22 मई 2012
संपादकीय
बारहवीं के नतीजे निकले तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक गरीब मुस्लिम परिवार की लड़की ने लगातार दूसरे बरस फेल होने पर आग लगाकर आत्महत्या कर ली। यह तो बात इम्तिहान की थी लेकिन इससे परे भी साल भर आत्महत्या की खबरें आती हैं कि कहीं पे्रमी जोड़े ने आत्महत्या कर ली तो कहीं किसी एक अकेले निराश इंसान ने। समाज में तनाव लगातार बढ़ते चल रहा है, मुकाबला बढ़ते चल रहा है और नाकामयाबी की नौबत आने पर लोग खुदकुशी की सोचने लगते हैं। यह असफलता परीक्षा की भी हो सकती है और किसी पे्रम-प्रसंग की भी। लेकिन जब कोई जान चली जाती है तभी वह खबर बनती है। निराशा में जीते हुए लोग, तनाव में डूबे हुए लोग किसी तरह की खबर नहीं बनते और इस सामाजिक तकलीफ की तरफ ध्यान भी नहीं जाता।
हम छत्तीसगढ़ राज्य को ही चर्चा के लिए लें, तो सरकारी मेडिकल कॉलेज और निजी पै्रक्टिस करने वाले मनोचिकित्सकों सबको गिन लें तो दो करोड़ की आबादी पर दो सौ मनोचिकित्सक भी छत्तीसगढ़ी लोगों को नसीब नहीं हैं। चिकित्सकों के नीचे मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए शायद पूरे राज्य में इतने लोग भी नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि कहीं पढ़ाई की दिक्कत, कहीं परिवार के लोगों के साथ कोई तकलीफ और कहीं पे्रम-प्रसंग या शादी-शुदा जिंदगी के तनाव, लोगों का एक बड़ा हिस्सा मानसिक तकलीफ में जीता है और उसके पास किसी तरह का कोई इलाज नहीं होता, उसे कोई सलाह नसीब नहीं होती, और ऐसी दिमागी हालत में समाज में उसका वह योगदान कभी नहीं हो सकता जो कि अधिक जिम्मेदार देशों में एक नागरिक का होता है। फिर भारत तो ऐसे पाखंडी देशों में से है जहां पर पे्रम के खिलाफ नफरत है और जहां पर बच्चों के शोषण को लोग पश्चिमी बुराई मानते हैं जो कि भारत में मौजूद ही नहीं हो सकती। पति-पत्नी के बीच के रिश्ते गैरबराबरी के हैं जहां पर पत्नी का एक भड़ास के साथ जीना तय रहता है। लड़के-लड़कियों को उनकी उम्र के मुताबिक मिलना-जुलना कम नसीब होता है और जितने पे्रम-विवाह होते हैं, उनसे सौ गुना अधिक पे्रम-संबंध मां-बाप कुचलकर फेंक देते हैं।
ऐसे में न सिर्फ हताश-निराश लोगों को मनोचिकित्सा और परामर्श की जरूरत होती है बल्कि उनके पूरे परिवार को इसकी जरूरत रहती है। लेकिन यह है कहां पर? इस राज्य को बने एक दशक से अधिक हो गया है लेकिन सरकार ने एक भी चिकित्सा महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में इस किस्म के कोई कोर्स शुरू नहीं किए। नतीजा यह है कि आबादी बढ़ रही है, तनाव तो बढ़ ही रहा है, उसके इलाज की कोई संभावना नहीं बढ़ रही। और तनाव से कुछ कम दर्जे की बात करें, तो स्कूल-कॉलेज के बच्चों को आगे की पढ़ाई और कामकाज के बारे में मार्गदर्शन देने के लिए सलाहकारों और मानसिक परामर्शदाताओं की जो जरूरत है वह तो अच्छी खासी महंगी स्कूलों में भी पूरी नहीं हो पाती है। दरअसल इस समाज में मानसिक जरूरतों के लिए समझ ही कम है। लोगों को लगता है कि डांटने-फटकारने से सारा काम निकल जाता है और बच्चे पटरी पर आ जाते हैं। यह सिलसिला बदलने की जरूरत है। इस विषय के जो जानकार हैं उनको समाज से लेकर सरकार तक एक बहस छेडऩे की जरूरत है जिसमें हमारे हिसाब से अखबारों में लिखकर, कुछ सार्वजनिक चर्चा करवाकर, सरकार को समझाकर इलाज करना चाहिए।
राज्य सरकार को अपने विश्वविद्यालय में मनोचिकित्सा की पढ़ाई का विस्तार करके, परामर्श के कोर्स भी शुरू करने चाहिए, बढ़ाने चाहिए और सरकारी अस्पतालों में इनके लिए काम की जगह निकालने के साथ-साथ बड़े कॉलेज और स्कूलों में भी उनके लिए काम निकालना चाहिए। आज नौकरी की गुंजाइश नहीं होती इसलिए भी किसी पढ़ाई की तरफ लोग नहीं जाते। हालांकि हमारा यह मानना है कि मनोचिकित्सकों से लेकर परामर्शदाताओं तक के लिए राज्य में निजी पै्रक्टिस की भी भरपूर संभावना है। इस राज्य में एक बाल कल्याण परिषद नाम संवैधानिक संस्था है, महिला आयोग है, मानवाधिकार आयोग है, हमारे हिसाब से इस बारे में पहल करने की संवैधानिक जिम्मेदार इन सभी संस्थाओं की है। अपनी लालबत्तियों से बाहर आकर इनको समाज के तनाव को देखना चाहिए और सरकार को सुविधाएं बढ़ाने के लिए कहना भी चाहिए।

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