11 मई 2012
संपादकीय
मध्यप्रदेश में पिछले दो-चार दिनों में लोकायुक्त के छापों में करोड़पति से अरबपति बनने के करीब पहुंच चुके अफसर पकड़ाए हैं, जिनके बारे में हमारी सहज समझ यह कहती है कि किसी भी भ्रष्ट पर छापे में उसकी काली कमाई का एक चौथाई हिस्सा भी बरामद नहीं हो सकता क्योंकि वह लंबी नौकरी के दौरान कई किस्म से बेनामी खपा दिया जाता है। इसके बाद भी वहां पर लगातार स्वास्थ्य विभाग के अफसरों से सौ-पचास करोड़ की जायदाद मिल रही है, आईएएस जोड़े से सैकड़ों करोड़ की जब्ती आयकर विभाग बना चुका है, और उसी किस्म का भ्रष्टाचार शायद कुछ कम हद तक छत्तीसगढ़ में भी सामने आते ही रहता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे वाले मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह भ्रष्टाचार किन लोगों के हक पर डाका डालकर होता है?
कुपोषण के शिकार बच्चों की मध्यप्रदेश की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं वे देखते भी नहीं बनतीं। इन लोगों के हक को स्वास्थ्य विभाग या महिला और बाल विकास विभाग या खाद्य विभाग देश के जिन प्रदेशों में भी खा रहे हैं, वहां पर सरकारों को मौजूदा कानून से परे कुछ और सोचना होगा। और देश के कोई प्रदेश थोड़े बहुत कम भ्रष्ट होंगे तो उनकी बात न भी करें, अधिकांश राज्यों में हर किस्म से लूटपाट जारी है। कल ही उत्तरप्रदेश में दस हजार करोड़ के एक स्वास्थ्य घोटाले में वहां के एक बड़े आईएएस अफसर को गिरफ्तार किया गया है, जिनकी पत्नी भी आईएएस है। उत्तरप्रदेश में आईएएस अफसरों के भ्रष्टाचार का मूल्यांकन भी वहां का आईएएस एसोसिएशन करते आया है और बहुत से दिग्गज अफसर जेलों मेें हैं। ऐसे में देश में एक अलग कानून की जरूरत है। हमारे हिसाब से जिस तरह का कानून अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों को एक खास हिफाजत देने के लिए बना है, जिस तरह महिलाओं को समाज में एक कमजोर दर्जे की वजह से जुल्म से बचाने के लिए एक खास मजबूत कानून बना है, उसी तरह का एक कानून, एक खास कड़ा कानून बनाने की जरूरत है जो कि सबसे गरीब तबके के लिए बनाए गए कार्यक्रमों के भ्रष्टाचार से बचाने वाला हो। सरकार की बहुत से योजनाएं सीधे-सीधे सबसे गरीब और सबसे कमजोर के लिए नहीं होतीं। लेकिन बहुत सी योजनाएं सिर्फ सबसे गरीब के लिए होती हैं। इनमें फायदा जिन कमजोर लोगों के लिए रखा गया है, उनके हक पर डाका डालकर अगर कोई भी व्यक्ति भ्रष्टाचार करे, तो उसकी सजा दूसरी योजनाओं में भ्रष्टाचार के मुकाबले अधिक कड़ी होनी चाहिए। मतलब यह कि किसी पुल या सड़क के मामले में होने वाले भ्रष्टाचार से सबसे गरीब पर अकेले पर वार नहीं होता। लेकिन सरकारी इलाज, सरकारी रियायती अनाज, सरकारी पोषण-आहार, वृद्धावस्था पेंशन जैसे बहुत से ऐसे कार्यक्रम हैं जो सीधे-सीधे सबसे गरीब के भले के लिए हैं। ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार की सजा बहुत अधिक रखनी चाहिए। एक ट्रेन के एसी डिब्बे में मुसाफिर से रिश्वत लेने वाले रेल अधिकारी को जो सजा हो, एक साधारण मुसाफिर से रिश्वत लेने की सजा उससे अधिक होनी चाहिए। एक कार के रजिस्ट्रेशन के लिए रिश्वत लेने की सजा जो हो, उससे कई गुना अधिक सजा एक वृद्धावस्था पेंशन की मंजूरी के लिए ली जाने वाली रिश्वत की होनी चाहिए।
जिस तरह दलित-आदिवासी और महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की जांच के लिए अलग पुलिस है, अलग कानून है ताकि तेजी से काम हो सके, जमानत के नियम अधिक कड़े हैं, उसी तरह सबसे गरीब के लिए बने हुए कार्यक्रमों का एक अलग से दर्जा घोषित होना चाहिए और गरीब के हकों की हिफाजत के लिए एक अलग कड़ा कानून बनना चाहिए। ठेकेदार या उद्योगपति अपने से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लड़ाई लड़ सकते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से गरीब के पास तो ऐसी कोई ताकत होती नहीं। फिर ऐसे लोगों के हक लूटने वालों की हैवानियत को भी एक अलग कतार में रखने की जरूरत है।
राज्य सरकारों को और केंद्र सरकार को यह चाहिए कि उनके पास ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार के जो मामले बरसों से मंजूरी के लिए पड़े हुए हैं, उन पर तेज रफ्तार से विचार करके फैसले लिए जाएं।
आज देश में एक भावना यह भी फैल रही है कि नक्सली जब अपहरण करके अपने सारे मामलों पर तेजी से विचार के लिए सरकार की कमेटी बनवा सकते हैं, और छत्तीसगढ़ में ऐसी कमेटी बैठकर विचाराधीन नक्सल बंदियों के मामले देश रही है, तो जो गैरनक्सल हैं, और जिनका संभावित सजा से अधिक वक्त जेल में कट चुका है, उनके मामलों पर विचार के लिए कमेटी बनवाने के लिए कौन से उग्रवादी किसका अपहरण करें? जिस तरह नक्सल-कब्जों के आदिवासी इलाके सरकार के हाथ से निकल गए हैं, क्या उन इलाकों से परे के गरीब इलाके में लोकतंत्र पर अपना भरोसा उसी तरह खो बैठेंगे? इसलिए सरकारों को गरीबों को एक अलग हिफाजत देने का काम करना होगा, उनसे जुड़े विभागों पर एक अलग निगरानी रखनी होगी, उनमें भ्रष्टाचार पर तेजी से कार्रवाई की मंजूरी देनी होगी और एक अलग कड़ी सजा भी उसके लिए रखनी होगी, इसके बिना गरीब भी किसी दिन लोकतंत्र के खिलाफ गर खड़े हो जाएंगे तो सरकारें कहां जाएंगी?

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