों को खबर करके वहां यह जिद करनी होगी कि वे कार्रवाई करें। आज तो चारों तरफ हमको यह देखने मिलता है कि स्टेशनों और बस अड्डों पर, फुटपाथों और मैदानों पर, बगीचों में और सरकारी दफ्तरों में हर तरफ लोग सिगरेट पीते रहते हैं। यह सिलसिला अपने-आप कम नहीं होगा, लोगों को इसके खिलाफ अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें