दिल्ली भागीदार नहीं?


26 मई 2012
संपादकीय
बगावत करके कांगे्रस से निकले हुए जगनमोहन रेड्डी आंध्र में आज खबरों में हैं। अरबों की अनुपातहीन संपत्ति के मामले में अदालत के दिए हुए जांच-आदेश पर सीबीआई ने अब केस तैयार करने की राह पकड़ी है। जगनमोहन के पिता वाईएसआर रेड्डी कांगे्रस के चहेते मुख्यमंत्री थे और हवाई हादसे में मौत तक वे कांगे्रस हाईकमान की पसंद बने रहे। इस दौरान सरकारी फैसलों की मेहरबानी से उनका बेटा करोड़पति, अरबपति और शायद खरबपति भी बनते चले गया। शायद सैकड़ों करोड़ की लागत से बना महल सा मकान हो गया, बड़े-बड़े कारोबार हो गए। जब पिता की मौत के बाद पार्टी ने पुत्र को मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो बगावत करके जगनमोहन ने नई पार्टी खड़ी कर ली। बगावत तो एक लोकतांत्रिक काम है इसलिए उसे लेकर हमें कुछ नहीं कहना है, लेकिन सवाल यह है कि जिस कांगे्रस पार्टी की राजनीति में हर नेता के पीछे केंकड़ों की तरह टांग खींचते दर्जनों नेता लगे रहते हैं, उस पार्टी में वाईएसआर के खिलाफ क्या उस वक्त पार्टी की आंख नहीं खुली जब सरकारी मेहरबानी से उनका बेटा अरबपति बन चुका था? ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कांगे्रस के नेताओं के खिलाफ कोई हाईकमान तक शिकायत न पहुंचाए।
दरअसल कांगे्रस में जगनमोहन रेड्डी हों, या कर्नाटक के बेल्लारी में भाजपा के रेड्डी भाई मंत्रिमंडल में हों और लोहे की अवैध खुदाई से हजारों करोड़ कमा रहे हों, येदियुरप्पा का कुनबा सरकारी फैसलों से करोड़ कमा रहा हो, इनती बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां अपने बेईमानों पर काबू क्यों नहीं पातीं? हम एक प्रदेश पर काबिज एक पार्टी पर काबिज एक कुनबे की बात नहीं कहते, करूणानिधि, जयललिता, लालू-मुलायम, बादल, माया जैसे बहुत से नेता पूरी तरह बेकाबू रहते हैं और अपने राज्य को वे अपनी खानदानी लाठी से हांकते हुए कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन कांगे्रस और  भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टियां हैं, उनको तो अपनी-अपनी पार्टी भ्रष्ट लोगों पर काबू रखने की तरकीबें आनी चाहिए। कांगे्रस पार्टी के भीतर सोनिया का कुनबा अगर भ्रष्टाचार पर उतारू हो जाए, तब तो यह कहा जा सकता है कि उसे कौन रोकेगा? लेकिन जब इस पार्टी के मुख्यमंत्री और मंत्री लूटपाट में लग जाते हैं, तब उन पर काबू न पाने के क्या मायने होते हैं? जब संघ परिवार और भाजपा के ऊंचे आदर्शों की बात कहने वाले, शुचिता का दावा करने वाले लोग दिल्ली में बैठकर भी अपनी पार्टी के प्रादेशिक भ्रष्टों पर कोई काबू नहीं पा सकते तो इसका क्या मतलब निकाला जाए? 
हमारा तो ऐसा सोचना है कि राजनीतिक दलों से जुड़े हुए किसी भी तरह के कारोबारी अपनी राजनीतिक संबंधों की वजह से कारोबार में कई किस्म के फायदे पाते ही हैं। और वैसे भी अगर किसी पार्टी के कोई नेता बहुत संपन्न हैं, तो उनसे उनकी पार्टी को मदद लेनी ही चाहिए। इसलिए बड़ी पार्टियों को अपने नेताओं को कोई पद देने या चुनाव की टिकट देने के लिए ऐसी शर्त रखनी चाहिए कि वे अपनी सालाना कमाई का कुछ फीसदी हिस्सा पार्टी को दें। वैसे भी जब दौलतमंद लोग किसी पार्टी में रहते हैं तो उन लोगों की पार्टी चंदे के लिए कारोबार-माफिया से सौदे क्यों करे? इन पार्टियों को अपने संविधान में फेरबदल करके पार्टी का खजाना भरने का जरिया तो निकाल ही लेना चाहिए। ऐसे हिसाब-किताब से यह भी पता लगेगा कि घोषित रूप से कौन से नेता कितने दौलतमंद हुए जा रहे हैं? आज जिस कांगे्रस पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की जांच एजेंसी सीबीआई, कांगे्रस के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बेटे को अरबपति-खरबपति साबित करने में लगी हुई है, उस कांगे्रस पार्टी को आज सार्वजनिक रूप से यह जवाब भी देना चाहिए कि उसके मातहत, उसकी सरकार चलाते हुए उसका एक मुख्यमंत्री अपने परिवार को कैसे इतनी दौलत दिला सकता है? और आज अगर कांगे्रस शासन के दौरान का भ्रष्टाचार आंध्र में साबित हो रहा है, भाजपा शासन के दौरान का भ्रष्टाचार कर्नाटक में साबित हो रहा है, तो इन पार्टियों को सार्वजनिक रूप से यह जवाब भी देना चाहिए कि उनकी सरकारें इस कदर लूटपाट कैसे करती रहीं, दिल्ली में बैठे इस पार्टी के बड़े नेता कैसे सब अनदेखा करते रहे? क्या सार्वजनिक जीवन में मुफ्त में कोई इतनी अनदेखी करता है? 
आज जिस जगनमोहन की वजह से हम इस पर चर्चा कर रहे हैं उस जगनमोहन के पिता वाईएसआर रेड्डी के इतिहास को देखें तो वे कड़प्पा जिले के एक ऐसे पिता के घर पैदा हुए थे जो कि सामंतों के खिलाफ दबे-कुचले लोगों का नेता था, और जिसनेे इस संघर्ष को विरासत में पाया था। आज उसी कुनबे का जगनमोहन एक राजनीतिक वारिस भी बना है और अरबपति-खरबपति भी बन चुका है। इस तरक्की पर कांगे्रस पार्टी का क्या कहना है? क्या यह आसानी से मान लिया जाए कि कर्नाटक और आंध्र की लूटपाट में दिल्ली की भागीदारी नहीं रही?

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