उत्तरप्रदेश का नया मुख्यमंत्री, और पुराने अपराध जारी


28 मई 2012
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के एक थाने में पुलिस की निगरानी में उसके एक दोस्त ने वहां लाई गई एक तीर्थयात्री लड़की के साथ बलात्कार किया। इस खबर की जो तस्वीरें टीवी समाचार में देखने मिली रही हैं उनमें पूछताछ करती हुई महिला अफसर अपने बगल में इस लड़की को खड़ा रखकर उसका बयान नोट कर रही है। पूरा उत्तरप्रदेश तरह-तरह की हिंसा, गुंडागर्दी और लूटपाट की घटनाओं से भर गया है। मायावती के पेश किए गए आंकड़ों पर न भी जाएं तो रोजाना ऐसी खबरें आती हैं कि वहां इतनी हत्याएं हो रही हैं और इतने बलात्कार हो रहे हैं। सत्ता से जुड़े लोग लगातार इन अपराधों से जुड़े मिल रहे हैं और कमोबेश इसी तरह का हाल मायावती के विधायकों और मंत्रियों का था जिनके खिलाफ ऐसे मामले दर्ज होते ही रहते थे और उनकी सत्ता से रवानगी भी होते रहती थी। समाजवादी पार्टी के मौजूदा मुखिया मुलायम सिंह एक तरफ अंबानी के करीब हैं तो दूसरी तरफ अमिताभ और तीसरी तरफ सहारा के सुब्रत राय के करीब। कारोबार की दुनिया के इतने बड़े-बड़े लोगों के साथ दोस्ती के बाद भी अगर समाजवादी पार्टी के नजरिए में आज की लोकतांत्रिक दुनिया के तकाजे के मुताबिक कोई सुधार नहीं हुआ है तो यह एक बड़ी शर्मिंदगी की बड़ी निराश करने वाली बात है। 
उत्तरप्रदेश में एक नई पीढ़ी ने काम संभाला है और मुलायम के बेटे अखिलेश यादव देश के सबसे कमउम्र मुख्यमंत्री हैं। उनसे लोगों को लगता था कि उत्तरप्रदेश की परंपरागत जुर्म भरी राजनीति से बाहर आकर कड़ाई से एक ऐसा माहौल बनाएंगे जिससे कि बाहर के लोग भी ताजमहल और बनारस से परे इस प्रदेश में आना चाहें। लेकिन उनका अब तक का रूख ऐसा दिखता नहीं है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि समाजवादी पार्टी और बसपा, इन दोनों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच देश-प्रदेश के कानून को लेकर जो गहरी हिकारत दशकों से वहां चली आ रही है उसे रातों-रात बदलना अभी सत्ता के हनीमून से गुजर रहे नए मुख्यमंत्री के लिए एकदम से मुमकिन न हो। लेकिन हम इन बड़ी उम्मीदों से परे भी इस बात को लेकर बहुत हताश और हक्का-बक्का हैं कि आईएएस और आईपीएस जैसे अफसर जो कि देश भर से चुनकर राज्यों में भेजे जाते हैं, वे भी उत्तरप्रदेश में इस कदर बेअसर कैसे हो जाते हैं और कैसे उनके अधिकार क्षेत्र में लगातार तरह-तरह के जुर्म होते हैं? बगल का बिहार जो कि लालू राज में हर किस्म की अराजकता देख चुका है, वहां पर अभी नितिश कुमार का एक कार्यकाल पूरा होते न होते माहौल बहुत बदल गया है। और पहले के मुकाबले वहां गुंडागर्दी और रंगदारी कुछ कम है। उत्तरप्रदेश में चाहे इस सत्ता के इन महीनों में अखिलेश यादव कुछ न कर पाएं हों, लेकिन अगर उन्हें इस देश में बाकी प्रदेशों के मुकाबले किसी भी तरह टिककर खड़े रहना है तो उन्हें राज्य का माहौल सुधारना होगा। एक बलात्कार किसी राज्य में वहां आकर काम करने की संभावना वाली हजारों महिलाओं का हौसला पस्त कर देता है और लोग किसी दूसरे राज्य में जाने की संभावना देखने लगते हैं। ऐसे में उत्तरप्रदेश में पूंजीनिवेश भी उतना नहीं जुट सकेगा जितना कि उसका हक बन सकता है। 
दरअसल किसी प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति और वहां पर कानून-व्यवस्था का हाल रातों-रात नहीं सुधर सकता। इसके लिए लंबी कोशिश लगती है, लगातार कोशिश लगती है। जिस तरह देश के कई राज्य साम्प्रदायिक हिंसा के आदी हो गए हैं और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य साम्प्रदायिक हिंसा से परे हैं, इसी तरह अलग-अलग राज्यों में मेहनत से एक ऐसा माहौल बनाना पड़ता है जिसमें कानून का सम्मान हो।  उत्तरप्रदेश में राजनीतिक ताकतों का अपराध से रिश्ता गहरा है और इसे तोडऩे की जरूरत है वरना वहां आने-जाने वाले लोग भी अपने-आपको सुरक्षित महसूस नहीं करते। आज देश में कोई एक राज्य अराकता के पैमाने पर इतना ऊपर हो यह बात शर्मनाक है।

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