24 मई 2012
संपादकीय
किसी ने कल इसे पेट्रोल-बम कहा तो किसी ने शनि की साढ़ेसती। एकमुश्त साढ़े सात रुपये लीटर का दाम बढऩे से पेट्रोल इस्तेमाल करने वाले लोग सदमे में हैं। देश के इतिहास में पहली बार एक साथ भाव इतना बढ़ाया गया है। सरकार का तर्क यह है कि कई महीने पहले पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से बाहर कर देने के बाद अब यह पेट्रोलियम कंपनियों के तय करने की बात हो चुकी थी कि वे पेट्रोल का दाम कितना रखें। लेकिन जिस तरह से संसद का सत्र खत्म होने के एक दिन बाद ही, सरकार की राजनीतिक सहूलियत का ध्यान रखते हुए यह बढ़ोतरी की गई है, उससे जाहिर है कि सरकार की इन सार्वजनिक क्षेत्र कंपनियों पर सरकार अपने असर का इस्तेमाल तो करती ही है।
लेकिन इन मामूली बातों पर जाने के बजाय आज यह समझने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम और भारतीय रुपये के दाम में जब भी घट-बढ़ होगी तब उसका बोझ किस पर जाए? यह एक बड़ा लोकप्रिय और लुभावना राजनीतिक नारा हो सकता है कि केंद्र सरकार इस बोझ को उठाए और पेट्रोल, डीजल, रसोईगैस और मिट्टी तेल पर सबसिडी जारी रखे। लेकिन सरकार की कोई भी सबसिडी उसकी कमाई से ही निकलती है और किसी दूसरे खर्च में कटौती से ही ऐसा रास्ता बन पाता है। अब यह देखें कि पेट्रोल के दाम में सरकारी रियायत का फायदा किन लोगों को होगा। देश में बड़ी-बड़ी कारें दौड़ाने वाले लोग, महंगी दुपहिया चलाने वाले लोग भी वही रियायती पेट्रोल पाते हैं जो कि सस्ते दुपहिया चलाने वाले लोग पाते हैं। और शायद देश की आधी आबादी ऐसी होगी जिसका पेट्रोल से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह आबादी या तो साइकिल चलाती है या डीजल से चलने वाली निजी और सरकारी सार्वजनिक गाडिय़ों में मुसाफिर की तरह चलती है। जिस देश में आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो, वहां पर सरकारी खजाने से निकलने वाली किसी भी रियायत का एक छोटा या बड़ा जैसा भी हिस्सा बड़ी गाडिय़ों और महंगी मोटरसाइकिलों पर भी जाता है, तो उस रियायत को सही कैसे ठहराया जा सकता है? किसी भी समझदार देश में लोगों को अपने इस्तेमाल का भुगतान करने की आदत होनी चाहिए। रियायत का हक सबसे गरीब तबके के लिए ही होना चाहिए। अभी रसोईगैस में रियायत को संपन्न तबके के लिए खत्म करने की तैयारी हो चुकी है। आयकर देने वाले लोग किस तर्क के आधार पर रसोईगैस या पेट्रोल में रियायत पाएं?
आज लोगों पर इसका जो भी बोझ पड़ रहा है उसकी जिम्मेदारी सरकार पर हम एक दूसरी वजह से मानते हैं न कि महंगे पेट्रोल की वजह से। सरकार को इस देश में सार्वजनिक परिवहन का ऐसा ढांचा खड़ा करना चाहिए था जिससे कि हर आयवर्ग के लोगों की शहरी आवाजाही के लिए उन्हें अपनी जरूरत और पसंद के लायक बसें मिलतीं। बसों के अलावा कहीं पर रेलगाडिय़ों और कहीं पर भूमिगत मेट्रो। इनका ऐसा जाल अभी तक बिछ जाना था कि लोग अपनी गाडिय़ों पर चलने के बजाय इन पर चलते। आज अगर महंगी कार वालों के लिए एयरकंडीशंड बसें रहतीं तो बहुत से लोग कार के बजाय उनमें चलते हुए, या तो ड्राइविंग से बचते या ड्राइवर के खर्चे से बचते और उसमें कुछ पढ़ते हुए या कम्प्यूटर पर काम करते हुए चलते। आज दिल्ली में अगर कोई मेट्रो को देखे, और यह कल्पना करे कि उसके तमाम मुसाफिर अपनी निजी गाडिय़ों पर चलें, तो उस तस्वीर में दिल्ली की सड़क का एक इंच का हिस्सा भी खाली नहीं बचेगा। इसलिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की अहमियत केंद्र और राज्य सरकारों को समझनी थी, लेकिन आटोमोबाईल लॉबी के चलते जिस तरह अमरीका में चलते-फिरते रेल यातायात को खत्म किया गया था, उसी तरह भारत में शहरी परिवहन ढांचा खड़ा नहीं होने दिया गया। जिस राजधानी दिल्ली में देश के नेता बसते हैं, और जहां पर सुप्रीम कोर्ट के जज खुद प्रदूषण झेलते हैं, वहीं पर ऐसी योजनाएं बन सकीं। लेकिन बाकी देश में सैकड़ों शहरों में ऐसा कोई काम नहीं किया गया।
दूसरी बात शहरी योजना की यह भी रहती है कि लोगों की गैरजरूरी आवाजाही को कैसे घटाया जाए? भारत के शहरों में लोगों के लिए इस तरह का ढांचा नहीं बनाया गया कि कम से कम दूरी पर उन्हें अधिक सुविधाएं मिल सकें। इसका नतीजा है कि शहर के व्यस्त इलाकों में लोगों को जरा-जरा से सामान या काम के लिए जाना पड़ता है। एक तरफ बसों की कमी, दूसरी तरफ शहरी योजना की कमजोरी, नतीजा यह हुआ कि लोग अपनी गाडिय़ों के बेबसी में मोहताज होते चले गए। आज जो राजनीतिक दल इस बढ़ोतरी को लेकर सड़कों पर हैं उन सबने कहीं-कहीं सरकारें चलाई हैं, और नारों से परे एक ठोस काम करने की जिम्मेदारी उन्होंने पूरी नहीं दिखाई।
एक आखिरी बात यह कि महंगे पेट्रोल के आयात को लेकर दाम में बढ़ोतरी का जो तर्क दिया जा रहा है, उसके साथ-साथ केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा टैक्स भी उस महंगे दाम पर अपने-आप बढ़ जा रहा है। पेट्रोलियम कंपनियां तो अपने घाटे को दूर करने के लिए दाम बढ़ा सकती हैं, लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें तो उस पर अपने टैक्स घटा सकती हैं। हमारे हिसाब से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि टैक्स प्रतिशत के आधार पर न लगकर एक तय रकम का लगे जिससे कि आयात का बोझ और अधिक बढ़कर जनता पर न पड़े। सरकारें बैठे-ठाले किस बात की अधिक कमाई करें? केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत अपने टैक्स घटाकर पांच बरस पहले के टैक्स की रकम जितने करने चाहिए ताकि लोगों को एक राहत मिल सके। केंद्र और राज्य के बजट में इस अतिरिक्त कमाई को तो रखा ही नहीं जाता है इसलिए उनको कोई घाटा नहीं होने वाला है, जनता की तकलीफ से सरकारों को अधिक कमाई का मौका मिलना क्यों जरूरी हो?

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