कानून कुचलता जिंदल


27 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में उद्योगों का फायदा और उनका नुकसान दोनों जो जिले झेल रहे हैं,  उनमें से एक रायगढ़ में वहां के दानवाकार उद्योग जिंदल पर कल कलेक्टर की बनाई सरकारी टीम ने जब छापा मारा तो इतने किस्म के नियम कुचले पड़े मिले कि जिनकी वजह से किसी दूसरे गरीब को बरसों की कैद हो गई रहती। लेकिन देश के सबसे ताकतवर और पैसे वाले उद्योगपतियों में से एक नवीन जिंदल कांगे्रस पार्टी के सांसद भी हैं और वे जब कानून को अपने कड़े बूट से कुचलते हैं, तो उनके हाथों में वह हिंदुस्तानी झंडा होता है जिसे फहराने के हक के नाम पर जीते मुकदमे की शोहरत से वे अपने-आपको बड़ा देशभक्त साबित करते हैं। छत्तीसगढ़ में हकीकत यह है कि इस राज्य के इतिहास में किसी कारखानेदार ने अगर सबसे अधिक कानून तोड़े हैं तो वे नवीन जिंदल हैं। यहां से हजारों करोड़ हर बरस कमाने के साथ-साथ वे यहां अपने कारखाने का जहर हवा से लेकर पानी तक घोल रहे हैं, मजदूरों का हक मार रहे हैं, प्रदूषण रोकने की मशीनें न चला कर बिजली बचा रहे हैं, और यह सब हमारा कहना नहीं है, यह सब एक नौजवान और कड़क कलेक्टर की कार्रवाई में कल सामने आया है। 
छत्तीसगढ़ में कम से कम हमारे अखबार के पाठक तो यह जानते ही हैं कि किस तरह देश के पर्यावरण के कानूनों को जिंदल बरसों से तोड़ते आया है। बिना इजाजत बिजलीघर बनाना शुरू कर देने पर नवीन जिंदल की ही कांगे्रस पार्टी के राष्ट्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने राज्य सरकार को निर्देश भेजकर रायगढ़ की जिला अदालत में जिंदल के खिलाफ अपराधिक मामला चलाने को कहा था और वह मामला अभी चल ही रहा है। इसके बाद राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यह पाया कि जिंदल की कोयला खदान को स्थानीय मंजूरी मिलने के लिए पर्यावरण सुनवाई पूरी तरह फिक्स की गई थी और किसी को मुंह खोलने का हक नहीं मिला, पूरी धौंस और पूरे बाहुबल के साथ यह जनसुनवाई पुलिस के साए में खत्म कर दी गई और उसे जनता की सहमति मान लिया गया। बरसों बाद जाकर अब देश की इस सबसे बड़ी पर्यावरण संवैधानिक संस्था ने जिंदल को मिली इजाजत खारिज करते हुए दोबारा जनसुनवाई में जाने का फैसला दिया है। 
आज पूरे प्रदेश में देश के कुछ और हिस्सों की तरह, जिस तरह से कारखानों के खिलाफ, खदानों के खिलाफ आम जनता के मन में नफरत खड़ी हो चुकी है, उसी का नतीजा है कि जगह-जगह नक्सली पैर जमा पा रहे हैं और उन्हें जनता के कम से कम एक हिस्से का तो साथ मिल ही रहा है। एक तरफ जब अरबपति और खरबपति कारखानेदार जनता की जिंदगी में जहर घोलते हुए, मजदूरों का हक छीनते हुए, मनमानी कर रहे हैं, तब इसी राज्य में फिलहाल तो दूसरे हिस्सों में हमारे जवान नक्सलियों से निपटते हुए रोजाना जान दे रहे हैं। आखिर कितना और वक्त लगेगा जब कारखानों के इलाकों में भी जमीन खोने वाले, सांस खोने वाले, आस खोने वाले लोग ऐसे कारखानेदारों से निपटने के लिए नक्सलियों को समर्थन देना शुरू कर देंगे? यह एक भयानक नौबत है कि जो कारखानेदार राजधानी रायपुर के चौराहों पर लाख-दो लाख खर्च करके अपने नाम की करोड़ों रुपए के बराबर की शोहरत के बोर्ड लगा लेता है, वह कारखानों और खदानों पर लागू होने वाले हर कानून को तोड़ते हुए मिलता है। जिंदल के सामने खड़े होने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का क्या हाल होता है यह भी लोगों ने देखा हुआ है। और जिंदल की मनमानी के खिलाफ, उसके कानून तोडऩे के खिलाफ इस राज्य में बहुत से तबकों में जिस तरह की चुप्पी के साथ सन्नाटा रहता है, उसकी वजह भी हर कोई जानता है। 
हम रायगढ़ के इस नौजवान कलेक्टर की पहल, और उसके पीछे राज्य सरकार की सहमति की तारीफ करते हैं कि सिर्फ ताकतवर होने से जिंदल को जनता का जीना हराम करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। और जब इतने सारे कानून कुचलने की बात सामने आ गई है, लगातार दिल्ली से लेकर बिलासपुर और रायपुर तक अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं में जिंदल के खिलाफ फैसले हो रहे हंै, तो ऐसी कंपनी को चौराहों पर कुछ लाख खर्च करके महानता का दर्जा पाने का मौका क्यों देना चाहिए? क्या अपराधों में फंसे हुए बाकी लोगों को भी सरकार ऐसा मौका देगी?

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