सड़क हादसे घटने चाहिए, और मौतें थमनी चाहिए...

8 अप्रैल 2014
संपादकीय
आज जब पूरे छत्तीसगढ़ में नवरात्रि और रामनवमीं के मौके पर होने वाले धार्मिक कार्यक्रम चल रहे हैं, और जगह-जगह लोग खुशियां मना रहे हैं, तब आदिवासी इलाके सरगुजा में एक सड़क हादसे में गांव के आदिवासी समाज के पन्द्रह लोग मारे गए। एक निजी पारिवारिक समारोह में ये लोग एक मालवाहक गाड़ी पर सवार होकर जा रहे थे, और गाड़ी के पलट जाने से उस पर सवार लोगों में से करीब आधे लोग खत्म हो गए। 
छत्तीसगढ़ में आए दिन सड़क हादसों में लोग इसी तरह बहुत बड़ी संख्या में मारे जाते हैं, और ऐसी खबरें आती और चली जाती हैं। जो लोग खत्म हो जाते हैं, वे तो आगे की तकलीफ से बरी हो जाते हैं, लेकिन जो लोग जिंदा रह जाते हैं और बुरी तरह जख्मी रहते हैं, उनकी बाकी जिंदगी पता नहीं कैसे गुजरती है। इसके अलावा उनके परिवार भी बुरी हालत में आ जाते हैं, अगर वहां कोई और कमाने वाले न हों, अगर उनके पास इलाज का जरिया न हो। ऐसे हादसों के बाद कई तरह की बड़ी दिक्कतें जिंदा लोगों के सामने रहती हैं, इसलिए सारे बीमा और इलाज से परे भी लोगों को हादसों से बचना चाहिए, और सरकार को इसमें अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए। 
आज चुनाव के बीच में एक बहुत नीरस किस्म के मुद्दे को लेकर हमारा यहां लिखना कुछ लोगों को बेमौके का लग सकता है, लेकिन हमारा यह मानना है कि जिंदगी को बचाने के लिए, उसकी कोशिशों के लिए, उसके लिए जागरूकता पैदा करने के लिए किसी मौके की राह देखने की जरूरत नहीं रहती। आज छत्तीसगढ़ की सरकार सड़कों पर हिफाजत को लेकर मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की बात भी नहीं कर सकती, क्योंकि जनता का एक बड़ा तबका इस धोखे में रहता है कि लापरवाही उसका पैदाइशी हक है, और उस पर किसी तरह के नियमों को लागू करना उसकी आजादी छीनने के बराबर है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में अलग-अलग वक्त पर विपक्ष में बैठी भाजपा, और कांग्रेस, दोनों के नेताओं को देख चुके हैं कि किस तरह सरकार की नियम लागू करने की कोशिश विपक्षी राजनीतिक आंदोलन खड़ा कर देती है। कांग्रेस ने तो और भी गजब किया था जब चरणदास महंत और रविन्द्र चौबे जैसे बड़े नेताओं ने हेलमेट अनिवार्य करने के भाजपा सरकार के अभियान का खुलकर समर्थन किया था, और रायपुर शहर के कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसे पोस्टर-बैनर लेकर आंदोलन किया था जिन पर लिखा था- हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को...।
सड़कों पर मौतों को रोकना इसलिए भी जरूरी है कि सरकार या निजी अस्पतालों की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे हादसों के बाद इलाज में लग जाता है, और दूसरे लोगों के इलाज में क्षमता की कमी आड़े आती है। इसके अलावा बीमा कंपनियों को जब भुगतान देना पड़ता है, तो बाकी लोगों के बीमे की किस्तें बढ़ जाती हैं, सरकार पर इलाज का नगद खर्च भी पड़ जाता है। लेकिन रूपए-पैसे से परे भी सड़क हादसों में जिंदगियों का जाना रोकने की हर कोशिश इसलिए भी की जानी चाहिए कि एक हादसा जिन लोगों की लापरवाही, गलती, या किसी मशीनी चूक की वजह से होता है, उस हादसे में सड़क से गुजरने वाले बहुत से चौकन्ना, गलती न करने वाले, और बेकसूर लोग भी मारे जाते हैं। 
इसलिए सरकार को सड़क सुरक्षा को लेकर अपने विभागों का काम सुधारना चाहिए, और जनता को भी नियमों का पालन करना चाहिए। शादी-ब्याह या तीर्थ जैसे माहौल में जब लोग गाडिय़ों पर सवार होकर निकलते हैं, तो सावधानी उनके दिमाग के किसी कोने में नहीं रहती। खुशी और उत्साह कभी शराब के साथ, तो कभी शराब के बिना भी लोगों सिर पर सवार रहते हैं, और कभी-कभी ऐसी गाडिय़ों के ड्राइवर भी खुशी या गम की दारू पाने के बाद गाड़ी चलाते हैं। यह पूरा सिलसिला थमना चाहिए, मौतें थमनी चाहिए। और इन सबमें सरकार और समाज की कोशिशों से एक बहुत बड़ी कमी आ सकती है। 

हिन्दुस्तानी मतदाता के फैसले के पैमाने हैरान करने वाले...

7 अप्रैल 2014
संपादकीय


उत्तर-पूर्वी राज्यों से मतदान शुरू हो गया है, और लोग उत्साह से कतारों में लगे हुए हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के बाकी हिस्सों में अभी कुछ अधिक कड़वी बहस चल रही है, और बहुत से नेता आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। लोगों को भड़काने वाले बयान आ रहे हैं, और वैसी ही बातें लिखी जा रही हैं। यह भी एक अजीब बात रही कि जब देश में मतदान शुरू हो गया, उसके बाद भाजपा ने चुनाव घोषणापत्र जारी किया है, जिसे लेकर लोगों को लग रहा है कि क्या उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए इसके घोषणापत्र की कोई जरूरत ही नहीं थी? खैर एक दूसरा तबका ऐसे लोगों का भी है, जो यह मानता है कि चुनावी घोषणापत्र अब कोई मायने नहीं रखते, और पांचसाला जलसों के एक परंपरागत रिवाज की तरह उनको जारी किया जाता है। ऐसे लोग यह भी मानते हैं कि मतदाता इन घोषणापत्रों को देखते भी नहीं हैं।
अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि मतदाता आखिर किन बातों से प्रभावित हों। खुद हम लोगों को कुछ सुझाने की हालत में नहीं रह जाते, क्योंकि हर चुनाव में यह दिखता है कि राजनीतिक दलों की साख, उम्मीदवारों की साख, इन दोनों को मिलाजुलाकर कोई फैसला लेना अपने आपमें मुश्किल होता है क्योंकि कहीं पर एक पार्टी बेहतर है, तो वहां पर उसके खिलाफ उम्मीदवार की साख बेहतर है। कहीं पर जो विधायक अपनी पार्टी के संसदीय सीट के उम्मीदवार के लिए वोट मांग रहे हैं, वे विधायक बदनाम हैं, तो कहीं पर वे विधायक अच्छे हैं, लेकिन लोकसभा उम्मीदवार खराब है। कहीं-कहीं यह नारा सुनाई देता है कि फलां-फलां मजबूरी है, लेकिन मोदी जरूरी है। अब ऐसे में वोटर किस तरह यह तय करते होंगे कि एक खराब भाजपा उम्मीदवार को वोट न दें, और मोदी को प्रधानमंत्री भी बना दें? और इसका ठीक उल्टा भी किसी दूसरी जगह हो सकता है कि लोग कांग्रेस के उम्मीदवार से नफरत करते हों, लेकिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हों।
अमरीका जैसे देश में जो राष्ट्रपति शासन प्रणाली है उसमें देश में दो बड़ी पार्टियों के दो बड़े नेता पहले से भावी राष्ट्रपति के रूप में पेश किए जाते हैं, और आम जनता वोट सीधे देती है। लेकिन भारत में लोग पहले सांसद चुनते हैं, फिर वे सांसद अपनी पार्टी के संसदीय दल के मुखिया चुनते हैं, और फिर वे मुखिया किसी गठबंधन के मुखिया की शक्ल में अगले प्रधानमंत्री को चुनते हैं। यह पूरा सिलसिला काफी मुश्किल फैसले का दिखता है और हम इसी बात पर हैरान होते हैं कि मतदाता यह कैसे तय करते हैं? बड़े-बड़े चुनाव विश्लेषक भी मतदान केन्द्र के भीतर जाने के बाद वोट मशीन पर लगे हुए नामों और निशानों को देखने के बाद पल भर सोचकर एक ताजा फैसला लेते हैं, और बटन दबाते हैं। ऐसे में आम जनता इतने बड़े देश में कैसे फैसला लेती होगी, यह पूरी दुनिया के लिए भी एक हैरानी की बात रहती है।
इसके अलावा एक और बात यहां करना जरूरी है कि कोई पार्टी या कोई उम्मीदवार जब किसी एक प्रदेश में, या किसी एक सीट पर जब बहुत बड़ी रकम का सैलाब बिखेर देते हैं, तो फिर नोटों से प्रभावित होने वाले वोटों का अंदाज कैसे लग सकता है, और कैसे यह समझ आ सकता है कि किसी प्रदेश या देश में बहुमत पाने वाली पार्टी, या गठबंधन, कितनी लागत में प्रधानमंत्री की कुर्सी खरीदकर दिल्ली पहुंचे हैं? अगर चुनावों को करीब से देखें, तो यह लगता है कि जितने फासले से किसी सीट पर जीत और हार तय होती हैं, उससे अधिक वोट उस सीट पर खरीदे और बेचे जाते हैं। ऐसे में इन चुनावों का क्या लोकतांत्रिक महत्व है? इससे मतदाता के रूख के नाम पर जो बात सामने आती है, उस बात का क्या महत्व है? यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के नाम पर तब एक पाखंड लगता है, जब वोटों को नोटों से पाने को करीब से देखा जाए। अब ऐसे में जो अगली सरकार आ रही है, वह किस कारखानेदार के नोटों से आ रही है, और उस कारखानेदार ने, या वैसे कुछ कारखानेदारों ने इस चुनाव में कितना पूंजीनिवेश किया है, इसका अंदाज लगाना नामुमकिन है। ऐसे में हिन्दुस्तानी मतदाता जिस तरह फैसला लेने जा रहे हैं, वह एक हैरान करने वाली बात छोड़ कुछ नहीं है।

Bat Ki Bat

Bat Ki Bat

7 April, 2014


7 April, 2014

किसी का साथ देना हो, तो झूठ के साथ न दें...

6 अप्रैल 2014
संपादकीय
देश के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के चुनाव दुनिया के सबसे बड़े चुनाव होते ही हैं, और यहां से देखकर दुनिया के बहुत से देश चुनाव करवाना सीखते भी हैं। इस बार की चुनाव इंतजाम के हिसाब से पहले के मुकाबले और बेहतर, और पुख्ता तो रहेंगे ही, इस बार देश की जनता सोशल मीडिया पर अपने पसंदीदा नेताओं, और अपनी पसंदीदा पार्टियों का साथ तो दे ही रही है, विरोधियों पर खासे हमले भी कर रही है। पांच बरस पहले के मुकाबले अब भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कई गुना बढ़ा हुआ दिख रहा है। और दूसरी तरफ देश का मीडिया अपनी-अपनी दुकानों पर पार्टियों और नेताओं का साथ देते हुए, या फिर साथ देता हुआ लगते हुए काम कर रहा है, और उसके इरादों पर भी सवाल उठ रहे हैं। और ये सवाल किसी एक तरफ से नहीं उठ रहे, कई तरफ से उठ रहे हैं। 
मीडिया और सोशल मीडिया, इन दोनों के बारे में यहां पर कुछ बातें हमको लिखना इसलिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि इन दोनों पर समझदार बातों के मुकाबले, समझदार तौर-तरीकों के मुकाबले, नासमझी के तौर-तरीके अधिक दिख रहे हैं। और नासमझी कहना भी शायद अपने आप में सही नहीं होगा, क्योंकि लोग बहुत हमलावर तरीके से खुद को नापसंद लोगों के खिलाफ लिख रहे हैं, और ऐसे समर्थकों की वजह से नेताओं और पार्टियों की एक तस्वीर भी बनना तय रहता है। जिस तरह किसी ईश्वर की धारणा के साथ जुड़े हुए उस धर्म के मानने वाले लोग जब अच्छा या बुरा काम करते हैं, तो उस ईश्वर और धर्म की तस्वीर भी बनती या बिगड़ती है। इसी तरह आज जब नरेन्द्र मोदी के समर्थक या विरोधी, राहुल गांधी के भक्त या उनका मजाक उड़ाने वाले, केजरीवाल को देश का भविष्य मानने वाले, या उनको देश को अंधेरे में धकेलने वाला मानने वाले जब सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाते हैं, तो उससे ऐसे नेताओं और ऐसी पार्टियों  की साख बनती और बिगड़ती भी है। 
ऐसे लोगों के लिए ही हम यहां लिखना चाहते हैं कि अगर किसी का साथ देना हो तो तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीके से, सच को जोड़कर बना हुआ साथ ही काम आता है। आज बहुत से लोग गालियों और नारों की जुबान में, बेइंसाफी की गंदी बातें करते हुए यह मानते हैं कि उनका किसी एक पर हमला, मुकाबले में उसके विरोधी को मजबूत करेगा। लेकिन होता इससे ठीक उल्टा है। ऐसी ही नौबत और ऐसे ही लोगों के लिए बड़े-बुजुर्ग एक बात कह गए थे कि जिनके ऐसे-ऐसे यार, उनको दुश्मन की क्या दरकार। इस पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि आज जनता का एक तबका खुलकर समर्थन और विरोध की बातें लिखने में लगा है। और यह एक अच्छी बात है कि लोग जनमत बनाने में भरोसा रख रहे हैं और उसके लिए वक्त निकाल रहे हैं। लेकिन उनके हमले अगर लोकतांत्रिक नहीं होंगे, अगर ऐसे हमले तर्कसंगत नहीं होंगे, तो ये सिर्फ मूर्खों को ही प्रभावित कर सकेंगे। इसलिए हम आज इस मुद्दे पर यहां इसलिए लिख रहे हैं कि जिनका साथ देना हो, समझदारी से साथ दें, वरना बेसमझ साथ नुकसान छोड़ कुछ नहीं करता। और आज झूठ को पकडऩे के लिए इंटरनेट जैसा आसान औजार हासिल है, और गढ़े गए झूठ जब पकड़े जाते हैं, तो सिर्फ वे खुद नहीं ढहते, उसके साथ-साथ साख भी ढहती है। इसलिए किसी का साथ भी देना हो, तो झूठ के साथ न दें। 

अफगान वोटर कौम को देखकर हिन्दुस्तानी मुर्दे कुछ सीखें..

5 अप्रैल 2014
संपादकीय
तालिबानों की धमकियों के बावजूद अफगानिस्तान में जनता आज अगला राष्ट्रपति चुनने के लिए वोट डाल रही है। वहां रात-दिन आतंकी तालिबान सुरक्षा दस्तों को भी मार रहे हैं, इसलिए उनकी धमकी का वजन कम नहीं आंका जा सकता, और इसी वजह से वहां के निहत्थे आम लोगों के हौसले के वजन को भी कम नहीं आंका जा सकता। अफगानिस्तान के आज के इस मतदान पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, लेकिन आज जब हिन्दुस्तान अगली सरकार चुनने के कगार पर खड़ा है, तो हम वहां लोगों के हौसले की चर्चा करके यहां के लोगों से कुछ बात करना चाहते हैं। 
हिन्दुस्तान के अधिकतर इलाकों में वोट को लेकर कोई धमकी नहीं रहती है। छत्तीसगढ़़ के बस्तर में नक्सली पिछले कई चुनावों से लोगों को वोट डालने पर हाथ काट देने की धमकी देते आए हैं, लेकिन ऐसा हुआ कभी नहीं है। और बाकी हिन्दुस्तान में भी वोट डालने के खिलाफ किसी तरह की हिंसा होने की खबर नहीं रहती। ऐसे में जब लोग अपने सुरक्षित, शहरी, और संपन्न इलाकों में वोट डालने के दिन घर बैठे रहते हैं, या पिकनिक पर चले जाते हैं, तो वे अफगानिस्तान या बस्तर के लोगों के मुकाबले बहुत ही घटिया और गैरजिम्मेदार साबित होते हैं। ऐसा इसलिए हम मानते हैं क्योंकि देश की जो सरकारें बनती हैंं, वे जितने वोट पाती हैं, अक्सर ही उससे अधिक वोटर घर बैठे रहते हैं। इसलिए गैरजिम्मेदार और मुर्दा वोटरों की वजह से देश अच्छी सरकार पाने का मौका खो बैठता है। 
पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त से छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों में मतदाताओं का हौसला बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग और मीडिया ने कई तरह की कोशिशें कीं, और उनका अच्छा नतीजा भी निकला। आज राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवार वोटों के जरा-जरा से फासले को लेकर अपने समीकरण बनाते हैं, और जीत-हार की उम्मीद रखते हैं। जबकि पांच-दस फीसदी अधिक वोट डल जाएं, तो नेताओं के सारे हिसाब-किताब धरे रह जाएंगे। और जो मुर्दा कौम पांच बरस में एक बार किसी सरकार को चुनने का मौका पाकर भी उसका इस्तेमाल नहीं करती, वह एक खराब सरकार पाने की ही हकदार रहती है। दिक्कत यह रहती है कि गैरजिम्मेदार और घर बैठे लोगों की वजह से वोट डालने वाले लोगों की मेहनत खराब जाती है, क्योंकि नतीजे को सारे वोटों को मिलाकर ही आते हैं, और जो सबसे भ्रष्ट और सबसे दुष्ट उम्मीदवार रहते हैं, वे तो मेहनत करके अपने पक्ष में मतदान करवा लेते हैं, वोटों को खरीद लेते हैं। दूसरी तरफ जो अच्छे उम्मीदवार रहते हैं, वे ऐसी खरीदी की ताकत नहीं रखते, और जोड़-तोड़ की तिकड़म भी नहीं रखते। इसलिए घर बैठे मुर्दा लोगों को कम से कम पांच बरस में एक बार अपने आपको जिंदा महसूस करते हुए जाकर वोट देने चाहिए और अच्छे लोगों को चुनना चाहिए।
आज जब अफगानिस्तान से बुर्कों में ढंकी हुई महिलाओं की लंबी-लंबी कतारों की तस्वीरें आ रही हैं, और पिछले वर्षों में लगातार तालीबानी हिंसा का इतिहास तो रहा ही है, तो ऐसी अफगान वोटर कौम के हौसले को देखकर तो हिन्दुस्तानी मुर्दों को कुछ सीखना चाहिए।

बाबरी स्टिंग ऑपरेशन, नीयत के बजाय दर्ज बातें महत्वपूर्ण

4 अपै्रल 2014
संपादकीय
खुफिया कैमरों और माईक्रोफोन से स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए मशहूर कोबरापोस्ट नाम की भारतीय समाचार वेबसाईट ने ताजा भांडाफोड़ किया है, भाजपा, संघ परिवार, और हिंदू संगठनों के बड़े-बड़े नेताओं की बाबरी मस्जिद गिराने में हिस्सेदारी को लेकर। इसका समाचार खुलासे से छप रहा है इसलिए उन बातों को यहां दुहराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा की जरूरत है कि चुनाव के ठीक पहले ऐसे भांडाफोड़ को लेकर भाजपा जो शिकायत कर रही है, वह शिकायत कितनी जायज है, कितनी नहीं। 
1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए हुए अब खासा वक्त हो गया है, और इसके जांच आयोग के नतीजों में कुछ नेता जिम्मेदार पाए गए, और कई नेता सुबूत न मिलने पर बरी हो गए। लेकिन छह दिसंबर के उस दिन से लेकर अब तक देश में शायद ही कोई ऐसे हों, जिनको बाबरी मस्जिद को गिराने को लेकर, उसके पीछे के लोगों और संगठनों को लेकर, उसके पीछे की नीयत को लेकर कोई शक हो। उसके तुरंत बाद जिस तरह से भाजपा-शिवसेना, और बहुत से धर्म संगठनों ने बाबरी मस्जिद गिराने के गौरव पर दावा किया था, या उस पर गर्व किया था, तो उसे लेकर किसी बहुत शक की गुंजाइश नहीं बची थी। अब कोबरापोस्ट का स्टिंग ऑपरेशन अगर लोगों की बातचीत से यह सुबूत सामने रखता है, कि यह विध्वंस इन्हीं तमाम संगठनों का सोचा-समझा काम था, तो यह कोई अधिक सनसनी फैलाने वाला काम नहीं है। अब अगर भाजपा इस बात की शिकायत चुनाव आयोग में कर रही है कि इस स्टिंग ऑपरेशन को चुनावी मौके पर रोका जाए, तो इसे लेकर दो तरह के शक खड़े हो सकते हैं। 
नरेन्द्र मोदी की शक्ल में जब भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री प्रत्याशी तय किया, तो यह बात साफ थी कि देश के भीतर बहुसंख्यक हिंदुओं, और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच किस तरह के धु्रवीकरण की तैयारी भाजपा ने की थी, और बाद में भी धीरे-धीरे न सिर्फ भाजपा ने, बल्कि कांगे्रस और समाजवादी पार्टियों के बकवासी नेताओं ने भी ऐसे धु्रवीकरण में मदद की, जब मोदी के खिलाफ बोटी-बोटी काट देने के सार्वजनिक बयान दिए गए। अब ऐसे धु्रवीकरण के बीच दो दिन पहले ही नरेन्द्र मोदी ने गोश्त के कारोबार को लेकर, गुलाबी क्रांति की तोहमत कांगे्रस पर लगाते हुए जिस तरह गो-हत्या के मुद्दे को छुआ है, वह भी धु्रवीकरण के ऐसे ही बहुदलीय अभियान का एक हिस्सा लगता है। इसलिए आज जब कोबरापोस्ट भाजपा और संघ परिवार, हिंदू संगठनों को बाबरी मजिस्द गिराने के लिए जिम्मेदार साबित करने वाला स्टिंग ऑपरेशन सामने रखता है, तो हमारे लिए यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि इससे भाजपा का नुकसान हो रहा है, या उसका फायदा हो रहा है। जब इस बार की चुनावी राजनीति अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक तबकों के बीच धु्रवीकरण की एक लगातार कोशिश बनकर चल रही है, तो फिर किस तरह की बदनामी किस तबके के बीच नफा दिलाएगी, या नुकसान, यह सोचना आसान नहीं है, और इस ताजा जन्मभूमि-स्टिंग का असर भाजपा के पक्ष में भी हो सकता है। 
दरअसल भारत जैसे लोकतंत्र में चुनावी राजनीति शतरंज की बिसात के घोड़े की तरह है, जो कि किसी भी तरफ ढाई घर चलने का काम करता है। हम भारतीय चुनावी राजनीति की हलचलों, और हरकतों को बहुत आसान लेकर नहीं चलते, इनमें घोड़े का मुंह किसी एक तरफ हो सकता है, लेकिन उसके अगले कदम किसी दूसरी तरफ बढ़कर फिर तीसरी तरफ ढाई घर पूरे कर सकते हैं। फिलहाल हम कोबरापोस्ट के इस स्टिंग ऑपरेशन के पीछे की नीयत को बहुत ज्यादा नहीं देखते, क्योंकि हिंदुस्तान में पूरे वक्त कोई न कोई चुनाव या राजनीतिक आंदोलन चलते ही रहते हैं। ऐसे किसी ऑपरेशन के पीछे की नीयत के बजाय अधिक अहमियत इस बात की है कि उससे क्या साबित होता है। अडवानी से लेकर उमा तक, और मुरलीमनोहर जोशी से लेकर विश्व हिंदू परिषद तक, इन सबने अपने शब्दों, और अपने कामों से, अपने अभियानों से बार-बार यही साबित किया था कि बाबरी मस्जिद को गिराना एक साजिश के तहत हुआ था, और तैयारी के साथ हुआ था। अब अगर वही बात खुफिया कैमरों के मार्फत सामने आ रही है, तो वह आज शायद चुनावी धु्रवीकरण में भाजपा का फायदा ही करे।

नेताओं को सुरक्षा नियमों से छूट, न उनके हित में, न लोकतंत्र के

3 अप्रैल 2014
संपादकीय

कल से खबरों में है कि किस तरह भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के विमान को रोका गया, और उसे आगे की उड़ान में देर हुई। दूसरी तरफ एक खबर यह है कि गुजरात के जिस उद्योगपति, अदानी के विमान से नरेन्द्र मोदी प्रचार के लिए पूरा देश घूम रहे हैं, उसकी जांच में केन्द्र सरकार की एजेंसी को बहुत सी खामियां मिलीं, और इस विमान के पायलट भी किसी इमरजेंसी के लिए तैयार नहीं मिले। हम आगे लिखने के पहले एक दूसरी बात यहां साथ में याद दिलाना चाहते हैं कि किस तरह कुछ हफ्ते पहले भाजपा ने केन्द्र सरकार से यह सार्वजनिक मांग की थी कि नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया जाए। 
भारत में बहुत से नेताओं के साथ हवाई हादसे हुए हैं, और माधवराव सिंधिया से लेकर, वाईएसआर रेड्डी तक, संजय गांधी से लेकर उद्योगपति जिंदल तक, बहुत से लोगों की जिंदगी हवाई दुर्घटनाओं में ही गई है। चुनाव की आपाधापी से परे भी, आम दिनों में भी हवाई दुर्घटनाएं होती हैं, इसलिए हम इस बात को अधिक महत्व नहीं देते कि किस नेता की उड़ान घंटे भर लेट होने से, उसकी आमसभा लेट हो गई। सब लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि उड़ान में कोई भी कमी रहने से, न सिर्फ उसमें बैठे हुए लोग मारे जा सकते हैं, बल्कि नीचे जमीन पर जो लोग रहते हैं, वे भी कई मौकों पर ऐसे गिरे हुए विमानों की चपेट में आकर मरते हैं। इसलिए सुरक्षा नियमों, और सुरक्षा इंतजामों से किसी को भी छूट नहीं मिलनी चाहिए। और अगर सब कुछ ठीक रहने के बावजूद, अगर केन्द्र सरकार की मातहत किसी एजेंसी ने जानबूझकर मोदी की उड़ान लेट की है, तो इसकी तो जांच बाद में हो सकती है। खुद भाजपा के लिए यह एक अच्छी बात है कि कभी नहीं से देर भली। अपने प्रधानमंत्री-प्रत्याशी को खतरे में डालने के बजाय, उसे अपने नेता को हिफाजत से रखने की कोशिश करनी चाहिए। 
दूसरी बात चुनाव से परे की भी है। नेताओं की सुरक्षा पर देश का इतना पैसा खर्च होता है, और आम जनता की दिक्कतों की कीमत पर नेताओं को एक खास दर्जा देकर सुरक्षा जांच से छूट दी जाती है, दूसरे लोगों की जिंदगियों को खतरे में डालकर भारतीय लोकतंत्र के नेताओं, और बड़े जजों, और कुछ संवैधानिक ओहदों पर बैठे लोगों को बिना जांच सार्वजनिक विमानों में चढऩे मिलता है, जो कि आम जनता की जिंदगी के लिए खतरा हो सकता है। यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए। पांच बरस पहले से लोगों को पता रहता है कि कब चुनाव होने हैं, इसलिए वक्त रहते दौरा बना लेना चाहिए, और सबकी जिंदगी खतरों में नहीं डालनी चाहिए। किसी तरह देश और प्रदेश में सड़क के रास्ते चलने वाले लालबत्ती काफिलों के लोगों को भी कई दिन पहले से अपने खुद के कार्यक्रम मालूम रहते हैं इसलिए उनको जल्दी रवाना होकर, सड़क की जिंदगी तबाह किए बिना अपने काम पर पहुंचने की आदत डालनी चाहिए। ऐसा न होने पर वे सड़कों पर कितनी जिंदगियों को खतरे में डालते हैं, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। बहुत से ऐसे हादसे हुए हैं जब बड़े ओहदों की लालबत्तियों के ट्रैफिक जाम की वजह से सड़कों पर मरीज मारे गए हैं। 
यह चुनाव तो कुछ हफ्तों बाद खत्म हो जाएगा, लेकिन जनता के बीच से लोगों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचकर आम और खास के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करनी चाहिए, उसके बिना आम जनता के मन में खास नेताओं के लिए नफरत बढ़ती चली जाएगी। खुद नेताओं को भी सुरक्षा नियमों से उनको मिलने वाली छूट छोडऩी चाहिए, जनता से कटकर, जनता की नफरत झेलकर उनका कुछ भला नहीं हो सकता। 

प्रेमी जोड़ों को मारने वाला समाज अपनी संभावनाएं नहीं छू सकता

2 अप्रैल 2014
संपादकीय

बिहार के कटिहार से खबर है कि गांव के एक मुखिया ने जाति के बाहर शादी करने वाले एक प्रेमी जोड़े को बंधक बनाकर रखवाया, मारा-पीटा, और सिर मुंडाकर, जूतों की माला पहनाकर गांव में उनका जुलूस निकाला। इस मामले में तो प्रेमी जोड़े की जान बच गई, लेकिन देश में आए दिन कहीं न कहीं प्रेमी जोड़ों की हत्या होती है, या उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया जाता है। हम बार-बार ऐसे मुद्दों पर लिखते हैं कि जो देश इतना दकियानूसी रहता है, जो समाज इतना हिंसक रहता है, उसमें प्रेम की उम्र वाली पीढ़ी लगातार एक निराशा और कुंठा के बीच जीती है, और देश को, समाज को, परिवार को उसकी संभावनाओं और उसकी उत्पादकता का फायदा नहीं मिल पाता। 
देश का कानून दकियानूसी इलाकों, और जातियों के बीच की ऐसी हिंसा को खत्म नहीं कर पा रहा है, इसलिए कि कानून को लागू करने की जिम्मेदारी सरकार हांकने वाली जिन ताकतों पर है, उनको जाति व्यवस्था, धर्म व्यवस्था की कट्टरता को बढ़ावा देते रहने में वोटों का फायदा दिखता है। 
भारत के समाज को यह समझना होगा कि पे्रम से नफरत करके वह अपने ही बीच के लोगों को ऐसी घोर निराशा में जीने पर मजबूर कर देता है कि उससे समाज की मानसिक सेहत बुरी तरह से खराब हो रही है। आज पे्रम के लिए किसी विदेशी संस्कृति की जरूरत नहीं है, कृष्ण से लेकर कालिदास तक और हिंदी फिल्मों में राजकपूर के भी पहले से लेकर अब तक, कदम-कदम पर पे्रम बिखरा हुआ है। और जिंदगी में पे्रम एक ऐसी भावना है जो लोगों को बेहतर काम करने की तरफ बढ़ाती है और गलत काम करने से रोकती है। ऐसे पे्रम को रोकना अपने ही बच्चों का नुकसान करना है। आत्महत्याओं और हत्याओं की खबरें ही समाज में पे्रम और उससे नफरत की हालत को बताने के लिए काफी नहीं हैं, और हकीकत इन खबरों से हजार गुना अधिक हो। और ऐसे में उस कड़वी हकीकत के चलते नौजवान पीढ़ी की निराशा भी इन खबरों से हजार गुना अधिक हो। जो नाली और गटर से छोटे-छोटे नवजात शिशु बरामद होते हैं, उन हत्याओं और मौतों के पीछे भी समाज का ऐसा नजरिया ही रहता है जो पे्रम संबंधों को इजाजत नहीं देता, दूसरी जाति या दूसरे धर्म में शादी की इजाजत नहीं देता। शादी के पहले बच्चे होने को इजाजत की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
एक साल पहले हमने अपने अखबार में छापा था कि किस तरह छत्तीसगढ़ के एक गांव में पे्रम विवाह करने वाले जोड़े पर गांव की पंचायत ने पचास हजार रुपये का जुर्माना लगाया, तो इस नौजवान जोड़े को गांव छोड़कर ही भाग जाना पड़ा। गुजरात के ईंट भ_े में काम की तलाश में पहुंचे इन लोगों ने अपनी बच्ची से छुटकारा पाने के लिए उसे टे्रन में छोड़ा तो एक अखबार में छपी तस्वीर को देखकर साथी मजदूरों से वह बच्ची पुलिस के मार्फत फिर इस मां-बाप की गोद में आ गई। 
बिहार को कोसना, और छत्तीसगढ़ की ज्यादती को अनदेखा करना गलत होगा। यहां भी कुछ समय पहले बिलासपुर के एक किसी स्कूल या कॉलेज ने लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाई, और एक किसी जाति के संगठन ने अपनी जाति की लड़कियों की पोशाक पर तरह-तरह की रोक का फतवा जारी किया। सरकार चूंकि वोटों से चुनकर बनती है, इसलिए सरकार समाज सुधार के ऐसे फैसले आसानी से नहीं ले सकती जो कि मतदाताओं के एक संगठित तबके को नाराज करते हों। इसलिए निर्वाचित सरकारों से परे समाज के लोगों को ही आगे आकर समाज के अपने या पराए तबकों की नाराजगी को झेलना होगा। इसके बिना यह समाज दकियानूसी बने रह जाएगा और यह प्रदेश अपनी नौजवान पीढ़ी की क्षमताओं को कभी हासिल नहीं कर पाएगा। आज की जिस घटना को लेकर हम इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, उसके लिए जिम्मेदार सरपंच पर, पंचायत पर कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसा न होने पर दकियानूसीपन एक संक्रामक रोग की तरह दूसरी जगहों तक फैलने की ताकत रखता ही है।

Bat ke bat, बात की बात,

1 april 2014

ताकतवर को रियायत देने वाले मीडिया की चुप्पी का विकल्प

1 अप्रैल 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी को लेकर मीडिया में यह आम बात है कि वे किसी पैने इंटरव्यू, या पैने सवालों के खिलाफ हैं, और वे सिर्फ एकतरफा बोलना चाहते हैं, जवाब देना नहीं चाहते। यह बात कुछ हद तक सही इसलिए है कि वे बहुत से धारदार अखबार वालों से बात नहीं करते, कुछ ऐसे इंटरव्यू भी पिछले बरसों में उन्होंने दिए, जिनके बीच से वे उठकर चले गए। इसलिए लोगों का यह मानना रहता है कि वे गुजरात दंगे जैसे नाजुक मुद्दे पर सवालों के जवाब देने से बचते हैं, और अपनी आमसभाओं की भीड़ के बीच वे मनचाहे मुद्दों पर मनचाही बात कहकर, किसी भी असुविधा से बचकर चले जाते हैं। 
लेकिन जब भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की बात करें, तो यह बात साफ होती है कि राहुल गांधी या सोनिया गांधी भी पैने सवालों से दूर रखे जाते हैं, और जब राहुल गांधी का सबसे चर्चित और प्रचारित इंटरव्यू होता है, तो भी उसमें दर्शकों और पाठकों के मन में खड़े हुए सबसे पैने सवालों में से कोई सवाल नहीं पूछा जाता। उससे जाहिर होता है कि ऐसे इंटरव्यू कुछ शर्तों के बाद ही शुरू होते हैं, और उन शर्तों को मानते हुए ही खत्म कर लिए जाते हैं। अपने आपको देश का सबसे बड़ा टीवी पत्रकार बतलाने वाला, हर किसी की धज्जियां उड़ा देने वाला भी जब राहुल गांधी के बड़े लंबे इंटरव्यू में सबसे तीखे हो सकने वाले दर्जन भर सवालों में से एक को भी नहीं छूता है, तो यह जाहिर है कि इंटरव्यू तय करवाने वालों के साथ यह किस तरह की मैच फिक्सिंग रहती है। इसके साथ-साथ लगे हाथों हम यह भी देखें कि सोनिया गांधी से कभी भी पैने सवाल नहीं किए जाते, और अभी जब कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हुआ, तो शायद पहले से कुछ चुनिंदा पत्रकारों को चुनिंदा सवालों के साथ छांटकर तय करके रखा गया था, और उनकी बारी पूरी होते ही सवाल-जवाब खत्म कर दिए गए। 
इसलिए राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं तक पहुंच रखने वाले बड़े नामी-गिरामी पत्रकारों, और मीडिया हाऊसों की चुप्पी देखने लायक रहती है। हम अकेले मोदी की चुप्पी को कोसना नहीं चाहते, और न ही सोनिया-राहुल जैसे कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के लायक दिग्गज नेताओं के साथ मीडिया की रियायत को अनदेखा करना चाहते। बड़े मीडिया-कारोबार, और सरकार पर आते-जाते रहने वाले बड़े नेताओं के बीच  की सहमति लोकतंत्र के भीतर एक आपसी सहूलियत वाली चुप्पी रहती है, जो कि बाजार के कारोबार से लेकर राजनीतिक कारोबार तक, हर जगह जरूरी रहती है। इसलिए लोकतंत्र को एक पूरी आजादी की व्यवस्था मानकर चलना गलत होगा। यह सैद्धांतिक बात व्यवहार में एक सीमा के बाद दम तोड़ देती है। और जमाने से चलते आ रहा और पिटा हुआ एक लतीफा यह है कि एक पति घर में अपनी आजादी के बारे में कहता है कि उसे अपनी मर्जी का हर काम करने की आजादी है, बीवी की इजाजत से। इसी तरह भारतीय लोकतंत्र में मीडिया के बड़े कारोबार सारे पैनेपन, और सारी धार की पूरी आजादी है, सबसे ताकतवर लोगों को बख्शते हुए। 
ऐसे ही मौकों पर आज सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक कारगर और धारदार औजार बनकर उभरा है। भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों को संविधान के तहत दर्जा दिया गया है, और फिर मीडिया में खुद के लिए चौथे स्तंभ का दर्जा अपने हाथ से तख्ती लिखकर जुटा लिया। अब दो नए स्तंभ लोकतंत्र में जमीन फोड़कर निकल रहे हैं, सोशल मीडिया, और जनसंगठन। इन दोनों ही ने अपने-अपने बूते पर स्थापित नेताओं और स्थापित पार्टियों, सत्ता और ताकत के दूसरे तबकों के लिए चुभने वाली दिक्कतें खड़ी करना शुरू किया है। और इसके साथ-साथ इन तबकों ने जनता के मन में जो सवाल नहीं भी उठते हैं, उनको भी उठाने का काम किया है। भारतीय लोकतंत्र में सोशल मीडिया और जनसंगठन, जनआंदोलन, इन सबने पिछले बरसों में सरकार, राजनीति, संसद, और अदालतों की नाकामयाबी को खासा उजागर किया है। ऐसे में बड़े नेताओं को बख्श देने वाले स्थापित और परंपरागत मीडिया की भोथरी हो चुकी धार की जगह अब अराजकता की हद तक आजाद सोशल मीडिया ने एक नई धार पेश की है, जो आज लोकतंत्र के बाजार में सबसे तेज ब्लेड है। 
(मीडिया) कारोबार और सरकार के बीच की नूरा-कुश्ती के चलते जो सवाल मोदी या राहुल से, सोनिया या किसी और से जब अखबारनवीस नहीं पूछते हैं, या उनको न पूछने की शर्त पर इंटरव्यू का मौका पाते हैं, और खुद अपनी जुबानी मीडिया का एक इतिहास रचने का दावा करते हैं, तब ऐसे न पूछे गए सवाल ट्विटर और फेसबुक पर छा जाते हैं, और बचे हुए नेताओं के सामने भी खड़े हो जाते हैं, और बचाने वाले मीडिया के सामने भी।