अपने वोट के हक से और आगे बढ़कर एक हक और

17 अप्रैल 2014
संपादकीय

भारत जैसे चुनाव पर आधारित संसदीय लोकतंत्र में बहुत समय तक तो आम जनता को सिर्फ सुनना या पढऩा नसीब होता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है, कम्प्यूटर, फोन, इंटरनेट, और सोशल मीडिया में लोगों को सही मायनों में मुफ्त और बड़ा आसान हक दे दिया है, अभिव्यक्ति की आजादी का। इसलिए आज चुनाव के बीच में भी हम बचे हुए मतदान को लेकर यह बात लिख रहे हैं कि इस हक का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपनी पसंद और नापसंद से दूसरे लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे लोग अपनी खुद की सोच को आगे बढ़ा सकते हैं, और देश की अगली सरकार को अपनी मर्जी का लाने की कोशिश कर सकते हैं। 
लेकिन ऐसा करते हुए लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी कही हुई या फैलाई गई बातों के साथ-साथ उनकी अपनी साख भी जुड़ी रहती है, इसलिए कभी सच का साथ न छोड़ें, कभी झूठ का ढिंढोरा न पीटें। आज का वक्त इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को बहुत रफ्तार से पकड़ लेता है, और उसे नंगा करके चौराहे पर बांध भी देता है। ऐसे झूठ के साथ अगर आपका नाम जुड़ा रहे, तो इससे आपकी साख इस हद तक चौपट हो जाती है कि आपकी कही बाकी की सच बातें भी लोगों का भरोसा नहीं जीत पातीं। झूठे इंसानों का कहा हुआ सच भी उनकी खराब साख की वजह से राख सा हो जाता है। 
लोकतंत्र में लोगों को अपनी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, और आर्थिक सोच को फैलाने का काम करना चाहिए, इसलिए भी कि अगर सोच के रास्ते से कोई विचारधारा आगे नहीं बढ़ती, तो फिर वह हिंसा के रास्ते आगे बढ़ती है। इसलिए अहिंसक और न्यायप्रिय तरीका विचारों से दूसरों को सहमत कराने का होता है। आज यह बात इसलिए जरूरी है कि बचे हुए मतदान के लिए भी अगर लोग अपने आसपास के दायरे को प्रभावित करके, या कम से कम उसकी कोशिश करके, और लोगों को भी वोट डालने के लिए ले जाते हैं, तो वे भ्रष्ट नेताओं और पार्टियों के नोटों की कोशिशों के मुकाबले एक अच्छी कोशिश होगी। विचारों का फैलाव आज संगठन और बड़े नेता एक सोची-समझी योजना और रणनीति के तहत करते हैं। लेकिन जब आम लोग अपने-अपने दायरों के भीतर, उसके बाहर भी आसपास के लोगों तक ऐसी कोशिश करेंगे, तो वह तरीका अधिक लोकतांत्रिक होगा, अधिक विविधताओं से भरा हुआ होगा, और उसका नतीजा समाज के व्यापक हित में अधिक दूर तक काम आएगा। 
विधानसभा चुनाव के समय हमने यह बात लिखी थी कि हममें से हर कोई अगर आसपास के दस घर बैठे लोगों को भी वोट डालने के लिए ले जाने में कामयाबी हासिल करे, तो उससे पूरी तस्वीर ही बदल सकती है। ऐसे लोग अपनी इस कोशिश के साथ-साथ अपनी पसंद और अपनी विचारधारा भी लोगों के दिमाग में बिठा सकते हैं, और ऐसा काम नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। खुद के वोट का हक तो एक चुनाव में महज एक बार मिलता है, लेकिन दूसरों को प्रभावित करने का हक तो बाकी के पूरे दिन अपने इलाके में मिलता है, और फोन पर, इंटरनेट पर किसी भी दिन किसी भी दूसरे इलाके में भी अपनी बात पहुंचाने के लिए मिलता है। इसलिए  हर किसी को आज न सिर्फ अपने खुद के वोट को डालना अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए, बल्कि दूसरे लोगों के वोट डलवाने को भी अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए। एक नए लोकतंत्र के लिए सत्ता के चले आ रहे ढांचे के ढर्रे को तोडऩा जरूरी है, और यह काम आम जनता ही कर सकती है। जिस तरह अपनी मौत के बाद के लिए लोग अपनी आंखें दूसरे जरूरतमंद के लिए छोड़कर जा सकते हैं, और उस तरह उनकी आंखें किसी दूसरे बदन में एक नई जिंदगी पा सकती हैं, उसी तरह अपने वोट के अलावा दूसरे वोट प्रभावित करने से आप एक ऐसा हक पा सकते हैं, जो कि कानून ने आपको नहीं दिया है, लेकिन आपकी कोशिश और आपका असर दूसरों की ऊंगलियों के मार्फत आपको यह हक दिला सकता है। 

यह आम मीडिया है, या महज राजनीति मीडिया?

16 अप्रैल 2014
संपादकीय
भारत के मीडिया को देखें, तो पिछले कई महीनों से राजनीति खबरों पर, और विचारों के पन्नों पर भी इस कदर हावी है कि जिंदगी में मानो और कोई बात ही नहीं है। चुनाव अहमियत जरूर रखते हैं, लेकिन चुनावों से परे भी बहुत सी ऐसी बातें होती हैं, जिनके बारे में अखबारों को पढऩे वालों, और टीवी की खबरों को देखने वालों को मालूम होना चाहिए। हम खुद अखबार और टीवी के भरोसे दिन नहीं गुजार पाते, और इस अखबार को तैयार करते हुए ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क को लगातार देखने पर मजबूर रहते हैं, जहां पर कि भारतीय राजनीति से परे खबरें भी भरी रहती हैं। यह हालत मीडिया के कारोबार का एक बहुत आक्रामक तेवर बताती है कि जो सबसे अधिक बिक सकता हो, उसे सबसे अधिक दुह लिया जाए। राजनीति ऐसे ही सबसे अधिक बिकने वाले दो-तीन सामानों में से एक है।
ऐसे में हम उम्र गुजार चुके लोगों के बारे में अधिक फिक्रमंद नहीं हैं, लेकिन जो नई पीढ़ी राजनीति से परे भी बहुत कुछ जानना चाहती है, जिसके लिए दुनिया और जिंदगी के हर पहलू की जानकारी आगे के मुकाबले के लिए जरूरी रहती है, उस पीढ़ी को हिंदुस्तान का आज का मीडिया बहुत ही सीमित दायरे में जानकारी देकर अधर में छोड़ दे रहा है। जिस तरह हिंदुस्तान का खेल क्रिकेट के बोझ से दबकर बाकी लगभग तमाम खेलों को बच्चों के स्तर पर खो सा चुका है, उसी तरह राजनीति में खबरों को दबाकर, कुचलकर, उन पर लगभग एकाधिकार कायम कर लिया है।
यह नौबत इसलिए ठीक नहीं है, कि राजनीति महज राजनीतिक दलों, नेताओं, और चुनावों की बात नहीं होनी चाहिए। राजनीति के साथ जिंदगी के बाकी तमाम पहलुओं का भी एक रिश्ता होना चाहिए, लेकिन आज मानो वह सब खत्म हो चुका है। कला, संगीत, साहित्य, इतिहास, पढ़ाई-लिखाई, टेक्नॉलॉजी, समाज, ऐसे तमाम पहलुओं के बारे में इतना कम पढऩे मिल रहा है, और इतना कम देखने मिल रहा है, कि भारत के मूलधारा के मीडिया को राजनीति मीडिया कहना शायद ज्यादा सही होगा। जिस तरह कुछ अखबार कारोबार के अखबार रहते हैं, और कारोबार की ही खबरों को अधिक छापते हैं, उन अखबारों के पाठकों को बाकी बातों से अधिक लेना-देना नहीं रहता, उसी तरह आज आम अखबार राजनीति की खबरों पर जाकर थम जा रहे हैं। जिंदगी के बहुत से इतने अच्छे पहलू रहते हैं, कि उनके बारे में जानकर लोग राजनीति कडुवाहट से उबर भी सकते हैं, लेकिन उनके लिए मीडिया में कोई जगह नहीं रह गई। हो सकता है कि मीडिया का एक हिस्सा इन आम चुनावों के निकल जाने के बाद एक नए किस्म का मीडिया बनने की कोशिश करे और वह ताजी हवा का एक झोंका हो सकता है, और यह भी हो सकता है कि वह मीडिया के कारोबार के लिए भी एक बेहतर नौबत रहे।

अफसरों और सरकार के बीच क्यों न हो करार

संपादकीय 
15 अप्रैल 2014
यूपीए-1 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू, और कोलगेट के दौरान कोयला सचिव रह चुके पीसी परख की किताब से सहमी कांग्रेस, यह खैर मना सकती है कि, अपनी ऑडिट रिपोर्टों से यूपीए-2 के पैरों तले कालीन खींचने वाले कैग विनोद राय ने, अपने किताब चुनाव पूरे हो जाने के बाद लाने का फैसला किया है। इन दोनों पूर्व अफसरों की किताबों के सामने आने के वक्त पर, उनमें लिखी बातों के सच, या झूठ होने के अलावा यह मुद्दा भी उठाया जा रहा है कि इन्होंने किसी ओहदे में रहने के कारण मिली सरकार की भीतरी बातों तक अपनी पहुंच का गलत फायदा पैसे कमाने, या राजनीतिक मकसद के लिए उठाया। जहां तक इन किताबों में लिखी बातों में से किसी के झूठ होने का डर है, तो इसके लिए देश में कई कानून है, जिनका सहारा लेकर, कांग्रेस पार्टी लेखक बने इन पुराने अफसरों से निबट सकती है। लेकिन अगर यह मुद्दा किसी अहम ओहदे पर होने की वजह से किसी गोपनीय, या निजी जानकारी को बेचने का है, तो यह देखना सरकार की जिम्मेदारी है, कि वह ऐसी बातें कैसे रोके। पुराने साथियों के लिखे संस्मरणों से दो पक्षों में आपसी मनमुटाव, या कड़वाहट उनका आपसी मामला हो सकता है, लेकिन जनता के पैसों से तनख्वाह पाने वाले अफसर, अगर अपनी किताबों के जरिये ,किसी संवैधानिक स्थिति के कारण मिले अधिकारों का  निजी फायदा उठाए, या देश के भीतर संवैधानिक ढांचे को नुकसान पहुंचाए, या सरकारी तनख्वाह पाते हुए इक_ा की गई जानकारी का इस्तेमाल जनता की बजाए किसी निजी पक्ष के फायदे के लिए करे, तब यह सोचना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, कि इसे कैसे रोका जाए।
पिछले कुछ सालों में सेना, न्यायपालिका, सरकारी कंपनियों, पुलिसबल वगैरह में अपनी नौकरियां छोड़कर अफसरों के सीधे चुनाव में कूदने, या सरकार के मुकाबले खड़ी कंपनियों में ऊंचे ओहदों पर चले जाने पर काफी बहस हुई, और एक "कूलिंग ऑफ पीरियड" की जरूरत का भी चर्चा हुआ। बहुत से मामलों में देखा गया कि अफसर ऐसी व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए किसे कंपनी में कोई पद लेने की बजाय उसके सलाहकार बनाया, कायदे तोड़ते मरोड़ते रहे। गोपनीयता की जिम्मेदारी वाले पदों पर रहे अफसर नौकरी छोड़ सीधे विरोधी दलों में शामिल हो गए, और सरकार की  संवेदनशील जानकारियों पर खुली बयानबाजी करने लगे। यह भी देखा गया कि, सेना में हथियारों की खरीद से जुड़े महकमे में रहे अफसर, हथियार  या रक्षा सामान बेचने वाली कंपनियों के जन संपर्क एजेंट या अफसर बन गए, दूरसंचार विभाग के अफसर टेलिकॉम कंपनियों के अफसर या सलाहकार बन गए।
हमारा मानना है कि ऐसी बातों के नुकसान उठाने से बचने के लिए, सरकार जिन्हें नौकरी दे, उनके साथ कानूनी करार कर ले कि, वह नौकरी छोडऩे के कितने समय तक, किस किस तरह की कंपनियो में,  किस किस तरह के पद नहीं ले सकते, क्या-क्या नहीं लिख सकते, और अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उसकी सजा, या जुर्माना क्या क्या हो सकताहै? सरकारी पदों पर जनता के पैसों से तनख्वाह पाने वाले अफसरों को सरकार के साथ  यह करार करना  जरूरी कर दिया जाए।  ऐसा नहीं कि, बोलने लिखने की आजादी से हमारा कोई विरोध है, बल्कि हम यह भी कहते हैं कि अहम ओहदों पर रहते हुए जिम्मेदार लोग अगर अपने कामों का दस्तावेजीकरण करें, अपने ओहदे से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्हें दर्ज भी करें, तो यह एक अच्छी बात होती है। इससे एक  सामयिक इतिहास दर्ज होते चलता है , लेकिन जब इसमें किसी दूसरे के बारे में किसी की राय दर्ज होने लगती है, तो यह एक संजीदा मसला बन जाता है। तब किसी ओहदे पर रहने के कारण कहीं तक मिली पहुंच को उजागर करने की इजाज़त देने की आजादी को कानूनी तराजू में तौलना जरूरी हो जाता है। सरकार चाहे तो किसी सरकारी अफसर के पद छोडऩे के एक तय समय तक, ऐसी कोई जानकारी उजागर करने के लिए किसी इतने तगड़े जुर्माने की शर्त भी करार में लगा सकती है, जिसके बाद संगीन जानकारियां उजागर करने का उत्साह, या लालच दोनों खत्म ही हो जाए। इसके बाद भी अगर किसी को लगता है कि देश, जनता के  फायदे के लिए उसका मुंह खोलना जरूरी है, तो वह जनता के लिए अपनी वफादारी की खातिर, करार में तय रकम अदाकर वह यह राज उजागर कर सकता है।

अमूमन संवैधानिक संस्थाओं, जैसे संसद, नगरपालिकाओं, पंचायतों के कार्यकाल 5 बरस के होते हैं, इसलिए राजनीतिक दल अक्सर उनके हितों के खिलाफ काम करने वालों को 6 साल के लिए निकालते हंै, ताकि कम से कम एक कार्यकाल तक ऐसे लोग दल में ना लौट सकें। हमारा भी सुझाव है कि सरकार अफसरों पर, नौकरी छोडऩे के 6 साल तक संस्मरण लिखने, सरकार के मुकाबले व्यापार कर रही कंपनियों, या  सरकार से फायदे उठाने वाली कंपनियों में नौकरियां लेने पर रोक लगा सकती है। ऐसा करने पर एक सरकार 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और ओहदे के कारण किसी जानकारी तक पहुंच रखने वालों से उसे नुकसान उठाने का डर भी नहीं रहेगा। हम इसे सरकार बनाम निजी आजादी के मुद्दे की तरह नहीं देखते। अगर सरकारी ओहदों पर आने वालों को लगता है कि ऐसी शर्तों से उनका नुकसान होता है, तो वह सरकार से, ऐसा करार करने के पहले ज्यादा तनख्वाह या सुविधाओं की मांग कर सकते हंै। हमारी समझ से सरकार या संवैधानिक संस्थाओं की साख खराब होने, या जनता के पैसे से तनख्वाह पाने की जवाबदेही भूलने के खतरे से, यह कीमत कम होगी।

मुजरिमों की चपेट में समलैंगिक-यह तो होना ही था

संपादकीय
14 अप्रैल 2014

मुंबई से खबर है कि जब से सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को उलट कर, इसे एक जुर्म करार देने वाली धारा 377 को  सही ठहराया है, तब से समलैंगिकों के साथ हिंसा, लूट और उनके ब्लैकमेल की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। समलैंगिकों को निशाना बनाने वाले  अपराधी गुट सक्रिय हो गए हैं। इनकी जांच करने पर देश में समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने पाया कि यह अपराधी गुट एक ही जैसे तौर तरीके अपना कर समलैंगिकों को निशाना बनाते हंै,और जब वह पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने जाते हंै, तो पुलिस उनसे ही उल्टा पूछती है कि कहीं वह समलैंगिक तो नहीं। पिछले साल दिसम्बर में जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ फैसला देते हुए, समलैंगिकता के निरपराधीकरण का जिम्मा संसद पर डाल दिया था, तभी समलैंगिकों के साथ ऐसे हादसे होने का डर जताया गया था। आज वह डर सच साबित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की कई विशेषज्ञों ने  कड़ी आलोचना की थी। खुद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस फैसले पर चिंता जताई  थी, लेकिन चुनाव के साल में, जब जाति धर्म के सहारे  वोट बटोरे जाते हंै, अल्प संख्यकों की भलाई की बातें की जाती हंै, तब देश का कौन सा राजनीतिक दल धर्मगुरुओं की नाराजग़ी मोल लेकर, देश के इन अल्पसंख्यकों के हक में खड़ा होगा?    
मजे की बात यह है कि, समलैंगिकता  को जिन अंग्रेजों ने 16 वीं सदी में भारत में जुर्म करार दिया, उन्होंने 1967 में ही अपने देश में इसे जुर्म मानना बंद कर दिया था। लेकिन हिन्दुस्तान में जैसा कहते हंै- अंग्रेज  चले गए, यह पाखंड छोड़ गए, जिसे यहां जाने किसलिए निभाया जा रहा है। वर्ना दिल्ली हाई कोर्ट ने तकरीबन पांच साल पहले के अपने फैसले में साफ कहा था कि दो बालिगों की आपसी रजामंदी  से बनने वाले ऐसे  संबंधों को जुर्म मानना भारतीय संविधान में दिए गए कई बुनियादी अधिकारों की अवहेलना है। अदालत ने इस फैसले में, संविधान सभा में, जवाहरलाल नेहरु की कही उस बात का भी हवाला दिया था, जो हमारे संविधान की आत्मा कही जाने वाली उसकी प्रस्तावना की नींव है। इसके मुताबिक समाज में हर एक व्यक्ति की अपनी एक अहम जगह है, और किसी को सिफऱ् इसलिए अलग थलग नहीं किया जा सकता कि बहुमत की राय में वह 'दूसरों से अलगÓ है। अदालत ने तब यह भी कहा था कि  भेदभाव समानता का दुश्मन है,और हर एक के आत्मसम्मान के लिए समानता का अधिकार की जरूरी है। यही नहीं, अदालत ने यह भी माना था कि  चिकित्सा, और मनोविज्ञान के विशेषज्ञ समलैंगिकता को बीमारी, या मानसिक असंतुलन नहीं, बल्कि यौन-व्यवहार का एक प्रकार मानते हैं।
समलैंगिकता को दुनिया भर में कानूनी मान्यता देने का दौर चल रहा है। ऐसे समय में, जब भारत में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत से मामलों में अपने दायरे से चार कदम आगे बढ़कर दखल दिया है, एक ऐसे काम में उसका एक जरूरी जिम्मेदारी से पीछे हटना, जिसे वह अपने दायरे में रहकर कर सकता था,बहुत ही निराश करने वाला है। उसके बुरे नतीजे हम देख रहे हैं।
समलैंगिकता,और इससे जुड़े कुछ दूसरे सेक्स-पहलुओं पर बना यह कानून,अपने ही देश में न सिर्फ समलैंगिक, बल्कि आम पति-पत्नी किस तरह सेक्स न करें, यह हुक्म देने वाला एक अंग्रेज-ईसाई कानून है। यह न केवल समलैंगिकों के लिए एक काला कानून है, बल्कि इसमें पति-पत्नी के बीच भी बहुत सी बातों को जुर्म ठहराया गया है, और इसके लिए उनको सजा दी जा सकती है। यह एक बहुत ही घटिया सोच है, और धर्म जैसी घटिया संस्था ही अपने सदस्यों पर ऐसे कानून लाद सकती है। और धर्म के तहत काम करने वाले अंग्रेज राजा ही अपने गुलामों पर ऐसे कानून लादते थे। समता को संविधान में बुनियादी हक के रूप में अपने नागरिकों को देने वाले भारत के प्रजातंत्र में, इस तरह  कानून के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी सीमा में रहते हुए एक सुधारवादी, और अच्छा फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने देश की जनता के बुनियादी हकों के खिलाफ फैसला देते हुए नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वालों को तो सदमा दिया ही, अब मुंबई  से आ रही खबरें पढ़कर पता चल रहा है कि इससे अपराधी मानसिकता वालों को एक नई शह मिली है। पहले से ही समाज में अलगाव और तिरस्कार झेल रहे समलैंगिकों की मुसीबतें बढ़ गई हैं।
आज जब पूरी दुनिया में लोगों की निजी जिंदगी की आज़ादी को बढ़ावा दिया जा रहा है, ऐसे में हिन्दुस्तान में एक अजीब स्थिति यह पैदा हो गई है कि अपने अपने धर्म को दूसरे के धर्म से बढ़कर मानने वाले, किसी भी बात पर एक दूसरे से सहमत नहीं होने वाले तकरीबन तमाम धर्मों के नेता, चर्च के लादे  इस कानून के हिमायती होकर, देश के नागरिकों से, संविधान में मिले उनके अधिकार छीन लेना चाहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसला आने पर हमने यह कहा था कि यह मामला महज समलैंगिकता का नहीं है, यह निजी आजादी का मामला है। आज अगर एक ऐसा दकियानूसी कानून जायज करार दिया जा रहा है, जिसे खुद चर्च भी कब का खारिज कर चुका है, तो फिर देश की ऐसी अदालतें, और ऐसे जज, ऐसे और भी बहुत से कट्टरतावादी, पाखंडी, और स्वतंत्रता-विरोधी फैसले ला सकते हैं। इस फैसले से समलैंगिकता पर रोक नहीं लग रही है, लेकिन निहत्थे, बेकुसूर समलैंगिक लूट, हिंसा, और ब्लैकमेल का शिकार हो कर एक नए डर में धकेल दिए गए है। आज  सुप्रीम कोर्ट को यह समझने की जरूरत है,कि वह इस मामले पर  एक अधिक बड़ी बेंच बैठा कर, पिछले साल दो जजों की बेंच  द्वारा दिए गए इस फैसले मे की गई गलती सुधारने की पहल करे। इसके लिए ऐसे जजों की नियुक्ति करे, जो लोगों की निजी आजादी की अहमियत समझते हों। सुप्रीम कोर्ट मानवता और बुनियादी अधिकारों के हक में जितनी आसानी से यह मामला सुलझा सकेगा, मत बैंकों के दबाव में राजनीति करने को मजबूर राजनीतिक दलों का पाखंड संसद में उतनी आसनी से उन्हें ऐसा करने की इजाज़त नहीं देगा। इसलिए हम चाहते हंै कि समाज में नाइंसाफी झेलते इस तबके की तरफ, सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी समझे, और संविधान, समाज, विज्ञान, और मनोविज्ञान, सबके लिहाज से एक गलत फैसला देने के इल्जाम से उबर जाए। मुंबई से आई खबर दीवार पर लिखी एक इबारत की तरह जितनी जल्दी पढऩे में, और हालात सुधारने  में काम आए, देश के लिए उतना ही बेहतर होगा।

एम्बुलेंस, और नक्सल हमले पर कड़वे फैसले की जरूरत

13 अप्रैल 2014
संपादकीय
बस्तर में कल फिर नक्सल हमला हुआ, और मतदान की ड्यूटी में लगे हुए लोगों में से दर्जन भर लोग शहीद हो गए। इनमें से आधे मतदान कर्मचारी, और बाकी आधे ऐसे सुरक्षा कर्मचारी थे जो कि सड़कों की जांच-पड़ताल करके रास्ते के खतरे के बीच लौट रहे थे, और उन्होंने वहां से गुजरती हुए एक एम्बुलेंस में लिफ्ट ले ली थी। नक्सलियों ने इस एम्बुलेंस पर भी हमला किया, और इससे यह बात जाहिर है कि उनकी नजर इसके भीतर के सुरक्षा कर्मचारियों पर भी बनी हुई थी। यहां पर हम दो-तीन बातों पर लिखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि इन पहलुओं पर हम लगातार लिखते आए हैं। नक्सलियों को हिंसा न करने की कोई ताजा नसीहत देने का कोई नया इस्तेमाल अभी नहीं दिखता है, इसलिए हम हमेशा से लिखी आ रही अपनी बातों पर कायम हैं। दूसरी बात यह कि ऐसी शहादत को देखते हुए प्रदेश और देश के बाकी हिस्सों में बचा हुआ मतदान अधिक से अधिक होना चाहिए, क्योंकि जिस देश में लोग दूसरों के वोट डालने के इंतजाम में अपनी जान दे रहे हैं, वहां भी अगर बाकी वोटर अपने इस हक की अहमियत न समझें, तो यह उनके लिए डूब मरने की बात होगी। तीसरी बात जो हम आज यहां लिखना नहीं चाहते, वह यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार के खुफिया विभाग, और मैदानी पुलिस के बीच तालमेल की कोई कमी है, या नहीं, इस पर भी इस जगह लिखने को हमारे पास कोई ताजा विचार नहीं हैं। 
अब बस्तर की कल की इस घटना के साथ एक बहुत ही बुरी यह जानकारी भी जुड़ी हुई है कि दो बरस पहले इसी दिन इसी बस्तर में इन्हीं नक्सलियों ने बीमार बच्चों को अस्पताल ले जा रही एक और एम्बुलेंस पर हमला किया था। अब कल उन्होंने जिस एम्बुलेंस पर हमला किया, वह सुरक्षा कर्मचारियों से भरी हुई थी, और उसे विस्फोट से उड़ाने के पीछे नक्सलियों का एक अलग तर्क हो सकता है। लेकिन यहां दो बातों को सोचने की जरूरत है। एक तो यह कि बस्तर जैसी भयानक नौबत के बीच, जान के खतरे के बीच भी अगर सुरक्षा कर्मचारी एम्बुलेंस का इस्तेमाल करते हैं, तो फिर वे बस्तर की बाकी एम्बुलेंस भी खतरे में डालते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के बीच भी ये नियम कायम रहते हैं कि एम्बुलेंस पर हमले न किए जाएं, लेकिन इसके साथ-साथ ये शर्त भी जुड़ी रहती है कि एम्बुलेंस का फौजी या पुलिसिया इस्तेमाल न हो। इस बात को हम अच्छी तरह समझते हैं कि जब बस्तर जैसे खतरनाक मोर्चे पर सुरक्षा कर्मचारी कदम-कदम पर जान जोखिम में डालकर रास्ता तय करते हैं, तो एम्बुलेंस के इस्तेमाल न करने की बात शहरी, कागजी, और दफ्तरी बात होकर रह जाती है। सबसे बड़ी बात जब अपनी जिंदगी को बचाना रहता है, तो फिर किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के बारे में सोचना मुमकिन नहीं रहता। लेकिन ऐसी आत्मरक्षा के साथ जुड़े हुए खतरों के बारे में भी सोचना होगा जब बाकी एम्बुलेंस भी निशाने पर आ सकती हैं। 
छत्तीसगढ़ में ही पिछले विधानसभा चुनाव को लेकर अभी बिना किसी सुबूत वाली ऐसी बात सुनने मिली है कि पूरे प्रदेश में चलने वाली 108 नंबर की एम्बुलेंस में चुनावी शराब ढोई गई थी। इसी तरह लोगों को याद होगा कि पाकिस्तान में जब ओसामा-बिन-लादेन की शिनाख्त तय करने के लिए अमरीकी खुफिया एजेंटों ने पाकिस्तानी टीकाकरण कार्यक्रम के कर्मचारियों का इस्तेमाल किया था, तो भी हमने उस चर्चा के संदर्भ में कई बार लिखा था कि वह काम चूंकि एक सरकार सोचा-समझा काम था, इसलिए टीकाकरण जैसे कार्यक्रम की विश्वसनीयता खत्म करने वाला यह फैसला युद्ध अपराध माना जाना चाहिए, और उसके लिए अमरीका के खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए। छत्तीसगढ़ में एम्बुलेंस के कल के इस वर्दीधारी-हथियारबंद जवानों द्वारा इस्तेमाल के पीछे सरकार की कोई मंजूरी नहीं थी, और यह नक्सल इलाकों में पैदल चलकर थके हुए लोगों द्वारा मौके पर लिया एक तात्कालिक और स्थानीय फैसला था, और उसके लिए जिम्मेदार लोग अपनी जान खो ही चुके हैं। इसलिए अब राज्य सरकार को और केन्द्र सरकार की सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे कड़े फैसले लेने पड़ेंगे कि एम्बुलेंस का किसी तरह का हथियारबंद, या गैरमरीज इस्तेमाल न हो। यह बात सुझाते हुए हमको अच्छा नहीं लग रहा है, और यह बात सुनने वालों को भी यह सलाह बहुत बेरहमी की लगेगी, लेकिन हकीकत यह है कि आने वाले वक्त में बाकी एम्बुलेंस बची रहें, इसके लिए सरकार को यह कड़वा फैसला लेना ही पड़ेगा। यह बात याद रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध को लेकर जो नियम सभी देशों ने माने हैं, वे नियम देशों की सरकार तो मानती हैं, लेकिन आतंकवादी, उग्रवादी और हिंसक-हथियारबंद गिरोह इन नियमों की बंदिशों की इज्जत नहीं करते, इसलिए उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
बस्तर के इस खूनी हमले के बाकी पहलुओं पर हम पहले भी लिख चुके हैं, और आगे भी लिखते रहेंगे। उन बातों पर आज यहां चर्चा से एम्बुलेंस का मुद्दा वजन खो बैठता, इसलिए हम सिर्फ उसी पर बात खत्म कर रहे हैं। वोट डलवाने के लिए ऐसी शहादत के बाद अगर जिंदा बचे बाकी लोग वोट नहीं डालते हैं, तो वे मुर्दों से भी गए-गुजरे होंगे।

मोदी की बीवी के मुद्दे पर अब लिखना ही पड़ रहा है

12 अप्रैल 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी की बीवी की फिक्र में आज कांग्रेस पार्टी इस कदर डूबी हुई है, कि अपने खुद के डूबने का खतरा उसे इसके मुकाबले कम अहमियत का लग रहा है। किसी बेनीप्रसाद वर्मा ने नहीं, खुद राहुल गांधी ने कल एक चुनावी सभा में मोदी की बीवी को लेकर यह फिक्र जाहिर की, कि वे चुनाव घोषणापत्र में पत्नी का जिक्र क्यों नहीं करते थे, और अब उन्होंने जिक्र क्यों किया है? दूसरी तरफ कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे सोनिया गांधी के निजी सिपहसालार लगातार मोदी की बीवी के मामले को कुरेदते रहते थे, और पिछले बरसों में उनके मुंह से किसी महिला के लिए सबसे अधिक फिक्र सुनाई पड़ी, तो वह मोदी की बीवी जशोदा बेन ही थीं। 
इस चर्चा में कोई हर्ज इसलिए नहीं है कि जो सार्वजनिक जीवन में आते हैं, उनको चुनाव आयोग के नियमों से परे, जनता के मन में उठते सवालों के कॉलम में भी जवाब भरने पड़ते हैं, और नरेन्द्र मोदी ने पिछले चुनावों में जीवन-साथी का कॉलम खाली छोड़ा था, इस बार उन्होंने उसे भरा है, और पिछले चुनाव से इस चुनाव के बीच जशोदा बेन ने कुछ इंटरव्यू देकर यह धुंध साफ भी की थी कि नरेन्द्र मोदी से उनके शादी के कैसे संबंध थे, और उसके बाद से वे किस तरह अलग रहती हैं, मोदी से उनका कोई नाता नहीं बचा है, वे एक स्कूल में पढ़ाती हैं, और मोदी के प्रधानमंत्री बनने की कामना में उन्होंने बहुत सी मनौतियां मानी हुई हैं। वे एक मध्यम वर्ग की जिंदगी जी रही हैं, और पति के जीवन से अलग रहते हुए भी वे लगातार पति की शुभकामना करती हैं। 
नरेन्द्र मोदी और उनकी बीवी के मामले को आंकते हुए इन तमाम बातों पर गौर करना जरूरी है। चूंकि कांग्रेस के सबसे बड़े उम्मीदवार राहुल गांधी ने खुद होकर मोदी के इस निजी जीवन पर सार्वजनिक सवाल आमसभा में उठाए हैं, इसलिए मोदी की निजी जिंदगी का यह पहलू अब न सिर्फ सार्वजनिक जवाबदेही का हो गया है, बल्कि ऐसी ही जवाबदेही अब सार्वजनिक राजनीति के बाकी लोगों की भी बन गई है, खासकर उन लोगों की, जो लोग इन सवालों को उठा रहे हैं। कांग्रेस जब मोदी की बीवी की फिक्र कर रही है, और बार-बार यह कह रही है कि जो अपनी बीवी का ख्याल नहीं रख सका, वह देश की बाकी महिलाओं का, और बाकी देश का ख्याल कैसे रखेगा। इसके साथ-साथ कांग्रेस एक और बात को जोड़ रही है कि नरेन्द्र मोदी के राज में गुजरात में एक महिला का जिस तरह से टेलीफोन-टैपिंग और खुफिया पुलिस का इस्तेमाल करके पीछा किया गया, उससे यह सवाल उठता है कि मोदी अपनी बीवी को तो बरसों से अलग रख रहे हैं, या उससे अलग रह रहे हैं, और एक दूसरी महिला के पीछे पड़े हैं। मोदी की निजी जिंदगी और उसमें बीवी या दूसरी महिला का कोई इतना ही जिक्र बाजार में है। इसलिए हम इससे परे जाकर और किसी अटकलबाजी को जायज नहीं समझते। 
नरेन्द्र मोदी पर लगी इस सिलसिले की सबसे बुरी तोहमत यही है कि उन्होंने अपनी गृहमंत्री का इस्तेमाल करके एक महिला की निजी जिंदगी के पल-पल पर निगरानी रखवाई। अब इस मामले में कानूनी हालत यह है कि पहली नजर में यह काम गैरकानूनी दिखता है, लेकिन महीनों की मशक्कत के बावजूद केन्द्र की यूपीए सरकार देश में एक भी रिटायर्ड जज को इस बात के लिए तैयार नहीं कर पाई कि वह मोदी के खिलाफ इस जासूसी कांड की जांच के लिए बने आयोग का जिम्मा सम्हाले। केन्द्र सरकार ऐसे आयोग कम ही बनाती है, लेकिन ऐसा आयोग बना, केन्द्रीय मंत्रिमंडल के फैसले से बना, और उसकी जांच को कोई नहीं मिला। इसलिए जो कुछ खबरों में पहले आ चुका है, उसमें एक ही बात और जुड़ी है कि इस खुफिया निगरानी की शिकार महिला, और उसके पिता, दोनों ने इसे लेकर मोदी के खिलाफ कोई आरोप लगाने से इंकार कर दिया है, और उन्हें एक क्लीन चिट दी है। दूसरी तरफ मोदी की बीवी जशोदा बेन का मामला है जिन्होंने मोदी से कोई भी शिकायत न रखते हुए बार-बार उनके लिए मनौती, व्रत, और तीर्थयात्रा करने की बात कही है, और अगर कोई बीवी अपने आदमी के लिए प्रधानमंत्री बनने तक नंगे पैर रहने की बात करती है, उस पर अमल करती है, तो हमारे पास यह सोचने की कोई वजह नहीं है कि उस बीवी को मोदी से कोई शिकायत है, या प्रधानमंत्री बनने के बाद कोई उम्मीद है। 
अब सवाल पूछने वाली, तोहमत लगाने वाली कांग्रेस पार्टी अपने आपको इन सवालों के साथ, अपनी खुद की जिंदगी को लेकर जवाबों की जवाबदेही ढो लेती हैं। और अगर कांग्रेस के नेताओं के चाल-चलन की बात की जाए, तो मोदी की निजी जिंदगी के चाल-चलन के मुकाबले कांग्रेस नेताओं के कुकर्म भयानक है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी की बीवी उनकी मंगलकामना करते हुए नंगे पैर जी रही हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के दिग्गज नेता ऐसे भी हैं जिनकी औलाद अदालतों में डीएनए जांच से खून का रिश्ता साबित करती है, और ऐसे नेताओं के सेक्स वीडियो इंटरनेट पर लोगों को हक्का-बक्का कर देते हैं, दवा कंपनियां बुढ़ापे में ताकत बढ़ाने के लिए अपनी दवाओं की मॉडलिंग उनसे करवाने की सोचने लगती हैं। आज कांग्रेस के जो फूहड़ और बेसमझ नेता मोदी की घरेलू जिंदगी के इस बहुत मामूली पहलू को एक चुनावी मुद्दा बना रहे हैं, उनकी हरकत का जवाब देने के लिए हम कांग्रेस के गुजर चुके बड़े नेताओं की मिसालों का इस्तेमाल करना नहीं चाहते, क्योंकि उन लोगों ने शायद अपनी निजी जिंदगी भी दिल खोलकर जी थी, और दूसरों की निजी जिंदगी को चुनावी माइक्रोफोन से इस तरह उछाला भी नहीं था। इसलिए कांग्रेस के आज के कमसमझ नेताओं की बातों का इस्तेमाल हम उन्हीं के गुजर चुके बड़े और भले नेताओं के खिलाफ नहीं होने देना चाहते। 
नरेन्द्र मोदी महिला की जासूसी में जांच और अदालत के लिए खुले हुए हैं। लेकिन उनके और उनकी बीवी के बीच कैसे रिश्ते हैं, इसे लेकर इन दोनों के अलावा किसी तीसरे को तब तक बकवास का हक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि इन दोनों में से कोई एक, या दोनों ही, कानून या समाज के सामने कोई शिकायत लेकर न जाएं। राजनीति को इतना घटिया बनाना नाजायज है कि जिससे बिना शिकायत की निजी जिंदगी को कुरेदने वाले बेवकूफ मोदी के सार्वजनिक जिंदगी के लहूलुहान ताजा इतिहास की तरफ से भी लोगों का ध्यान बंटाए। हमारा ख्याल है कि मोदी की जाती जिंदगी को लेकर ऐसे हमले से कांग्रेस न सिर्फ मोदी की सबसे बड़ी गलतियों, और गलत कामों को रियायत दे रही है, बल्कि हिन्दुस्तान के ताजा इतिहास कीकई तरह की प्रेम और सेक्स कहानियों को एक बार फिर खबरों में ला रही है। राजनीति में अगर कोई जनता को इतना बेवकूफ बना रहा है कि बीवी से अलग रहने वाला, देश का ख्याल कैसे रख सकेगा, तो जनता इतनी बेवकूफ नहीं है, और शायद चुनावी नतीजे जनता को समझदार साबित भी करेंगे। 
नरेन्द्र मोदी जैसे घिरे हुए नेता को चुनाव घोषणापत्र में लिखे गए एक नाम को लेकर अगर अब तक चले आ रहे बदनाम से दूर खिसक जाने का मौका कांग्रेस दे रही है, तो फिर कांग्रेस आत्ममंथन के लिए लंबे बनवास की हकदार रखती है। 

आज लोहिया शर्म से डूबकर एक बार फिर मर गए होंगे...

11 अप्रैल 2014
संपादकीय

समाजवाद की खाल ओढ़कर परिवारवाद चलाते हुए मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार पर कहा है कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, इस पर फांसी की सजा नहीं देनी चाहिए, और सपा की सरकार आएगी तो कानून बदल दिया जाएगा। दूसरी तरफ उनकी पार्टी के महाराष्ट्र के अध्यक्ष अबू आजमी ने बयान दिया है कि बलात्कार करने वाले, और बलात्कार की शिकार लड़की, दोनों को फांसी देनी चाहिए। 
अगर चुनाव आयोग के तहत राजनीतिक दलों का दर्जा पाने के लिए कोई लोकतांत्रिक शर्तें हो सकती हैं, और चुनाव लडऩे के हक का इस्तेमाल करने के साथ कोई प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, तो समाजवादी पार्टी पर इस लोकतंत्र में आज एक कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन लचीला भारतीय लोकतंत्र बकवास को खुली छूट देता है, और इस हद तक देता है कि इस लोकतंत्र को कुचल दिया जाए, कमजोर तबकों के हक छीन लिए जाएं। यह नौबत बहुत ही खराब है, और आज जब इस देश में बलात्कार एक बड़ा मुद्दा है, बहुत ही शर्मनाक और खतरनाक मुद्दा है, तब भारतीय लड़कियों और महिलाओं के साथ होती हुई इस ज्यादती, बेइंसाफी को लेकर इस कदर गंदी जुबान बोलना, और खतरनाक राजनीतिक वायदे करना, इस देश को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि मुलायम सिंह यादव जैसे लोग जैसे फर्जी समाजवाद और जैसी फर्जी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करते हैं, उसे पूरी तरह खारिज करना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता तो धर्म के बाद आया हुआ एक मुद्दा है। लेकिन औरत और मर्द के बनने के साथ ही औरत के साथ जो गैरबराबरी और नाइंसाफी शुरू हुई है, उसे पहले खत्म करना चाहिए। यह नहीं हो सकता कि जो लोग महिलाओं के साथ गैरबराबरी की बात करें, वे धर्मों के साथ बराबरी की बात कर सकेंगे। सोच में इंसाफ, कतरे-कतरे में नहीं आ सकता, उसके लिए सोच या तो पूरी तरह इंसाफपसंद हो सकती है, या फिर वह नाइंसाफ ही रहेगी। 
आज समाजवादी पार्टी के साथ कहीं वामपंथी जुड़े रहते हैं, तो कहीं कांग्रेस पार्टी। आज यह मौका है कि लोगों को, मीडिया को, और जनसंगठनों को मुलायम और उनकी पार्टी से उसी तल्ख जुबान में सवाल करने चाहिए जिस जुबान में भाजपा और मोदी से गुजरात दंगों को लेकर सवाल किए जाते हैं, कांग्रेस से 1984 के दंगों को लेकर सवाल किए जाते हैं, और यूपीए से उसके अभूतपूर्व-ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को लेकर सवाल किए जाते हैं। मुलायम सिंह की पार्टी के नेता पहले भी महिलाओं को लेकर, उन पर होने वाले मर्दाना जुर्मों को लेकर गंदी जुबान में बात करते आए हैं, और उनकी पार्टी के नेता और तो कोई हैं नहीं, उन्हीं के घर के ही हैं, उन्हीं के कुनबे के ही हैं। इसलिए इस पार्टी के नाम पर एक कुनबे की जो हिंसक और घटिया सोच है, उसके बारे में इस पार्टी के साथी दलों को सोचना चाहिए। 
आज हो सकता है कि देश और महाराष्ट्र प्रदेश, इन दोनों में कांग्रेस पार्टी के बनाए हुए महिला आयोग इन बातों का नोटिस न लें, क्योंकि ये आयोग उन्हें बनाने वाले सत्तारूढ़ दल के ही एक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। लेकिन अदालत को ऐसे लोगों को नोटिस देना चाहिए, और ऐसी पार्टियों के चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए, ऐसे लोगों के चुनाव लडऩे पर कड़ाई से कानूनी रोक लगनी चाहिए। इस देश की संसद और प्रदेशों की विधानसभाओं को ऐसी गंदगी की जरूरत नहीं है। 
आज ऊपर बैठे हुए राम मनोहर लोहिया शर्म से डूबकर एक बार फिर मर गए होंगे। 

Bat ke bat, बात की बात

10 april 2014

बस्तर से सबक लें...

10 अप्रैल 2014
संपादकीय

नक्सल हिंसा, धमकी, और धमाकों के बीच आज जिस तरह बस्तर में वोट डल रहे हैं, उसे देखकर छत्तीसगढ़ के बाकी इलाकों, और देश के दूसरे प्रदेशों को भी सोचना चाहिए। खासकर उन शहरी, संपन्न, और शिक्षित तबकों को देखना चाहिए कि लोकतंत्र के इस जलसे में जान का खतरा उठाकर किस तरह गैरशहरी, गैरसंपन्न, और गैरशिक्षित तबके वोट डालते हैं, और शहरी लोग घर बैठे टीवी पर चुनाव देखते हैं या पिकनिक पर निकल जाते हैं। 
हम अपनी ही पुरानी बातों को दुहराने का खतरा उठाते हुए एक बार फिर मतदान शुरू होने के बाद, बाकी सीटों को ध्यान में रखते हुए इस बात को यहां लिख रहे हैं कि हर किसी को न सिर्फ खुद वोट डालने जाना चाहिए, बल्कि आसपास के लोगों को भी लेकर जाना चाहिए। अभी पिछले हफ्ते ही अफगानिस्तान की एक खबर आई थी कि किस तरह वहां बच्चे चुनाव का खेल खेलते हुए कतार लगाकर खड़े हैं, और कोई बच्चा बाकी लोगों की उंगलियों पर स्याही का निशान लगा रहा है। जिस अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के चलते लोकतंत्र का बुरा हाल है, सरकार का ठिकाना नहीं है, वहां पर बच्चे खेल-खेल में मतदान कर रहे हैं। उसे देखकर लगता है कि भारत में भी बच्चों को अगर इस तरह खेल में लगाया जाए, कुछ ऐसा किया जाए कि बच्चे भी मां-बाप के साथ मतदान केन्द्र में जाएं, तो एक अलग किस्म की जागरूकता उनके भीतर वोटर बनने के पहले भी खड़ी हो सकेगी। यह तो एक लंबी बात है, लेकिन आज जिन लोगों को वोट डालने का हक है, उनको अपनी लापरवाही और गैरजिम्मेदारी छोड़कर आने वाले दिनों में वोट डालने जाना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटों का फासला पौन फीसदी था। एक फीसदी से भी कम के इस फासले को पाटने का काम मतदाताओं के पांच-दस फीसदी अधिक सक्रिय हो जाने से हो सकता है। उससे देश और प्रदेश को अलग सरकार मिल सकती है, और पार्टियों और नेताओं के होश उड़ सकते हैं। अफगानिस्तान से लेकर बस्तर तक खतरों में जीते हुए लोग शहरी हिन्दुस्तान के सामने एक मिसाल पेश कर रहे हैं, और उससे सबक लेना चाहिए। 

एक महत्वहीन थप्पड़

9 अप्रैल 2014
संपादकीय
अरविंद केजरीवाल पर कल दिल्ली में हुए एक थप्पड़-हमले को लेकर बहुत कुछ कहा और लिखा जा रहा है, और भूखे-प्यासे समाचार चैनलों को मानो भरी हुई थाली मिल गई हो, वे टूट पड़े हैं। लेकिन ऐसी किसी घटना को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में देखने की जरूरत रहती है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी ने किसी नेता को थप्पड़ मारा हो। कुछ ही महीने हुए हैं जब शरद पवार पर किसी ने हाथ उठाया था, सुब्रत राय सहारा पर स्याही फेंकी थी, योगेन्द्र यादव के मुंह पर स्याही पोती थी, चिदम्बरम पर जूता फेंका था। और यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि दिल्ली में कुछ महीने पहले जब विधानसभा चुनाव हुआ तो इसी जूता फेंकने वाले को आम आदमी पार्टी ने अपना टिकट दिया था। अब अगर कांग्रेस पार्टी विमान अपहरण करने वाले को अपना उम्मीदवार बनाती है, समाजवादी पार्टी दर्जनों हत्याओं की जिम्मेदार कही जाने वाली फूलन को अपना उम्मीदवार बनाती है, तो जनता के मन की नाराजगी भी किसी तरह सामने आ सकती है। ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी के लोगों को कुछ नाराजगी झेलनी पड़ रही है तो उसके पीछे की स्थितियों को देखने की जरूरत भी है। 
दरअसल अन्ना हजारे के साथ शुरू करके अरविंद केजरीवाल ने एक गैरराजनीतिक आंदोलन को जिस रफ्तार से राजनीतिक बनाया, राजनीतिक दल बनाया, चुनाव लड़ा, सरकार बनाई, और सरकार भंग कर दी, इतनी रफ्तार से अब तक लोगों ने सिर्फ सीडी को फास्ट फारवर्ड करते देखा था, और राजनीति में ऐसी रफ्तार किसी ने नहीं देखी थी। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल दो साल की अपनी राजनीति में जितनी बार, जितने किस्म के यू-टर्न लिए हैं, उससे भी लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। ऐसे में केजरीवाल को लोगों ने हाथों-हाथ ऊपर ले जाकर आसमान पर बिठाया था, और अब निराश होकर वे ही हाथ उनके गालों पर पड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति में केजरीवाल एक धूमकेतु की तरह आए हैं, और वे कितनी लंबी राजनीतिक जिंदगी जीते हैं, इसका अभी अंदाज लगाना मुश्किल है। लेकिन वे जनभावनाओं को जिस तरह ऊपर और नीचे ले जाने का काम कर रहे हैं, उसके चलते कभी-कभी लोगों के मन में, कभी खुशी-कभी गम, किस्म की भावनाएं आती ही रहेंगी।
आज जब हिन्दुस्तान में एक नई सरकार को चुनने का सिलसिला शुरू हो गया है, तब ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं की अहमियत तब तक नहीं है, जब तक ये किसी के लिए खतरा न बन जाएं। आज मुद्दे कुछ अलग हैं, और अलग होना भी चाहिए। आज हिन्दुस्तान की राजनीति में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा, और भाजपा की अगुवाई में एनडीए के दो दर्जन दल जिस तरह सत्ता की तरफ बढ़ रहे हैं, उसको देखते हुए धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली पार्टियां फिक्र तो जाहिर कर रही हैं, लेकिन मोदी को रोकने की सोच इनमें नहीं है। चुनाव मतदाताओं के सामने नेता, पार्टी, और गठबंधन को पेश करने का मौका रहता है, इसमें आज एनडीए कामयाब है, और कांग्रेस, यूपीए, या तीसरा, चौथा, और पांचवां मोर्चा बिखरे हुए हैं। किसी प्रदेश में तीन, किसी में चार कोनों वाले मुकाबले हो रहे हैं, और ऐसे में सबसे कम बिखराव, सबसे कम टकराव अगर किसी में है, तो वह एनडीए में है। ऐसे में केजरीवाल बाकी भाजपाविरोधी और एनडीएविरोधी मोर्चों में एक और बिखराव खड़ा कर चुके हैं। सोनिया गांधी की यह अपील कि धर्मनिरपेक्ष वोट न बंटें, किसी संभावना वाली अपील नहीं लगती है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता की दावेदार पार्टियां मोदी विरोध के नाम पर भी एक नहीं है। ऐसे में केजरीवाल को लगी थप्पड़ मुद्दा नहीं होना चाहिए, बल्कि देश की अगली सरकार बनने की संभावना, या आशंका, मुद्दा होना चाहिए। लेकिन यह फिक्र मानो हाशिए पर धकेल दी गई है।  
जूता फेंकने वालों को टिकट देने वालों को थप्पड़ पडऩे में हैरानी क्यों होनी चाहिए?