भारत में नेताओं के भरोसे कुछ नहीं छोड़ा जा सकता


20 मई 2012
संपादकीय
अपनी सरकार का पहला बरस पूरा होते-होते किसी की शोहरत इस कदर गिर सकती है, यह कल्पना से परे की बात है, ममता बैनर्जी के बारे में। वाममोर्चे की तीन दशक से अधिक पुरानी सरकार को एक सैनिक वाली सेना की तरह चुनावी बहादुरी दिखाते हुए ममता ने उखाड़ फेंका था। लेकिन आज इस एक बरस में वे दर्जन भर ऐसे गलत काम कर बैठी हैं जिन्हें कोई बददिमाग और बेदिमाग तानाशाह ही कर सकते थे। ममता बैनर्जी ने अब तक एक सरकार के रूप में तो कोई असर छोड़ा नहीं है, सिवाय कुछ मामलों में अपनी सादगी के। दूसरी तरफ वे बंगाल को एक अलग देश साबित करने में लगी हैं, और अपने-आपको उसका मालिक। यह सिलसिला देश और दुनिया के उन तमाम पढऩे-लिखने वाले, सोचने-समझने वाले और उदार-लोकतांत्रिक लोगों को बुरी तरह हिला गया है। 
एक महिला मुख्यमंत्री के बारे में आज अगर यह कहा और लिखा जा रहा है कि वे अपने राज में एक महिला से बलात्कार को मजाक की तरह लेती हैं और एक कार्टून के मजाक को अपने कत्ल की साजिश कहती हैं, तो वे एक सभ्य लोकतंत्र में नहीं जी रहीं। कल एक टेलीविजन प्रोग्राम में वे बंगाल की एक छात्रा के एक बहुत ही मासूम सवाल पर भड़क गईं और उसे सीपीएम और नक्सलियों की कार्यकर्ता बताते हुए, प्रसारित होते कार्यक्रम के बीच से उसे छोड़कर चली गईं। उसके बाद पुलिस ने सवाल करने वालों के संबंध में जांच शुरू कर दी। ममता के तौर-तरीके यह बताते हैं कि सार्वजनिक जीवन में रहते हुए और एक सरकार को चलाने की संवैधानिक शपथ लेने के बाद भी उनके मन में न तो इंसाफ के लिए कोई इज्जत है और न ही अपने साथियों के लिए कोई सम्मान। अपनी पार्टी के सबसे बड़े केंद्रीय मंत्री को वे उसी तरह उठाकर कूड़ेदान में फेंक चुकी हैं जिस तरह कोई सर्दी पोंछकर कागज के रूमाल को फेंकते हैं। यह सिलसिला लगातार बढ़ते ही चल रहा है और एक तरफ वामपंथियों से नफरत, दूसरी तरफ महत्वोन्माद, इन दोनों पाटों के बीच में  ममता की शोहरत साल भर में ही पिसकर चूर-चूर हो गई।  आज ही सुबह अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर एक शेर डाला है-उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पे थी और आईना साफ करता रहा...। यह बात मानो ममता बैनर्जी पर लागू हो रही है।
दरअसल एक तरफ जब ममता बैनर्जी एक मासूम कार्टूनिस्ट को जेल भेज रही है और एक बहुत ही साधारण व्यंग्य को कत्ल की साजिश बता रही है तब इस देश की संसद में दलितों के उठाए एक मुद्दे पर राजनीतिक दल और सरकार मिलकर हड़बड़ी में साठ साल पुराने एक कार्टून को स्कूली पढ़ाई की किताब से निकालकर फेंक दे रहे हैं। जब पूरे देश का माहौल ऐसा है तो ममता बैनर्जी का कुसूर कुछ कम लगने लगता है और कार्टूनिस्ट मुजरिम लगने लगते हैं। भारत को इंदिरा के वक्त के आपातकाल की याद होगी जिसके पहले से कुनबापरस्ती के चापलूसों ने यह हल्ला करना शुरू कर दिया था कि इंदिरा के खिलाफ एक विदेशी हाथ साजिश कर रहा है। और अब जब आपातकाल को एक जिंदगी गुजर गई है, तब भी ऐसे किसी हाथ की शिनाख्त उनकी हाथ छाप पार्टी और उसकी सरकारें नहीं कर पाई हैं। उस वक्त ममता बैनर्जी कांगे्रस में थीं, और ऐसा लगता है कि कत्ल की साजिश की उनकी यह कल्पना या उनका यह बहाना, उन दिनों के अनुभव पर आधारित हैं। जब इंदिरा और संजय गांधी का लगाया हुआ आपातकाल था तब तो कार्टूनों पर लोगों को जेल होना चल गया था, लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में भी आपातकाल से मुंह जला चुका यह देश छांछ के घड़े को अगर लात मारकर गिरा रहा है, तो ऐसा देश आज पूरी दुनिया में सिर्फ हैरानी और हिकारत से देखा जा रहा है। दुनिया के सभ्य होने के साथ-साथ एक-दूसरे के लिए जो बर्दाश्त बढऩा चाहिए, वह हिंदुस्तान में खत्म होते दिख रहा है। और यह कैसी हैरानी की बात है कि पिछले कुछ समय में न तो भारत की साम्प्रदायिक ताकतों से ऐसे हमले हुए, और न ही परंपरागत रूप से प्रतिबंध की पक्षधर पार्टियोंं ने ऐसा किया। अब ममता बैनर्जी से लेकर दलित तक प्रतिबंध के हिमायती हो गए हैं। 
यह सिलसिला भयानक है। एक तरफ जिस आंबेडकर के कार्टून को लेकर दलितों और बाकी नेताओं के एक तबके ने विशेषज्ञों की तैयार की हुई कोर्स-किताबों को संसद की बहस के बीच ही सरकार से खारिज करवा दिया, उस आंबेडकर का परिवार इस पर हक्का-बक्का है और कार्टून बनाने वाले शंकर का परिवार तो हक्का-बक्का है ही।  आज वोटों का डर दिखाकर देश के किसी हिस्से में किसी जाति का जिक्र इतिहास से खत्म किया जा रहा है तो कहीं इतिहास के पन्नों पर पौराणिक काल से ही हिंदुओं में प्रचलित गोमांस खाने का जिक्र मिटाया जा रहा है। जो समाज अपने इतिहास को देखने का साहस नहीं कर सकता वह समाज इतिहास के आधे-अधूरे चबूतरे पर  डगमग ही खड़ा रह सकता है। इससे एक ही बात साबित होती है कि सच से लेकर लोकतंत्र की दूसरी बातों तक, कुछ भी राजनीति और नेताओं के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते। 

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