आतंक की राजनीति नहीं राजनीति का आतंक...


05 मई 2012
संपादकीय
दिल्ली में इस वक्त राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ केंद्र सरकार की बैठक चल रही है जिसमें राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) बनाने पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को गैरकांगे्रसी मुख्यमंत्रियों का विरोध झेलना पड़ रहा है। इसमें यूपीए गठबंधन की भागीदार बंगाल की चिरअसंतुष्ट ममता बैनर्जी भी शामिल हैं। इन राज्यों की एक आपत्ति यह है कि इस संस्था की कार्रवाई राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केंद्र सरकार का एक दखल होगा और भारत के संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकारों को कम नहीं किया जाना चाहिए। दूसरा मुद्दा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और कुछ दूसरे मुख्यमंत्रियों ने उठाया है जिसके तहत केंद्र को यह सुझाया गया है कि ऐसी संस्था सरकार के एक आदेश से बनाने के बजाय संसद में एक कानून बनाकर ही बनानी चाहिए। इस बात में एक मजबूत तर्क यह है कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों से परे भी कुछ ऐसी पार्टियां हो सकती हैं जो आज केंद्र सरकार की बुलाई इस बैठक में आने का हक नहीं रखती क्योंकि किसी राज्य में उनकी सरकार नहीं है, लेकिन किसी महत्वपूर्ण फैसले में उनकी भी राय लेनी चाहिए, और एक आदेश के बजाय एक कानून बनाकर ही ऐसा करना ज्यादा अच्छा होगा। अभी इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) के गठन को लेकर एक मामला चल ही रहा है कि यह संसद के किसी कानून के बिना सिर्फ केंद्र सरकार के आदेश से बना दी गई एजेंसी है और संसद से इसके लिए कोई मंजूरी नहीं ली गई। संसद के प्रति जवाबदेह होना अधिकतर मामलों में लोकतंत्र में बेहतर होता है और कुछ कम महत्व के मुद्दे ही सरकार को अपने स्तर पर तय करने चाहिए। केंद्र और राज्यों के बीच के जटिल संबंधों को लेकर और राज्य सरकारों के साथ केंद्र के आज के कड़वे रिश्तों को देखते हुए भी यह जरूरी है कि इसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के बीच करने के बजाय इसे संसद में ले जाना चाहिए।
लेकिन आज की हमारी फिक्र इस संसदीय-सैद्धांतिक-संवैधानिक तर्क से कुछ अलग भी है। जमीनी हकीकत अगर देखें तो देश में आतंक का खतरा आज दुनिया में किसी भी देश पर इस किस्म के खतरे के मुकाबले अधिक है। एक तरफ दर्जन भर राज्यों में नक्सली इलाकों पर कब्जों से लेकर कई दूसरे किस्म की पकड़ बना चुके हैं और उसे बढ़ाते चल रहे हैं। इनकी आवाजाही राज्यों की सरहदों के आरपार रहती है और किसी भी सुरक्षा एजेंसी के लिए इनका मुकाबला करना आसान नहीं रहता। राज्य भी बार-बार नक्सल आतंक से निपटने के लिए केंद्र की तरफ देखते हैं और गुजरात जैसे एक राज्य को छोड़ दें तो हर राज्य आतंक से निपटने में दिल्ली की मदद भी चाहता है। अपने राज्य के किसी भी आतंक या खतरे से निपटने का गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपना एक अलग तरीका है और उस तरीके के साथ उनकी सरकार के दर्जनों लोग जेलों से लेकर कटघरों तक, और जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक खड़े हुए हैं। आज की इस चर्चा को हम मोदी के इस मौलिक तरीके की तरफ मोडऩा नहीं चाहते इसलिए इसे हम अभी अलग छोड़ रहे हैं, लेकिन बाकी राज्यों का कामकाज केंद्र सरकार के साथ अधिक तालमेल से बेहतर चल सकता है। अब इस तालमेल में अगर राज्यों को इस बात पर आपत्ति है कि केंद्र सरकार की ऐसी राष्ट्रीय आतंक-विरोधी एजेंसी जरूरत पडऩे पर उनके राज्य के भीतर आकर कहीं छापा मारकर, तलाशी लेकर, गिरफ्तारी करके सब कुछ करीब के पुलिस थाने के हवाले करने का हक न रखे, तो यह बात हमारी समझ से कुछ परे है। अगर सिर्फ आतंक के मामलों को लेकर बनी यह एजेंसी अगर सिर्फ ऐसे शक की बुनियाद पर एक कार्रवाई करती है और जहां तक मुमकिन हो कार्रवाई के पहले वह राज्य को बताने की बात कहती है, और जहां मुमकिन न हो वहां कार्रवाई के तुरंत बाद सब कुछ राज्य के हवाले कर देने की शर्त ऐसी एजेंसी के साथ केंद्र ने ही जोड़ी है, तो यहां पर हमें यह नौबत राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केंद्र की दखल जैसी नहीं लगती है, और अगर किसी मुख्यमंत्री या राज्य को यह केंद्र की दखल लगती भी है तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या आज भारत में देश के भीतर का आतंक और सरहदों के पार से आने वाला आतंक ऐसा है जो कि केंद्र-राज्य के संबंधों में ऐसी मामूली रियायत का हकदार नहीं है? 
भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच के जटिल अंतरसंबंधों की व्यवस्था जिस दिन बनाई गई थी उस दिन हो सकता है कि देश भर में आतंक के ऐसे खतरे की कल्पना न रही हो। लेकिन समय के साथ सबक लेना समझदारी की निशानी होती है। हालात के साथ-साथ खयालात पर दुबारा एक नजर डालने जितना लचीलापन लोगों में होना चाहिए। आज देश में आतंक के छाए हुए खतरे के साए तले भी केंद्र सरकार और उससे राजनीतिक-असहमति रखने वाले दल या मुख्यमंत्री आज इस मुद्दे पर हमें राजनीति करते भी दिख रहे हैं। आज पूरी दुनिया में आंतरिक सुरक्षा को सबसे अधिक मजबूत कर लेने वाले अमरीका में शुरू से ही कुछ किस्म के अपराधों को लेकर वहां की राष्ट्रीय सरकार के अधिकार पहले से ही तय कर दिए गए हैं जो कि वहां के राज्यों के अधिकारों से परे हैं। जो वहां संघीय अपराधों के दर्जे में आते हैं, वे सीधे-सीधे केंद्र सरकार की एजेंसी एफबीआई की जांच के दायरे में चले जाते हैं। भारत में किसी राज्य का ऐसा कोई भी अपराध नहीं है जिसे कि केंद्र सरकार सीधे-सीधे अपनी जांच के दायरे में ले सके। अब यहां पर जांच और कार्रवाई के फर्क को लेकर एक लंबी कानूनी बहस हो सकती है, लेकिन हम पाठकों को उतनी जटिलता से बचाने के लिए अपनी यही बात कहना चाहते हैं कि आज के खतरों को देखते हुए राज्यों को इतना लचीला होना चाहिए कि केंद्र सरकार की एजेंसी को वह आतंक रोकने के मामलों में कार्रवाई करने की इजाजत अपनी जमीन पर दें।
आने वाले दिनों में इस बात पर लंबी चर्चा होगी कि आज की बैठक में किस पार्टी के मुख्यमंत्री ने केंद्र के इस प्रस्ताव पर कौन-कौन से तकनीकी मुद्दे उठाए। उस वक्त हम इस बारे में फिर लिखने की बेहतर हालत में होंगे, लेकिन आज एक नजर में हमको यह लग रहा है कि आतंक की राजनीति से निपटने के लिए बनाई जा रही इस एजेंसी को राजनीति के आतंक का शिकार होना पड़ रहा है।

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