हत्या और मां-बाप


21 मई 2012
संपादकीय
आज से अदालत में फिर आरूषि हत्याकांड की सुनवाई तेजी से आगे बढऩे वाली है। यह मामला दिल्ली का होने की वजह से खबरों में जरूरत से हजार गुना अधिक रहा और पूरे देश में इस पर चर्चा भी जरूरत से हजार गुना रही। नतीजा यह हुआ कि अखबारों में और टेलीविजन पर इस हत्याकांड में मां-बाप की गिरफ्तारी और उन पर सीबीआई का चलाया जा रहा मुकदमा खबरों में इस कदर रहा कि देश भर में बच्चों से लेकर बड़ों तक को मानसिक तनाव झेलना पड़ा। अभी भी बहुत से बच्चे इस तनाव में जीते हैं कि उनके मां-बाप भी उन्हें मार सकते हैं। भारत में चूंकि बच्चों के मानसिक तनाव को लेकर किसी किस्म की चर्चा या सलाह-मशविरे का रिवाज नहीं है इसलिए कोई यह अंदाज लगाने वाले नहीं हैं कि दो कत्लों की यह खबर देश में कितना सामाजिक तनाव खड़ा कर गई है और बच्चों के दिल-दिमाग पर इन खबरों का कितना बुरा असर पड़ा है। इस बात पर आज यहां लिखना इसलिए भी ठीक और जरूरी लग रहा है क्योंकि सीबीआई ने इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ हासिल बताया है उसमें इस बच्ची के कत्ल के लिए मां-बाप के खिलाफ और कोई सुबूत नहीं दिखे हैं, केवल यही सुबूत दिखा है कि किसी और के खिलाफ कोई सुबूत नहीं हैं। पहली नजर में अभी तक कि सीबीआई की कही बातें ये हैं कि चूंकि और कोई कत्ल करने की हालत में नहीं था, किसी और की लाशों तक पहुंच नहीं थी, इसलिए मां-बाप ने ही यह किया होगा। हम अभी इस केस पर अधिक जाना नहीं चाहते क्योंकि वह तो अदालत में तय होगा, लेकिन एक बात पर बहुत तकलीफ के साथ लगती है कि हत्या के चार बरस बाद भी आज हर कुछ दिनों में मां-बाप अदालत में घसीटे जाते हैं, मीडिया के कैमरे उनको हर बार बाकी देश के सामने पेश कर देते हैं, और चार बरसों के लंबे अरसे के बाद भी अभी यह तय नहीं है कि केस मां-बाप के खिलाफ कितना वजनदार है। 
अब हम सिर्फ बहस के लिए एक ऐसी नौबत सोचते हैं जिसमें कि इस बच्ची के मां-बाप अदालत से बरी हो जाते हैं। आगे चलकर अगर ऐसा होता है, तो इन बीते चार बरसों में, या इनकी गिरफ्तारी के बाद के ढाई-तीन बरस में इनकी जो प्रताडऩा हुई है, उसकी भरपाई कैसे होगी? जब भारतीय न्याय-व्यवस्था की भावना यह है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए, तो ऐसे में कत्ल की शिकार लड़की के मां-बाप की बरसों तक चली जांच और बरसों तक चली प्रताडऩा हमें एक बड़ी बेइंसाफी लगती है। मां-बाप पर शक करने की अगर कोई वजह है तो भी या तो यह जांच कुछ जल्दी होनी चाहिए थी, या फिर मां-बाप को इतने लंबे समय तक मुकदमे की सुनवाई के पहले जांच और अदालत की प्रताडऩा से दूर रखना चाहिए था। हो सकता है कि ऐसी नौबत देश में बहुत से दूसरे लोगों के सामने भी आती हो, लेकिन उन सबके बारे में भी हमारा यही मानना है कि जुर्म साबित होने के पहले की प्रताडऩा, सामाजिक सजा की लंबाई कम होनी चाहिए। क्योंकि आज जिस रफ्तार से यह प्रताडऩा और सजा इस बच्ची के मां-बाप पा रहे हैं, वह न्याय की भावना के हिसाब से बहुत ही नाजायज है। किसी भी मां-बाप को इतनी लंबी प्रताडऩा से नहीं गुजारना चाहिए। यह कहते हुए हम यह भी जानते हैं कि इसी देश में तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं मां-बाप अपने बच्चों का कत्ल करवाते पकड़ा रहे हैं, और बहुत से मामले सही भी साबित हो रहे हैं। लेकिन ऐसे तमाम मामलों में जांच के दौरान की बरसों की जेल ठीक नहीं है। जांच एजेंसियों के सुबूत और गवाह तेजी से जुटाकर उनकी हिफाजत का इंतजाम कर लेना चाहिए और फिर संदिग्ध रिश्तेदारों को जमानत मिलने देना चाहिए जो कि उनका हक भी है।
यह मौका मीडिया के लिए यह सोचने का भी है कि दिल्ली में टीवी चैनलों के कैमरों की अंधाधुंध मौजूदगी की वजह से क्या इतना बड़ा कवरेज ठीक है जिससे कि बाकी देश पर एक बुरा असर पड़े? एक वक्त भारत में अपराध की कहानियों वाली कुछ पत्र-पत्रिकाएं देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिकाओं से भी अधिक बिकती थीं। आज टीवी के समाचार चैनल या तो पुलिस के हुलिए में, या किसी अपराधी के हुलिए में अपने स्टूडियो से अपराध की घटनाओं को उसी तरह पेश करने लगे हैं। ऐसे बुलेटिनों से परे भी जब मुख्य समाचार बुलेटिन हत्या के शक में गिरफ्तार मां-बाप को जरा-जरा सी अदालती घट-जोड़ के लिए दिखाते चलते हैं तो यह भी एक भयानक नौबत है। इस पर सभी तबकों को सोचना चाहिए।

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