8 अप्रैल 2014
संपादकीय
आज जब पूरे छत्तीसगढ़ में नवरात्रि और रामनवमीं के मौके पर होने वाले धार्मिक कार्यक्रम चल रहे हैं, और जगह-जगह लोग खुशियां मना रहे हैं, तब आदिवासी इलाके सरगुजा में एक सड़क हादसे में गांव के आदिवासी समाज के पन्द्रह लोग मारे गए। एक निजी पारिवारिक समारोह में ये लोग एक मालवाहक गाड़ी पर सवार होकर जा रहे थे, और गाड़ी के पलट जाने से उस पर सवार लोगों में से करीब आधे लोग खत्म हो गए।
छत्तीसगढ़ में आए दिन सड़क हादसों में लोग इसी तरह बहुत बड़ी संख्या में मारे जाते हैं, और ऐसी खबरें आती और चली जाती हैं। जो लोग खत्म हो जाते हैं, वे तो आगे की तकलीफ से बरी हो जाते हैं, लेकिन जो लोग जिंदा रह जाते हैं और बुरी तरह जख्मी रहते हैं, उनकी बाकी जिंदगी पता नहीं कैसे गुजरती है। इसके अलावा उनके परिवार भी बुरी हालत में आ जाते हैं, अगर वहां कोई और कमाने वाले न हों, अगर उनके पास इलाज का जरिया न हो। ऐसे हादसों के बाद कई तरह की बड़ी दिक्कतें जिंदा लोगों के सामने रहती हैं, इसलिए सारे बीमा और इलाज से परे भी लोगों को हादसों से बचना चाहिए, और सरकार को इसमें अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए।
आज चुनाव के बीच में एक बहुत नीरस किस्म के मुद्दे को लेकर हमारा यहां लिखना कुछ लोगों को बेमौके का लग सकता है, लेकिन हमारा यह मानना है कि जिंदगी को बचाने के लिए, उसकी कोशिशों के लिए, उसके लिए जागरूकता पैदा करने के लिए किसी मौके की राह देखने की जरूरत नहीं रहती। आज छत्तीसगढ़ की सरकार सड़कों पर हिफाजत को लेकर मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की बात भी नहीं कर सकती, क्योंकि जनता का एक बड़ा तबका इस धोखे में रहता है कि लापरवाही उसका पैदाइशी हक है, और उस पर किसी तरह के नियमों को लागू करना उसकी आजादी छीनने के बराबर है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में अलग-अलग वक्त पर विपक्ष में बैठी भाजपा, और कांग्रेस, दोनों के नेताओं को देख चुके हैं कि किस तरह सरकार की नियम लागू करने की कोशिश विपक्षी राजनीतिक आंदोलन खड़ा कर देती है। कांग्रेस ने तो और भी गजब किया था जब चरणदास महंत और रविन्द्र चौबे जैसे बड़े नेताओं ने हेलमेट अनिवार्य करने के भाजपा सरकार के अभियान का खुलकर समर्थन किया था, और रायपुर शहर के कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसे पोस्टर-बैनर लेकर आंदोलन किया था जिन पर लिखा था- हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को...।
सड़कों पर मौतों को रोकना इसलिए भी जरूरी है कि सरकार या निजी अस्पतालों की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे हादसों के बाद इलाज में लग जाता है, और दूसरे लोगों के इलाज में क्षमता की कमी आड़े आती है। इसके अलावा बीमा कंपनियों को जब भुगतान देना पड़ता है, तो बाकी लोगों के बीमे की किस्तें बढ़ जाती हैं, सरकार पर इलाज का नगद खर्च भी पड़ जाता है। लेकिन रूपए-पैसे से परे भी सड़क हादसों में जिंदगियों का जाना रोकने की हर कोशिश इसलिए भी की जानी चाहिए कि एक हादसा जिन लोगों की लापरवाही, गलती, या किसी मशीनी चूक की वजह से होता है, उस हादसे में सड़क से गुजरने वाले बहुत से चौकन्ना, गलती न करने वाले, और बेकसूर लोग भी मारे जाते हैं।
इसलिए सरकार को सड़क सुरक्षा को लेकर अपने विभागों का काम सुधारना चाहिए, और जनता को भी नियमों का पालन करना चाहिए। शादी-ब्याह या तीर्थ जैसे माहौल में जब लोग गाडिय़ों पर सवार होकर निकलते हैं, तो सावधानी उनके दिमाग के किसी कोने में नहीं रहती। खुशी और उत्साह कभी शराब के साथ, तो कभी शराब के बिना भी लोगों सिर पर सवार रहते हैं, और कभी-कभी ऐसी गाडिय़ों के ड्राइवर भी खुशी या गम की दारू पाने के बाद गाड़ी चलाते हैं। यह पूरा सिलसिला थमना चाहिए, मौतें थमनी चाहिए। और इन सबमें सरकार और समाज की कोशिशों से एक बहुत बड़ी कमी आ सकती है।










