21 मई 2012
रायपुर से बाहर सफर पर रहते हुए जब फोन पर पता लगा कि यहां की बुजुर्ग दासगुप्ता बहनों ने आत्महत्या कर ली, तो सीने पर एक तरह का घूंसा सा लगा। उनसे मेरी मुलाकात दशकों पुरानी थी। इनके घर भी जाना हुआ था और शुरूआत इनकी दरियादिली को देखकर हुई थी जो कि बाद में इनके हौसले की तारीफ में बदल गई थी। बिना शादी साथ रहतीं इन बुजुर्ग बहनों के तेवर आखिरी तक हक के लिए लडऩे के बने रहे और इस आत्महत्या को कोई चाहे पलायन कहे, मुझे लगता है कि यह अपनी जिंदगी को खत्म करने का उनका हक अधिक रहा।
सरकारी नौकरी से रिटायर होने वाली इन दो बुजुर्ग बंगाली बहनों ने कुछ दशक पहले एक ट्रस्ट में बच्चों की स्कॉलरशिप के लिए अपनी बचत में से एक पर्याप्त रकम देने की पहल की थी। उसी सिलसिले में पहली बार उनसे मेरी मुलाकात हुई और उनकी इस चाह को पूरा करने के लिए मैं इस ट्रस्ट की तरफ से उनके घर गया और उन्हें सारी बातें समझाकर, शायद स्कॉलरशिप के लिए चेक लेकर लौटा था।
उनके सामने एक लंबा बुढ़ापा था, और आसपास कोई रिश्तेदार भी नहीं था जो कि देखभाल करे, उनकी दौलत भी सिर्फ नौकरी से बचाए गए पैसे थे, न कि किसी और तरह की पारिवारिक दौलत। इसलिए उनकी एक सोच यह भी हो सकती थी कि अपने इलाज के लिए पैसों को बचाकर रखना, लेकिन इससे परे भी वे समाजसेवा के लिए खर्च करती थीं।
अभी पांच-छह बरस पहले हमारे इस अखबार के दफ्तर में वे आईं क्योंकि उन्हें कहीं से इस अखबार को शुरू करने की खबर लगी थी। इस बार उनके पास अपनी एक दिक्कत थी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकारी इलाके से लगकर अपने जिस निजी मकान में वे दशकों से रहते आई थीं, वहां पर अब एक मंत्री ठीक सामने के घर में रहने आ गए थे और उनकी, उनके घर आने वालों की, गाडिय़ां रात-दिन उनके दरवाजे पर रास्ता रोके खड़ी रहती थीं। इन दो बहनों में से एक लगातार बीमार भी रहती थीं और इन गाडिय़ों के धुएं से इनके शोर-गुल से उसकी तबियत और बिगड़ रही थी। दूसरी बहन ने लगातार मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक दौड़ लगाई ताकि उनके दरवाजे गाडिय़ों का डेरा लगना बंद हो। यह संघर्ष बरसों तक चला और फिर मुख्यमंत्री के एक आदेश के बाद उस पर अफसरों से अमल करवाने में एक पूरी जिंदगी ही मानो और लग गई। इसी दौरान वे इस बात को लेकर कुछ बार मेरे पास आईं और अपने हक के लिए उनके मन में इतना चौकन्नापन था कि वे कोई ज्यादती बर्दाश्त करने के खिलाफ थीं।
उनका दर्द बहुत लंबा-चौड़ा था, उनकी कई-कई पन्नों की शिकायतें तकलीफ और भड़ास से लबालब रहती थीं, और वे इस जिद पर भी अड़ी रहती थीं कि अगर हम उनकी शिकायत को छापें तो पूरी की पूरी छापें, वरना न छापें। इस किस्म की भावना अखबार में मानी नहीं जा सकती और उनके अलावा भी बहुत से लोगों से वक्त-वक्त पर मेरा मतभेद ऐसी बात को लेकर होते रहा है कि किसी बात को बिना संपादन के ही छापा जाए। उन्हें यह समझाने में मुझे खासी तकलीफ हुई कि अखबार की अपनी सीमा है और अखबार के पाठक के पढऩे की अपनी एक क्षमता है। लेकिन यह कहते हुए मुझे कुछ तकलीफ भी होती थी क्योंकि वे मुझसे मिलने के लिए कभी-कभी घंटों इंतजार करती थीं, क्योंकि अखबार पूरा बन जाने के पहले किसी से न मिलने की बंदिश अपने पर मैं लगाकर चलता हूं। उनकी शिकायत पर रिपोर्ट बनाकर हमने छापी भी थी लेकिन वे उससे नाखुश रहीं, और दुबारा वे किसी और रिपोर्टर से बात करने के बजाय मुझसे ही बात करने की जिद पर अड़ी रहती थीं।
निपट बुढ़ापे में अपने घर के सामने के बंगले में बसे एक मंत्री के खिलाफ, तो कभी अपने घर के ठीक पीछे बसे किसी बहुत बड़े पुलिस अफसर के घर के पेड़ से होने वाली किसी दिक्कत के खिलाफ, वे लगातार अपने हक के लिए लड़ती थीं और अपनी सीमित बचत को गरीबों के लिए लगाने में भी उनकी दिलचस्पी बनी हुई थी। उन्होंने हमारे इस अखबार में भी किसी समाजसेवी ट्रस्ट के बारे में जानकारी ली थी, और ऐसी कोई संस्था यहां न होने की बात बताने पर वे कुछ निराश भी हुई थीं।
आज यहां लिखने का मकसद न उनकी समाजसेवा है और न ही उनकी आत्महत्या। ये दोनों ही काम बहुत से लोग करते हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी जीते हुए अपने हक के लिए जितना संघर्ष किया, जितनी दौड़-भाग की, जिस तरह मुख्यमंत्री के जनदर्शन तक पहुंचकर वहां से अपनी शिकायत पर जांच का आदेश करवाया, बड़े-बड़े अफसरों के पीछे लगकर जांच करवाई, और उस जांच पर अमल करवाने के लिए फिर मुख्यमंत्री और गर्वनर तक दौड़-भाग की, वह सब किसी फिल्मी सीरियल सा रहा।
इसी बीच में मेरी बारी भी आती थी, और वे बिना फोन किए मेरे दफ्तर पहुंचकर घंटों इंतजार कर लेती थीं, और मेरी इस बेबसी का अंदाज भी उन्हें नहीं था कि काम पूरा होने के बाद कई बार मुझे दफ्तर के बाहर तकरीबन दौड़ते हुए ही अगले काम पर निकलना होता था। जब कोई आकर उनके बैठे होने की खबर देता था, तो कभी-कभी दौड़-भाग के बीच मैं एक किस्म की दहशत में घिर जाता था कि किसी और काम की जगह पहुंचने में आज लेट हो जाना तय है या फिर एक बुजुर्ग महिला को निराश करके, लगभग बदतमीजी से मुझे बाहर निकल जाना होगा, उन्हें किसी रिपोर्टर के हवाले करते हुए।
कई बार मैंने उन्हें यह भी सुझाया था कि वे तकलीफ न किया करें, वे मुझे फोन कर दें तो मैं उनके घर आकर उनके कागज ले लूंगा, या किसी रिपोर्टर को उनके पास भेज दूंगा। लेकिन लोगों से लगातार मिलते हुए शायद वे इस बात को अच्छी तरह समझ गई थीं कि अपना कोई काम करवाना हो तो खुद ही जाना ठीक होता है। इसलिए वे बिना फोन किए, या फोन पर बात न होने पर भी सीधे चली आती थीं।
सिर्फ हड्डियों सी लगती छोटी सी कद-काठी के साथ वे आती थीं, और अपने हक के लिए उनके मन में एक पहाड़ सी ताकत थी। जिन मामूली बातों को लेकर भारतीय लोकतंत्र में कमजोर लोग ताकतवर लोगों की ज्यादती को बर्दाश्त करने को ही बेहतर मान लेते हैं, उसकी आदत डाल लेते हैं, उन मामूली बातों के लिए वे इस तरह संघर्ष करती थीं कि मानो हक की लड़ाई उनकी जिंदगी का मकसद ही हो। अपनी बहन की सेहत के लिए अपने दरवाजे के सामने से धुएं और हॉर्न का प्रदूषण फैलाने वाली गाडिय़ों को दूर रखने के लिए उन्होंने अपने घर के ठीक सामने नो-पार्किंग का सरकारी बोर्ड लगवाकर ही दम लिया था।
वे सईद मिर्जा की फिल्मों के किसी किरदार की तरह एक भारी सनक के साथ हक की लड़ाई लडऩे वाली थीं, और नेक कामों में उनकी दिलचस्पी के चलते यह भी तय था कि इस लड़ाई के पीछे उनकी नीयत किसी को परेशान करने की नहीं थी, अपने को परेशानी से बचाने के हक के इस्तेमाल की थी।
दोनों बहनों की इस तरह की खुदकुशी की खबर बहुत तकलीफदेह इसलिए भी है कि एक घनी बस्ती में उन्हीं पड़ोसियों के बीच पूरी जिंदगी गुजार देने के बाद भी ऐसी नौबत आई और न तो आसपास किसी को ऐसा अहसास हुआ, और न ही शायद व्यस्त शहरी जिंदगी में किसी के पास उनकी तकलीफ को जानने का वक्त ही रहा। मरने के बाद भी उन्होंने अपनी सहेजी हुई बचत को समाजसेवा के लिए लगाने की कोई वसीयत छोड़ी है, और यह बचत सादगी की एक जिंदगी गुजारते हुए उन्होंने की थी।
मैं यह भी नहीं कहूंगा कि उनकी कोई कमी मुझे खलेगी, क्योंकि उनसे मुलाकात कुछ परेशानी की ही रहती थी। बहुत अधिक दौड़-भाग वाली जिंदगी में बिना समय तय किए किसी के आने से कभी भी खुशी नहीं होती। फिर उम्र के साथ उनके इरादों की मजबूती भी बढ़ती चली गई थी, लेकिन एक अखबार में उनकी हर चाहत और हर जरूरत की गुंजाइश नहीं थी। आज उनके बारे में यह लिखते हुए उनके संघर्ष को जब याद कर रहा हूं, तो लग रहा है कि ऐसा तो किसी भी और को मैंने इतने बरसों तक देखा नहीं था। जो सत्ता से लडऩे का पहाड़ चढ़ती रही, वह आखिर में आकर जिंदगी की सांसों से इस तरह लुढ़क गई!

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