नक्सलियों से बातचीत का ऐतिहासिक पहला कदम


01 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में नक्सल-वार्ता को लेकर कल दोनों पक्षों की तरफ से जो मिलीजुली घोषणा हुई है और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जिस खुशी और तसल्ली के साथ इसे एक ऐतिहासिक मौका बताया है, उसे हम आजकल में पूरा होते देखना चाहेंगे जब इस राज्य के अगवा कलेक्टर की रिहाई हो जाए और लोग चैन की सांस लें। ऐसा हो जाने पर कल बनी सहमति को हम उम्मीद से दुगुना, या दुगुने से भी अधिक मानेंगे क्योंकि उतार-चढ़ाव की अफवाहों के बीच जितनी आसानी से वार्ताकारों ने और दो बिल्कुल ही विरोधी पक्षों, नक्सलियों और सरकार ने एक हल ढूंढ निकाला वह सचमुच ऐतिहासिक है। लेकिन इस रिहाई से परे, इस रिहाई के बाद जो अधिक महत्वपूर्ण बात होने जा रही है, वह है जेलों में बंद नक्सल-आरोपियों के मामलों की जांच-पड़ताल और उन पर पुनर्विचार। बस्तर के बेजुबान आदिवासी इलाके में कौन से लोग किस तरह की बेबसी में कभी नक्सलियों का साथ दे बैठते हैं इस बात को वहीं की जिंदगी भुगत रहे लोग जानते हैं। डॉ. रमन सिंह ने दो ही दिन पहले बस्तर में बसे लोगों, और वहां काम कर रहे लोगों के बारे में संपादकों से चर्चा करते हुए कहा था कि अगर उस इलाके में कोई किसी को यह कहेगा कि जाकर यह चि_ी या यह सामान उस जगह दे आओ, तो लोगों के पास मनाही करने की कोई गुंजाइश तो होती नहीं। नक्सल कब्जों के इलाकों के बारे में उनका यह अंदाज बिल्कुल सही है और सिर्फ शहरों में बसे रहने वाले लोग जिन्होंने नक्सल इलाकों की मजबूरियों को नहीं समझा है वे इसे नक्सलियों का साथ देना मान सकते हैं। जहां उनकी बंदूकों का ही साम्राज्य हो, जहां पर निहत्थे आदिवासियों को बचाने की ताकत भी पुलिस की न हो, वहां पर जिंदा रहने के लिए अगर नक्सलियों के कहे को मानना होता है, तो पुलिस तो पहली नजर में उन्हें सहयोगी मान सकती है, लेकिन सरकार को कल के इस समझौते के तहत ऐसे मामलों पर पुनर्विचार करना ही चाहिए।
सरकार का रूख आम लोगों के लिए अगर एक हमदर्दी का रहेगा तो नक्सलियों के मुद्दे धीरे-धीरे वैसे भी कम होते जाएंगे। कल ही हमने यह बात लिखी थी- '...दो पक्षों के बीच बातचीत ऐसी जमीन बनना भी कोई छोटी बात नहीं है और ऐसे अप्रिय अनुभव से भी सरकार को रिहाई की बातचीत की रणनीति तो सीखने-समझने मिल रही है, उसे शायद पहली बार नक्सलियों के पक्ष को औपचारिक रूप से अपने टेबिल पर देखने का मौका भी मिल रहा है। अभी तक नक्सलियों की जो मांगें सामने आ रही हैं उनको अगर देखें तो सरकार को यह मौका भी मिल रहा है कि वह अपनी पिछले बरसों की कार्रवाई का विश्लेषण कर सके और यह देख सके कि क्या किसी स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों से कोई ज्यादतियां भी हुई हैं...Ó।
इसे किसी भी तरह से सरकार की शिकस्त मानना गलत होगा क्योंकि अपने देश या प्रदेश की जनता पर हुई किसी सरकारी कार्रवाई को एक बार फिर से देखने में क्या हर्ज है, कि कहीं कोई ज्यादती तो नहीं हुई थी? जंगलों में बसे हुए सबसे गरीब आदिवासियों को लोकतंत्र की ताकत जब सैकड़ों किलोमीटर दूर भी धुंधली सी भी नहीं दिखती है, तो उनके साथ हो सकता है कि कुछ मामलों में ज्यादती हुई हो। भारत की न्याय व्यवस्था यह कहती है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक बेकसूर को भी सजा नहीं होनी चाहिए। आज चाहे नक्सलियों की मांग के शक्ल में यह नौबत सामने आ रही हो, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने जिस खुले मन से और तुरंत इसे माना है और राज्य शासन की एक सबसे ताकतवर कमेटी बनाकर इस पर कार्रवाई की घोषणा की है, उसे नक्सली हिंसा के खात्मे और लोकतंत्र की दुबारा स्थापना की ओर हम एक मजबूत कदम देखते हैं। हम लगातार इस बात के हिमायती रहे हैं कि हर आतंकी या उग्रवादी समूह से भी बातचीत तो होनी ही चाहिए, और ऐसी बातचीत हमेशा बिना शर्त के होनी चाहिए क्योंकि शर्तें तो बातचीत के बाद ही तय हो सकती हैं। इस बार सरकार ने भी, और नक्सलियों ने भी बंदूकों को लेकर किसी शर्त के बिना ही इस सहमति पर पहुंचने का काम शायद कर दिखाया है और आजकल में यह पूरा भी हो जाएगा, जो कि बड़ी बात होगी।
लोकतंत्र में इतने किस्म की असहमति की गुंजाइश है कि किसी स्थिति को विकल्पहीन नहीं मानना चाहिए। भारत में आज जब बहुत से लोकतांत्रिक संस्थान कमजोर होते दिख रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ लोकतांत्रिक संस्थान मजबूती से काम कर रहे हैं और कमजोर होते स्तंभों को संभाल भी रहे हैं। आज जब चारों तरफ भ्रष्टाचार के मामलों से निराशा फैली हुई है, तो हम इसे कैंसर की शिनाख्त जैसा मानना चाहेंगे कि जितनी जल्दी यह जांच रिपोर्ट आती है, उतनी जल्दी इलाज शुरू हो सकता है। आज देश-प्रदेश में जहां-जहां सरकारों के काम में गड़बड़ी पकड़ में आ रही है, वैसी गड़बड़ी दुबारा न होने की संभावना भी पैदा होती है। इसलिए कुछ मामलों को लेकर लोकतंत्र से एकदम निराश होने की जरूरत भी नहीं है। और पिछले एक हफ्ते की छत्तीसगढ़ की सुगबुगाहट से आदिवासी इलाकों में निराशा खत्म होने का एक रास्ता शायद निकलेगा।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त बस्तर में फिर नक्सलियों ने कई लोगों को मार डाला है। यह मौका अभी की वार्ता में शामिल चारों लोगों की बातचीत को आगे जारी रखने का है, और हमारा यह मानना है कि ब्रम्हदेव शर्मा चाहे कुछ वक्त के लिए लोकतंत्र पर भरोसा खो बैठें, उन्होंने लोकतंत्र और प्रशासन को इतना देखा हुआ है कि सरकार को बातचीत की इस कामयाबी के बाद उनके साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए। इस मौके पर यह अनदेखा करना ठीक नहीं होगा कि दिल्ली में बड़े-बड़े नामीगिरामी सामाजिक कार्यकर्ताओं ज्यां द्रेज और अरूणा राय ने छत्तीसगढ़ के इस अपहरण संकट और नक्सल-वार्ता के बीच में बस्तर की एक महिला के इलाज का मामला उठाया है। इस महिला का इलाज कई आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहा है। हम यह नहीं जानते कि जब सुप्रीम कोर्ट किसी को जांच या इलाज के लिए छत्तीसगढ़ के बाहर दूसरे प्रदेश भेजता है क्योंकि छत्तीसगढ़ पुलिस पर ज्यादती का आरोप लगा है, तो इसके बाद उसका इलाज आज अचानक नक्सल-वार्ता के बीच किस तरह एक मुद्दा बनाया जा रहा है, और खासकर तब जब देश के इन नामीगिरामी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपहरण और अनगिनत हत्याओं को लेकर मुंह भी नहीं खोला है। नक्सल हिंसा के सबसे बड़े शिकार, आदिवासी तबके का खून देश के आधा दर्जन राज्यों में तकरीबन रोज बिखर रहा है लेकिन राजधानियों के दिग्गज सामाजिक कार्यकर्ताओं को अगर सिर्फ पुलिस पर लगे आरोप ही दिखते हैं, तो यह शर्मनाक है। इसके बारे में सामाजिक स्तर पर अलग से बात होनी चाहिए और उन तमाम लोगों को सवाल खड़े करने चाहिए जो लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं। ऐसे मौकों पर सिर्फ मुर्दों को ही चुप रहने का हक मिल सकता है।

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