17 अप्रैल 2014
संपादकीय
भारत जैसे चुनाव पर आधारित संसदीय लोकतंत्र में बहुत समय तक तो आम जनता को सिर्फ सुनना या पढऩा नसीब होता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है, कम्प्यूटर, फोन, इंटरनेट, और सोशल मीडिया में लोगों को सही मायनों में मुफ्त और बड़ा आसान हक दे दिया है, अभिव्यक्ति की आजादी का। इसलिए आज चुनाव के बीच में भी हम बचे हुए मतदान को लेकर यह बात लिख रहे हैं कि इस हक का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपनी पसंद और नापसंद से दूसरे लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे लोग अपनी खुद की सोच को आगे बढ़ा सकते हैं, और देश की अगली सरकार को अपनी मर्जी का लाने की कोशिश कर सकते हैं।
लेकिन ऐसा करते हुए लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी कही हुई या फैलाई गई बातों के साथ-साथ उनकी अपनी साख भी जुड़ी रहती है, इसलिए कभी सच का साथ न छोड़ें, कभी झूठ का ढिंढोरा न पीटें। आज का वक्त इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को बहुत रफ्तार से पकड़ लेता है, और उसे नंगा करके चौराहे पर बांध भी देता है। ऐसे झूठ के साथ अगर आपका नाम जुड़ा रहे, तो इससे आपकी साख इस हद तक चौपट हो जाती है कि आपकी कही बाकी की सच बातें भी लोगों का भरोसा नहीं जीत पातीं। झूठे इंसानों का कहा हुआ सच भी उनकी खराब साख की वजह से राख सा हो जाता है।
लोकतंत्र में लोगों को अपनी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, और आर्थिक सोच को फैलाने का काम करना चाहिए, इसलिए भी कि अगर सोच के रास्ते से कोई विचारधारा आगे नहीं बढ़ती, तो फिर वह हिंसा के रास्ते आगे बढ़ती है। इसलिए अहिंसक और न्यायप्रिय तरीका विचारों से दूसरों को सहमत कराने का होता है। आज यह बात इसलिए जरूरी है कि बचे हुए मतदान के लिए भी अगर लोग अपने आसपास के दायरे को प्रभावित करके, या कम से कम उसकी कोशिश करके, और लोगों को भी वोट डालने के लिए ले जाते हैं, तो वे भ्रष्ट नेताओं और पार्टियों के नोटों की कोशिशों के मुकाबले एक अच्छी कोशिश होगी। विचारों का फैलाव आज संगठन और बड़े नेता एक सोची-समझी योजना और रणनीति के तहत करते हैं। लेकिन जब आम लोग अपने-अपने दायरों के भीतर, उसके बाहर भी आसपास के लोगों तक ऐसी कोशिश करेंगे, तो वह तरीका अधिक लोकतांत्रिक होगा, अधिक विविधताओं से भरा हुआ होगा, और उसका नतीजा समाज के व्यापक हित में अधिक दूर तक काम आएगा।
विधानसभा चुनाव के समय हमने यह बात लिखी थी कि हममें से हर कोई अगर आसपास के दस घर बैठे लोगों को भी वोट डालने के लिए ले जाने में कामयाबी हासिल करे, तो उससे पूरी तस्वीर ही बदल सकती है। ऐसे लोग अपनी इस कोशिश के साथ-साथ अपनी पसंद और अपनी विचारधारा भी लोगों के दिमाग में बिठा सकते हैं, और ऐसा काम नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। खुद के वोट का हक तो एक चुनाव में महज एक बार मिलता है, लेकिन दूसरों को प्रभावित करने का हक तो बाकी के पूरे दिन अपने इलाके में मिलता है, और फोन पर, इंटरनेट पर किसी भी दिन किसी भी दूसरे इलाके में भी अपनी बात पहुंचाने के लिए मिलता है। इसलिए हर किसी को आज न सिर्फ अपने खुद के वोट को डालना अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए, बल्कि दूसरे लोगों के वोट डलवाने को भी अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए। एक नए लोकतंत्र के लिए सत्ता के चले आ रहे ढांचे के ढर्रे को तोडऩा जरूरी है, और यह काम आम जनता ही कर सकती है। जिस तरह अपनी मौत के बाद के लिए लोग अपनी आंखें दूसरे जरूरतमंद के लिए छोड़कर जा सकते हैं, और उस तरह उनकी आंखें किसी दूसरे बदन में एक नई जिंदगी पा सकती हैं, उसी तरह अपने वोट के अलावा दूसरे वोट प्रभावित करने से आप एक ऐसा हक पा सकते हैं, जो कि कानून ने आपको नहीं दिया है, लेकिन आपकी कोशिश और आपका असर दूसरों की ऊंगलियों के मार्फत आपको यह हक दिला सकता है।









