25 मई 2012
संपादकीय
मुंबई में चल रहे भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रम में केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ जितनी खबरें निकलनी चाहिए थीं, वे तमाम मोदी लूटकर ले गए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय लीडरशिप को उसकी औकात समझा दी, और संघ-भाजपा के एक महत्वपूर्ण नेता, और अपने पुराने विरोधी, संजय जोशी को बेदर्दी से बेइज्जत करके बाहर जाने पर मजबूर कर दिया। जिस तरह की कल की सुबह भाजपा के लिए शुरू हुई, उसने ही बाकी तमाम राष्ट्रीय मुद्दों को भीतर के पन्नों पर धकेल दिया और मोदी का बाहुबल इस कदर पहले पन्नों पर छाया, कि शाम होने तक देश का मीडिया मोदी की राष्ट्रीय संभावनाओं और उनके राष्ट्रीय बोझ होने पर चर्चा में जुट गया था। एक बार फिर देश के लोगों को गुजरात के दंगों के वक्त के लहू सने हाथों वाला नेतृत्व याद आ गया।
यूपीए सरकार पर जितनी कालिख लगी है, उसी में ब्रश डुबा-डुबाकर विपक्षी दल देश की दीवारों को नारों से रंग सकते थे। लेकिन भाजपा आज अपने ही भीतरी कलह से जूझ रही है। और यह कोई नई बात नहीं है। न तो मोदी के हाथों और चेहरों पर हजारों मुसलमानों की मौतों का लहू कभी धुल पाएगा, और न ही गुजरात के भीतर भाजपा-संघ परिवार में मोदी का एक तानाशाह सा रूख लोगों की चर्चा से दूर हो पाएगा। नरेन्द्र मोदी ने अपने राज्य में आर्थिक सफलता हासिल करने के बाद धर्मनिरपेक्ष ताकतों, अल्पसंख्यकों, ईमानदार और निष्पक्ष अफसरों और हिंदू ताकतों के भीतर भी अपने विरोधियों, सबको एक बराबरी से ठिकाने लगाया। आर्थिक सफलता के आंकड़ों के पीछे सोलह हजार से अधिक दंगाग्रस्त मुसलमानों के अब तक राहत शिविरों में ही जीने के आंकड़े छुप जाते हैं। बाजार को देखने वाला मीडिया मुश्किल से ही कमाई के आंकड़ों के पीछे झांक पाता है। गुजरात के जिलों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अनगिनत अदालतों में मोदी और उनके लोग अनगिनत किस्म से जांच और कटघरों में घिरे हुए हैं, इसके बाद भी भाजपा के भीतर उनका दबदबा कल सुबह आसमान पर चढ़ा हुआ दिखा जब पार्टी के राष्ट्रीय कार्यक्रम में आने के पहले भी उन्होंने मानो बंदूक की नोंक पर अपने को नापसंद संजय जोशी को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकलवाकर दम लिया और उसके बाद ही वे वहां पर आए।
इन्हीं दिनों भाजपा के एक दूसरे नेता, कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा लगातार पार्टी को आंखें दिखा रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में बुरी तरह घिरे हुए इस दक्षिणी नेता को भाजपा का पश्चिमी सरदार सुहा रहा है। येदियुरप्पा ने खुलकर मोदी की तारीफ की है और भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को बिना रीढ़ की हड्डी का कहा है। ऐसे माहौल में आज जब पार्टी के संविधान को बदलकर नितिन गडकरी को अध्यक्ष के पद पर काबिज रखा जा रहा है तो दिल्ली में भी भाजपा के बहुत से नेताओं के बीच बेतहाशा बेचैनी है। दरअसल आज का यह वक्त न सिर्फ अगले आम चुनाव के वक्त पार्टी की लीडरशिप तय करने का है, बल्कि प्रधानमंत्री पद के अगले प्रत्याशी को तय करने का भी है और उस मामले में भाजपा के भीतर जहां मोदी सबसे वजनदार साबित हो सकते हैं वहीं पर भाजपा के बाहर उसके गठबंधन दलों के बीच मोदी सबसे कमजोर भी साबित हो सकते हैं और शायद हैं भी। उन पर साम्प्रदायिकता के जैसे दाग-धब्बे लगे हैं उनसे कोई तेंदुआ भी शरमा सकता है। इसलिए कल की मोदी की जीत पार्टी के भीतर, पार्टी को परास्त करते हुए कितनी आगे बढ़ पाएगी, इसमें हमें शक है। सहयोगी दलों के बीच सबसे नापसंद भाजपा नेता की बगावत की कीमत पर भी शायद पार्टी के बाकी राष्ट्रीय नेता मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने से परहेज करेंगे। जो भी हो अगले दो बरस दिलचस्पी के रहेंगे और आज तो लिखने के लिए बस मोदी ही एक मुद्दा हैं।

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