25 अपै्रल 2014
संपादकीय
पाकिस्तान में इन दिनों सरकार और अखबार के बीच की लड़ाई खतरनाक मोड़ ले चुकी है। एक बड़े मीडिया समूह के एक बड़े टीवी पत्रकार पर पिछले दिनों जानलेवा हमला हुआ और गोलियों से छिदे हुए पत्रकार की जान अभी तक अस्पताल में डांवाडोल है। इस हमले के पहले से इस पत्रकार ने पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर आरोप लगाए थे कि वह उन पर हमला कर सकती हैं। ऐसे आरोपों से फिलहाल इस मीडिया समूह ने अपने-आपको अलग रखा है, लेकिन पाकिस्तान में जागरूक तबका लगातार इस हमले को लेकर आईएसआई, सेना, और सरकार पर आरोप लगा रहा है। इसके साथ ही हर कुछ हफ्तों में पाकिस्तान से ऐसी खबरें आती हैं कि वहां तालिबानी या दूसरे आतंकियों ने किसी छोटी जगह पर किसी दूसरे अखबारनवीस को मार डाला है।
पाकिस्तान में लोकतंत्र की बदहाली है, और इसे लेकर हमको अधिक फिक्र इसलिए भी होती है कि जब तक वहां लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, निर्वाचित सरकार की पकड़ देश के मामलों में नहीं होती, तब तक पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ टकराव का खतरा भी बने रहेगा, और ऐसे कमजोर पाकिस्तान पर कभी अमरीका, तो कभी चीन जैसी बड़ी ताकतों की पकड़ भी बनी रहेगी। फिर भारत के साथ पाकिस्तान के टकराव वाले बहुत जाहिर मुद्दे को पल भर के लिए अलग भी रखें, तो भी खुद पाकिस्तान के भीतर के हालात बहुत फिक्र के हैं। वहां पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसी कुर्सियों पर रहे हुए लोगों के साथ वहां की सबसे बड़ी अदालत का टकराव चल ही रहा है, दूसरी तरफ वहां के फौजी तानाशाह जनरल मुशर्रफ अदालत मुकदमे झेल रहे हैं, हिंदुस्तान की तरह वहां भी एक प्रधानमंत्री की हत्या हो चुकी है। इनसे परे हिंदुस्तान से अलग, और बहुत बड़ा खतरा यह भी है कि पाकिस्तानी फौज का वहां की चुनी हुई हुकूमत में खासा दखल रहता है, और इस फौज की खुफिया एजेंसी का पाकिस्तान की जिंदगी में भी दखल रहता है, और आरोप लगते रहते हैं कि भारत के साथ टकराव खड़ा करने में भी आईएसआई वहां की सरकार से परे अपनी हरकतें करती रहती है।
ऐसे पाकिस्तान में जब मीडिया काम करता है, मानवाधिकार संगठन और लेखक-कलाकार काम करते हैं, तो वे भारत के इन्हीं तबकों के मुकाबले अधिक खतरे उठाकर काम करते हैं। हिंदुस्तान में मीडिया पर सरकार या फौज की तरफ से किसी तरह का हिंसक हमला नहीं होता, और आतंकी भी आमतौर पर मीडिया को नहीं छूते। लोकतंत्र के अधिक मजबूत होने का यह फायदा हिंदुस्तानी मीडिया को रहता है, लेकिन बगल का पाकिस्तानी मीडिया अधिक खतरों के बीच, अधिक संघर्ष करते हुए काम कर रहा है। वहां तालिबानों का देश के खासे हिस्से पर जिस तरह का कब्जा है, या जो हिस्से उनकी मार की सीमा में हैं, वहां पर काम करने वाले लोग अधिक तारीफ के हकदार हैं। आज जब हम इस बात को यहां लिख रहे हैं, तो हिंदुस्तान में भाजपा की अगुवाई में अगली राष्ट्रीय सरकार बनने की संभावना बहुत से लोग देख रहे हैं। भाजपा और उसके साथियों के बीच कुछ लोग ऐसी उम्मीद भी रख रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान को निपटा देंगे। भाजपा के एक दूसरे प्रधानमंत्री बरसों तक हिंदुस्तान चला चुके हैं, और उस वक्त भी उनकी नीतियां देश की विदेश नीति के मुताबिक थीं, न कि हिंदुत्ववादी। इसलिए यह मानने का अभी कोई कारण नहीं है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो पाकिस्तान के साथ अनिवार्य रूप से कोई टकराव खड़ा होगा ही। यह बात तो आने वाले महीनों में सामने आएगी, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के भीतर आज फिक्र का जो माहौल है, लोकतंत्र पर वहां जो खतरा है, उससे उबरने में भारत को भी मदद करनी चाहिए। अड़ोस-पड़ोस में मजबूत लोकतंत्र रहे, तो सरहद पर जितनी कटौती हो सकती है, उससे दोनों देशों में गरीबी और कुपोषण के शिकार लोगों की जिंदगी बदल सकती है। इन दोनों देशों में जो भी सरकारें रहें, उनको ऐसे माहौल को बढ़ावा देना चाहिए। और ऐसे मौके का इस्तेमाल करने के लिए आज पाकिस्तान को अपने घर को सुधारने की जरूरत है, ताकि भारत के साथ वह मजबूती से बातचीत कर सके।









