09 मई 2012
संपादकीय
मुंबई हाईकोर्ट के एक जज ने कल एक मामले की सुनवाई करते हुए एक महिला को उसके पति के पास रहने की सलाह देते हुए सीता की मिसाल दी जो कि अपने पति राम के पीछे-पीछे जंगल गई थी और वहां पर चौदह बरस का वनवास काटा था। तलाक के एक मामले में जज ने यह कहते हुए कुछ सनसनी सी फैला दी और रामायण की इस मिसाल को कुछ महिला विरोधी भी समझा जा रहा है। अदालत ने इस महिला को कहा-आपको अपने पति के साथ जाना चाहिए। जब सीता राम के साथ वनवास पर जा सकती है तो आप क्यों नहीं जा सकतीं। यह मामला एक ऐसे जोड़े का है जिसमें शादी के एक बरस बाद ही पति पांच बरस तक जहाज पर काम करने चले गया और इस दौरान पत्नी बेटी के साथ मुंबई में रहती रही। पांच बरस बाद जब जहाज कंपनी ने पति को अंडमान में जमीन पर तैनात किया तो उसने पत्नी से साथ आकर रहने को कहा, इस पर पत्नी ने मनाही कर दी।
यह मामला औद्योगिकीकरण और शहरीकरण जैसी दिक्कतों से जुड़ा हुआ है जिनमें पति-पत्नी को दूर रहने की नौबत आ जाती है। फौज मेें या जहाज पर काम करने वाले कई बार ऐसी दिक्कतों से घिरते हैं कि उनके दूर रहने के बरसों में पत्नी बच्चों के साथ जिस जगह रहती है उस जगह को छोड़कर निकलना उसे बाद में ठीक नहीं लगता। ऐसे में शादीशुदा संबंधों के परामर्शदाता भी मददगार साबित होते हैं और कई बार परिवार-अदालतें भी काम आती हैं। लेकिन यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया और हाईकोर्ट ने महिला को सीता बनने की नसीहत दी। इस हाल में सवाल यह उठता है कि जहाज कंपनी पर काम करने वाला पति कुछ बरस बाद फिर जहाज पर कुछ बरसों के लिए जा सकता है और उस हालत में मुंबई की रहने वाली, वहां पर अपनी बच्ची सहित बसी हुई महिला अगर अपने हित में वहीं रहना ठीक समझती है, तो आज का कानून उसे वनवास की सलाह नहीं दे सकता। सलाह अगर दे भी सकता है तो भी उसे बेबस नहीं कर सकता, और यह मिसाल आज ठीक भी नहीं लगती।
रामायण की कहानी को अगर देखें तो वह खूब नाटक से भरी हुई और खूब बेइंसाफी की कहानी है। कैकेयी की फरमाईश पर दशरथ ने राम को पूरे अन्याय के साथ वनवास पर भेज दिया था, और एक पत्नी के रूप में सीता को भी चौदह बरस साथ-साथ वनवास झेलना पड़ा। आगे की कहानी सबको मालूम है लेकिन उसका जो अंत है वह बहुत भयानक है। अपनी प्रजा के एक गैरजिम्मेदार आदमी की एक ओछी बात पर राम ने एक आदर्श प्रस्तुत करने के लिए अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया था। एक पत्नी के रूप में त्रेतायुग में सीता के कोई हक चाहे न रहे हों, चाहे अपने पद का एक आदर्श पेश करने के लिए राम ने एक सामान की तरह सीता को अपनी जिंदगी से निकाल बाहर किया हो, आज इक्कीसवीं सदी में सीता की तरह वनवास पर जाने की सलाह बहुत ही अन्यायपूर्ण है और हम हाईकोर्ट के जजों की इस बात से पूरी असहमति रखते हैं। रामकथा में एक पुरूष और पति जैसा बर्ताव अपनी पत्नी से करता है वह अपने-आपमें भारी आलोचना की बात है और उसे उस युग की कहानी में भी आज के नजरिए से खराब माना जाता है। आज के जमाने में एक महिला के अधिकार बहुत अलग हैं। और अगर वह अपने बच्चों की फिक्र करते हुए वनवास से दूर एक सहूलियत के बीच रहना चाहती है, तो उसे वनवास की तरफ धकेलना हमारे हिसाब से गलत है।
यहीं पर हम एक दूसरी बात भी छेडऩा चाहेंगे जो कि उत्तरप्रदेश में कल सामने आई है। वहां पर सहारनपुर के डीआईजी पुलिस ने समाचार चैनल के कैमरे के सामने एक गरीब बूढ़े को उसकी बेटी के कहीं चले जाने पर बहुत बुरी तरह फटकारा और उससे कहा-यह तो बहुत ही शर्म की बात है अगर मेरी बहन कहीं भाग गई होती तो मैं या तो उसका कत्ल कर देता या खुदकुशी कर लेता। अगर मेरी बहन या बेटी भाग गई होती तो मैं डूब मरता, उसके सिर पर गोली मार देता या अपने को मार डालता।
वर्दियों की भीड़ के बीच में एक इतना बड़ा अफसर सार्वजनिक रूप से कैमरे के सामने ऐसी घटिया बात कह रहा है जो कि इस देश में वैसे भी चल रही कुख्यात ऑनर-किलिंग को बढ़ाने वाली बात है। पे्रम-प्रसंगों और अपनी मर्जी से की गई शादियों के खिलाफ देश भर में मां-बाप अपने बच्चों को मार डाल रहे हैं या भाड़े के हत्यारे ढूंढकर उनकी हत्या करवा रहे हैं। ऐसे में एक बड़ा जज समाज, परिवार और पति की बेइंसाफी की सबसे बड़ी पौराणिक भारतीय कहानी की मिसाल इंसाफ और आदर्श की तरह देता है और एक बड़ा पुलिस अफसर हत्या करने की वकालत करते हुए उसकी राह दिखाता है। यह किस तरह का हिंदुस्तान है?

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