19 मई 2012
संपादकीय
आईपीएल मुकाबलों पर बवाल बढ़ता ही जा रहा है। शाहरुख खान का विवाद थमा भी नहीं था कि एक विदेशी महिला ने विजय माल्या की टीम के एक खिलाड़ी पर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया, और माल्या पुत्र ने इस महिला पर उन्हेें चारा डालने का आरोप लगाया। इन विवादों में बहुत से नेता भी कूद पड़े हंै और आईपीएल बंद करने की मांग उठने लगी है। इस पूरे मामले में बीसीसीआई का बर्ताव अब तक के अपने चरित्र में मुताबिक ही रहा है। उसने एक दो सतही जवाब दे कर अपना पल्ला झाड़ लिया। सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद आईपीएल बन्द करने की मांग को ले कर भूख हड़ताल करने की घोषणा कर चुके है, लेकिन क्या आईपीएल बंद कर देने से, इस पर लगे तमाम आरोपों का जवाब मिल जाएगा? जो बुराईयां खेल के इस फार्मेट, और बीसीसीआई के तौर तरीकों में नजर आ रही हंै वह दूर हो जाएंगी? क्या मुद्दा आईपीएल है, या खेलों में घुसा भ्रष्टाचार ,काला पैसा, और सियासत? आज आईपीएल को ले कर जैसे भी हालात है, इसके लिए क्या अकेली बीसीसीआई ही जिम्मेदार है? क्या देश के भीतर उसे , कायदे कानूनों, जवाबदेही से परे वेटिकन जैसी संस्था बन जाने देने के लिए राजनीतिज्ञ और कार्यपालिका जिम्मेदार नहीं है?
इन सवालों के जवाब ढूंढना इसलिए जरूरी है, कि आईपीएल नाम का यह तमाशा जनता के बूते होता है। जनता टिकिट लेकर यह मुकाबले देखती है। खेल मंत्री अजय माकन ने भी यही कहा है कि खेल प्रेमियों, और प्रशंसकों के पैसों से होने वाले इस मुकाबले में पैसों, और आयोजन के मामले में पारदर्शिता होनी जरूरी है। क्रिकेट, टेनिस गोल्फ, और फुटबाल जैसे उन खेलों में से है, जिनके इर्दगिर्द दुनिया भर में एक पूरा बाजार खड़ा कर दिया गया। भारत में क्रिकेट के बाज़ार की चाभी जिन खेल संगठनों के हाथ में है, उनमें से ज्यादातर पर अलग-अलग दलों के नेता, या उनके समर्थक काबिज हैं। यह संगठन खुद को कायदे कानून से परे समझते हैं। अब तो नजऱ आ रहा है, उसके मुताबिक बाजार किसी भी कीमत पर इस खेल को ज्यादा से ज्यादा बिकाऊ बनाता है, नेता इसमें उसके मददगार बनते हंै,और खिलाड़ी पेशे में खुद को टिकाए रखने के लिए कभी बाजार, तो कभी नेताओं के हाथों मोहरा बनते रहते हैं। यह गठबंधन इस खेल में घुस आई बुराइयों की जड़ दिखता है। लेकिन फिर भी क्या आईपीएल को बंद कर देना इसका कोई इलाज है? आईपीएल को खुद खेल मंत्री खेल नहीं, मनोरंजन मानते हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने आईपीएल पर मनोरंजन कर भी लगाया है। लेकिन एक प्रजातांत्रिक ढांचे में मनोरंजन के कार्यक्रम करने का अधिकार कैसे छीना जा सकता है? यह मनोरंजन नियमों के दायरे में, उसके मुताबिक हो, यह देखना कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों का काम है। कोई आयोजन अगर कायदों के मुताबिक नहीं हुआ, तो उसे बंद करना इस समस्या का इलाज नहीं, कि देश में कायदे को अमल में लाने के जिम्मेदार लोग ऐसा कर नहीं पाते। अगर आईपीएल में मैच फिक्सिंग हो रही है, तो यह टिकिट ले कर मैच देखने वाले दर्शक और घर में, अपना काम धाम छोड़कर टीवी के सामने बैठकर चैनल पर मैच देखने वाले खेल के प्रशंसक के साथ भी नाइंसाफी है, कि खेल शुरू होने के पहले ही हार जीत का फैसला हो जाए। लेकिन मुकाबला बंद कर देना इस समस्या का हल नहीं। आईपीएल के साथ जुड़े ग्लैमर, और मैचों के बाद होती दावतों को खिलाडिय़ों द्वारा किसी महिला से छेड़छाड़ की वजह कैसे बताया जा सकता है? क्या आईपीएल के पहले क्रिकेटर मैचों के बाद दावतें नहीं करते थे? क्या उनके महिला प्रशंसकों से संबंधों पर कभी चर्चाएं नहीं हुई? यह दोनों बातें कानून व्यवस्था से जुड़ी हैं, लेकिन कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों में इनके पालन का हौसला जागे, यह काम कौन करेगा? नेता अपने फायदे नुकसान के मुताबिक कभी आईपीएल के समर्थन में, तो कभी इसके खिलाफ हो जाते हैं। इसी आईपीएल में बंगलौर में एक मुकाबले के पासों के लिए स्थानीय नगरपालिका के पार्षदों ने खुले तौर पर सौदेबाजी की। आयोजक बृहनबंगलौर नगर पालिका के 198 पार्षदों को 250 पास दे रहे थे, लेकिन बंगलौर के उप महापौर ने अखबारों में खुले आम कहा कि अगर संस्था के नाम 450 पास नहीं दिए गए तो वह आईपीएल के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करेंगे। नगरपालिका में विपक्ष के नेता ने इस "जरूरी कार्रवाई" का खुलासा करते हुए कहा कि नगरपालिका आईपीएल को विज्ञापन शुल्क में दी गई रियायत वापस ले लेगी,और भारी शुल्क लगाएगी। जनता के पैसों से चलती एक संस्था के निर्वाचित सदस्य, जब एक मैच देखने के लिए ऐसी सौदेबाजी करे, तो क्या यह गंदगी, आईपीएल में नजऱ आ रही गंदगियों से किसी मायने में कम है? जब इन्हें बर्खास्त नहीं किया जाता, तो आईपीएल बंद क्यों हो? यह घटना बताती है कि बुराई कहां से शुरू हो रही है।
सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है। उसने 2006 से बीसीसी को आईपीएल आयोजन के लिए दी जा रही कर माफी वापस ले ली है। इस साल के बजट में आईपीएल में खेलने वाले तमाम घरेलू और विदेशी खिलाडिय़ों पर 25 फीसदी सेवा शुल्क लगाने का प्रस्ताव किया है। सभी राष्ट्रीय खेल संगठनों को सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में लाने का प्रस्ताव भी किया गया है, हलांकि बीसीसीआई खुद को सूचना अधिकार के दायरे से परे समझती है, लेकिन इस दिशा में कड़े कदम उठाना सरकार का काम है। खेल मंत्री अजय माकन ने आईपीएल में काले पैसे के इस्तेमाल की जांच करने का हुक्म जि़म्मेदार एजेंसियों को दिया है। प्रवर्तन निदेशालय, और आय कर विभाग ने पिछले दिनों बीसीसीआई को जो तकरीबन 80 नोटिस भेजे हैं उनमें से ज्यादातर आईपीएल के बारे में है, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव सामने है और गठबंधन की मजबूरियों का रोना रोकर अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने की आदी यूपीए सरकार, खेल मंत्री के इस सख्त रवैये को कितना आगे ले जा पाएगी, यह देखने की बात है। सरकार के सबसे बड़े दल कांग्रेस के एक केन्द्रीय मंत्री विलासराव देशमुख टीवी पर शाहरुख खान पर शराब पीकर वानखेड़े स्टेडियम में आने, और बदतमीज़ी करने के लिए पांच बरस तक उनके वानखेड़े आने पर रोक लगाने का ऐलान करते हंै, तो कांग्रेस के ही एक और अहम सांसद राजीव शुक्ला उस पर ठंडा पानी डालते हैं। बीसीसीआई पर एनसीपी के शरद पवार की पकड़ जग जाहिर है। दूसरी तरफ टीवी पर शाहरुख की सारी गाली गलौच सुनने के बावजूद सरकार के एक घटक दल तृणमूल कांग्रेस की मुखिया, और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी उनके समर्थन में बयान देती है। आईपीएल आयोजन में बीसीसीआई जो कायदे तोड़ रही है, अपने खुद के हिसाब-किताब को लेकर वह जिन सवालों के घेरे में है उनका जवाब उससे लिया जाएगा, और यह मुद्दे गठबंधन की कथित मजबूरियों की भेंट नहीं चढ़े यह देखना आईपीएल पर रोक लगाने से ज्यादा जरूरी है।

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