संसद को कुएं में गिरा हाथी समझ लात मारते अन्ना-बाबा


02 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ से अपनी किसी यात्रा की शुरूआत करते हुए बाबा रामदेव ने कई किस्म की उटपटांग बातें कहीं। जाहिर है कि मीडिया में उनको इसका भरपूर फायदा भी मिला और दुर्ग से दिल्ली तक इन बातों पर हंगामा शुरू हो गया है। भगवे कपड़ों में संन्यासी होने का दावा और दिखावा करने वाले रामदेव अपने दवाईयों के अरबों के कारोबार के अकेले मालिक भी हैं और देश के बड़े-बड़े कारोबारियों के चहेते भी हैं। इसलिए वे बड़े कारोबारी मीडिया में खुलकर जगह भी पाते हैं और फिर उनकी बातें भारी गैरजिम्मेदारी की इतनी अलोकतांत्रिक, इतनी तर्कहीन और कमसमझ होती हैं कि उनको खबरों में अच्छी जगह मिलना तय रहता है। सांसदों को गालियां देने वाले वे आज के सार्वजनिक जीवन में अन्ना-टोली के अरविंद केजरीवाल के साथ कड़ा मुकाबला कर रहे हैं और कल उन्होंने अपनी इस हरकत में केजरीवाल को कोसों पीछे छोड़ दिया है। उनकी बातें इतनी भयानक अलोकतांत्रिक कि वे उनके धार्मिक चोले का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करती हैं। धर्म और आध्यात्म जब राजनीति में उतरता है तो वह इसी तरह का घातक और जानलेवा हो जाता है, और जब ऐसे खूंखार की पीठ पर कोई राजनीतिक दल सवारी करता है, कोई नेता सवारी करता है तो आगे-पीछे उसका क्या अंजाम होता है यह भारत में बचपन से लोग कहानियों में पढ़ते आए हैं। 
छत्तीसगढ़ में रामदेव ने खुलकर कैमरों के सामने, माईक पर और मंच पर सांसदों के बारे में कहा- देश की संसद के भीतर हत्यारे, लुटेरे और जाहिल बैठे हैं।  543 रोगी हिंदुस्तान चला रहे हैं। उन्होंने सांसदों पर निशाना साधते हुए कहा- वहां (संसद) लुटेरे और हत्यारे बैठे हैं। सत्ता की कुर्सी पर इंसान की शक्ल में हैवान बैठे हैं। हमने उन्हें कुर्सी पर बैठा दिया, लेकिन उन्हें कुर्सी पर बैठने का अधिकार नहीं है। वो सत्ता करने की पात्रता नहीं रखते। वो देश चला हैं क्योंकि हमने ऐसा ही सिस्टम बना दिया है। हमने भी मान लिया कि 543 रोगी हिंदुस्तान चलाएंगे। हालांकि उनमें कुछ लोग अच्छे भी हैं।  बाबा रामदेव ने कहा कि हिंदुस्तान की संसद को बचाना होगा।
इस बात पर संसद अगर अवमानना की कोई कार्रवाई करती है तो जनता के एक तबके के बीच जेल से निकलकर रामदेव और बड़े हीरो बन सकते हैं। दरअसल लोकतंत्र की समझ जब तक जनता में विकसित नहीं होती तब तक इस तरह के मजमेबाज लोग अपनी उटपटांग बातों पर वाहवाही पाते ही रहेंगे। जनता के एक तबके को या तो यह समझ आने में कुछ दिक्कत होती है, या वह इसे समझना नहीं चाहती कि संसदीय लोकतंत्र का बेहतर विकल्प किसी किस्म की भगवा या खादी तानाशाही नहीं हो सकती। आज अन्ना और बाबा की टोलियां सब्बल और घन लेकर संसद के पिलर गिराने में जुटे हुए हैं। संसद के भीतर अधिक गिनती वाली कांगे्रस और भाजपा जैसी जो पार्टियां हैं वे केंद्र और राज्य की सरकारों में अपने लोगों के अनगिनत कुकर्मों को लेकर आज एक सन्नाटे की हालत में जी रही हैं और एक-दूसरे पर जुबानी हमलों से परे वे किसी नैतिकता की बात करने की हालत में नहीं हैं। लेकिन जिस जुबान में केजरीवाल और रामदेव सांसदों को गालियां दे रहे हैं, उन्हें कातिल और बलात्कारी बता रहे हैं, उन्हें लुटेरे और जाहिल बता रहे हैं, उसका कोई तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार नहीं है। इसी संसद में बहुत से भले लोग हैं, बहुत सी भली पार्टियां हैं और बहुत सी बुरी पार्टियों के भी भले लोग इस संसद में हैं। इन सबको एकमुश्त अपराधी करार देना तकनीकी रूप से भी गलत है। संसद ने केजरीवाल के मामले में जब अधिक कड़ा रूख नहीं दिखाया तो लोगों का हौसला और उत्साह दोनों मानो बढ़ते चले गए। और अन्ना-बाबा की ये टोलियां अपने शुरूआती दिनों से ही लोकतंत्र को लात मारकर चल रही हैं, और ऐसे लोगों के सैलाब पर सवार हैं जो कि भीड़ के दिमाग की तरह, लोकतांत्रिक समझ से दूर हैं। किसी भी लोकतंत्र में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं होती है।
छत्तीसगढ़ में कल रामदेव ने राज्य के और देश के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर नक्सलियों द्वारा की जा रही मांगों का समर्थन किया और उन्हें सही भी ठहराया। लेकिन कल की खबरों में ही उनके चेहरे के इर्दगिर्द ऐसे अरबपतियों के चेहरे टीवी के परदे पर छाए रहे जिनके औद्योगिक घराने आदिवासियों की जमीनों को बेईमानी से खरीद रहे हैं और जिनके उद्योग कई तरह के कानून तोड़ रहे हैं। ऐसे लोगों पर सवार होकर रामदेव संसद पर लात मार रहे हैं। आज इस देश में संसद का हाल कुएं में गिरे हुए एक हाथी जैसा बना दिया गया है जिस पर मेंढ़क भी कूद-कूदकर लात मार रहे हैं। हम इस बात को एक मिसाल की तरह ही यहां लिख रहे हैं क्योंकि मेंढ़क ने ऐसा कोई कुसूर नहीं किया है कि उसकी तुलना हम इन कमसमझ और बदनीयत इंसानों से करें। संसद में बैठे लोगों की अपनी कमजोरियां हो सकती हैं, लेकिन वे लाख-लाख लोगों के वोटों से वहां पहुंचे हुए होते हैं और किसी भी अन्ना-बाबा के मुकाबले देश की जनता की प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। लोकतंत्र का ऐसा विकल्प किसी तरह मंजूर नहीं किया जा सकता कि किसी रंग या किसी धागे के कपड़ों के भीतर से पूरी तरह अलोकतांत्रिक नारे लगाए जाएं और बेइंसाफी की बात की जाए।
हमारा ख्याल है कि संसद को ऐसी ओछी जुबान के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और उन राजनीतिक दलों को खासकर सोचना चाहिए जो कि अन्ना-बाबा के कांगे्रस विरोधी अभियान का मजा लेते हुए उनके पीठ पर बैठकर सत्ता तक सफर को बेहतर समझ रहे हैं।

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