18 मई 2012
संपादकीय
कल रात वानखेडे स्टेडियम में आईपीएल मैच में अपनी टीम की जीत के बाद शाहरुख खान के महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों और सुरक्षा गार्डों के साथ धक्कामुक्की ,गाली गलौच करने की खबर है। मुंबई पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शाहरुख ने झगड़े के वक्त शराब भी पी रखी थी। वह अपनी टीम की जीत की खुशी मनाने बीच मैदान में जाने की जि़द कर रहे थे, और सुरक्षा गार्डों ने उन्हें वहां जाने से मना किया तो उन्होंने यह तमाशा किया। एक क्रिकेट टीम के मालिक शाहरुख के वानखेड़े स्टेडियम में प्रवेश पर रोक लगाने की कोशिशों की खबर है। जनता में लोकप्रियता पर जिसका पेशेवर जीवन टिका है, ऐसे फिल्म अभिनेता का सार्वजनिक रूप से, टीवी कैमरों के सामने ऐसा बर्ताव, उन तमाम आलोचनाओं के लायक है जो शाहरुख को अब मिल रही है। लेकिन यह घटना हमारे देश के मौजूदा हालात की तस्वीर भी पेश करती है, जिसमें पैसे, या किसी भी किस्म की ताकत रखने वाले का, इंसानियत और तमाम सामाजिक नैतिक मूल्यों को दर किनार रख कर बरतना एक आम बात हो गई है। अपनी दौलत, और बॉक्स ऑफिस पर अपनी ताकत के घमंड में शाहरुख की बदतमीजियां आम हंै- वह सरेआम कभी शिरीष कुन्दूर को पीट देते हैं, कभी सह अभिनेताओं पर बेहद निजी और बेजा टिप्पणियां करके विवाद खड़े करते हैं। शाहरुख ही क्यों, पिछले दिनों सैफ अली खान के एक रेस्त्रां में देर रात एक शख्स के साथ कथित रूप से मारपीट करने की बात हो, या सलमान खान की आक्रामक हरकतें, या अमीरजादों का सड़कों पर महंगी बड़ी गाडिय़ां दौड़ाकर बेकुसूरों की जान लेना या किसी विधायक का रेलवे प्लेटफार्म पर घोड़ा दौड़ाते पहुंच जाना, महंगी बाईकों पर आम जनता की सुरक्षा की परवाह किए बिना सड़कों पर रेस लगाना। ऐसी तमाम बातें आज आम हो चुकी हंै। सार्वजनिक जीवन में किसी भी तरह की ताकत के बूते नियम कायदे तोड़कर, सभी तरह के मूल्यों को लतियाकर, घमंड में चूर होकर बर्ताव करना, और उसके लिए कोई अफसोस जाहिर न करना,आजकल जैसे चलन बनते जा रहा है।
किसी विकसित पश्चिमी देश में लोग जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, वैसा बर्ताव धनबल, बाहुबल, कुर्सी के बल पर भारत में आए दिन देखने को मिलता है। ऐसा इसलिए है कि ताकत वालों के लिए कुछ भी कर के छूट जाना इस देश में बेहद आसान है। अगर मीडिया सिर पर न चढ़ बैठे, तो क्षमा चोपड़ा की जान लेने वाले बीएमडब्लू के चालक और मालिक को पुलिस सस्ते में ही छटक जाने दे। जेसिकालाल हत्या कांड में तो न्यायपालिका ने भी एकबारगी जेसिका के हत्यारों को बखश दिया था। मीडिया के पहल करने पर न्यायपालिका ने इस पर गौर किया और दोषियों को सजा हुई। पीडि़तों के पीछे अगर मीडिया की ताकत न होती तो कुसूरवार छूट जाते। सवाल यह है कि क्या आज ताकत ही सब कुछ है ,मूल्य कुछ भी नहीं? शाहरुख को अगर सुरक्षा गार्ड बीच मैदान जाने से रोकते हंै तो एक टीम के मालिक के रूप में उन्हें इस नियम के पालन में उन्हें सहयोग करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नियम तोडऩे के लिए सारी सीमाएं पार कीं। कानून तोडऩे वालों के साथ व्यवस्था में बरती जाने वाली नर्मी से समाज में जो असंतोष और अन्याय पैदा होता है, उसके नतीजे के रूप में नक्सली हमें देश भर में दिखाई देते हैं। यह और बात है कि बहुत बड़ी संख्या में बेकुसूर तबका उनके जुर्म का भी शिकार है, जिसके अपनी सुनवाई के लिए किसी और तरीके के इस्तेमाल की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। भरी ज़ेबें, बड़े कुर्सी, बड़ी कार, हाथ में पकड़े हथियार सबकी ताकत जब दिमाग में चढ़कर बोलने लगे, तो उसे काबू में करने के लिए जो तंत्र जरूरी है, वह आज देश मेें गैर मौजूद है। हर क्षेत्र में कड़े नियम कायदे बनाने की बात की जाती है, लेकिन कायदों पर अमल ही न होना हो, तो उनकी धार का क्या मतलब? जिस तरह ट्रैफिक नियमों को देश में तोड़ा जाता है। पश्चिमी या विकसित देशों में वैसा होने पर लाईसेन्स रद्द करने और कई दिनों तक नया लाईसेंस जारी न करने की सजा दी जाती है। लेकिन हमारे देश में तो लोगों को लाईसेंस की ही परवाह नहीं है, न ही उन्हें यह परवाह करवाने करने को मजबूर किया जाता है।
बलात्कार और यौन शोषण पर, महिला सुरक्षा पर, बाल यौन शोषन पर, ट्रैफिक पर मौजूदा कानून और सख्त किए जा रहे हंै, लेकिन जो कानून पहले से ही मौजूद है उनके पालन का ही माहौल न हो, जब उन पर अमल की ही नीयत और काबीलियत न हो, तो कितने भी सख्त कनून बनाने का मतलब ही क्या बचता है। देश में न्याय की धीमी रफ्तार का आलम है कि बच्चों के यौन शोषण जैसे गम्भीर मामलों तक के निपटारे पर दस दस साल लग जाते हैं। बलात्कार के लंबे खिंचते मामलों के दौरान गवाह के साथ भी बलात्कार का जैसा मामला ओडिशा में आया, वह होता है, या जैसा बिहार में कि मां के बलात्कार के गवाह बेटे को ही जिंदा जला दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार कर शिकार को जला देने का नया चलन शुरू हो गया है। यह सारा हौसला कानून के लचर अमल से आता है जिससे मूल्यों को पुराने कपड़ो की तरह उतार फेंकने की शह मिलती है। बुद्ध , गांधी और महावीर अब हमारे लिए पर्यटन को बढ़ाने का जरिया भर रह गए हैं। उनकी सिखाई गई बातों का दम हम रुपये कमाने को तो करते हंै। रोजमर्रा की जि़ंदगी में बरतने के लिए नहीं। कल ही अहमदाबाद पुलिस ने शहर मे पिछले कई महीनों से लोगों की नींद हराम किए हुए बाईकर्स गैंग पकड़ी तो उसके आधे से ज्यादा सदस्य किशोर निकले, जिनमें से कुछ तो दसवीं या 12 वीं की परीक्षा दिए हुए बच्चे थे। देर रात , जब उनके घर के लोग समझते कि वह अपने दोस्त के यहा पढ़ाई कर रहे हैं, तब वह शहर भर में घरों के सामने खड़ी गाडिय़ों के शीशे तोड़कर अपनी विकृत प्रवृत्तियों को संतोषते। यह सडऩ कितनी गहरी है, इसका पता चलने पर लोग थोड़ा सा चौंकते हंै, और फिर रोज के अपने काम मे लग जाते है, जैसे कायदों पर अमल के लिए आवाज उठाने की जिम्मेदारी महज मीडिया या न्यायपालिका ही रह गई हो। अपने देश, शहर, लोगों को अपना समझने की भावना न आज के युवाओं में दिखती है न ही उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जाता है। युवाओं को आज सिर्फ एक ही मूल्य की फिक्र है उनके मोबाईल रिचार्ज के मूल्य की।
इसका इलाज कायदे कानून और मूल्यों के प्रति, अपने अधिकारों के प्रति जागरुक, साक्षर जनता है। हम किसी क्षेत्र विशेष की तरफ उंगली न भी उठाना चाहे, तो भी यह सब देख सकते हंै कि केरल में या गुजरात में कोई विधायक रेल्वे प्लेटफार्म पर घोड़ा नहीं दौड़ाता, न ही यहां रोज बलात्कार कर के पीडि़तों को जला डालने, या डकैती की वारदात सुनाई देती है। नैतिक और सामाजिक मूल्य केवल किताबों में सजाए रखने की चीज़ें नहीं है इनके खो जाने से जो कानूनी अराजकता आती है। वह राजनीति और प्रशासन पर भी असर डालती है और एक दिन इससे हमारे रोज़मर्रा के जीवन पर असर पडऩे लगता है। शाहरुख को जीत का जश्न मनाने बीच मैदान मे जाने से न रोकने के बाद सुरक्षा कर्मी दूसरे मैचों में प्रशंसकों को कैसे रोक पाते? एक स्पर्धा का आयोजन ठप्प होने से कैसे बच पाता? लेकिन खुद को सबसे अलग और नियम कायदों से ऊपर समझने वाले शाहरुख देश के उन बहुत से दबंगों का चेहरा है, जिनके दिमागों में उनकी जेब की गर्मी, उनकी बड़ी गाडिय़ों के इंजिन का हार्सपावर, उनके कुर्सी की ताकत नशा बनकर काबिज हो चुकी है। ऐसे लोगों की तादाद वैसे ही बढ़ चुकी है। और ज्यादा बढ़े इसके पहले जनता का अमलीतंत्र को अपना काम करने पर मजबूर करने जितना तेज तर्रार, जानकार, और एकजुट होना जरूरी है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें