पाकिस्तान के घरेलू खतरे, और भारत के साथ रिश्ते

25 अपै्रल 2014
संपादकीय
पाकिस्तान में इन दिनों सरकार और अखबार के बीच की लड़ाई खतरनाक मोड़ ले चुकी है। एक बड़े मीडिया समूह के एक बड़े टीवी पत्रकार पर पिछले दिनों जानलेवा हमला हुआ और गोलियों से छिदे हुए पत्रकार की जान अभी तक अस्पताल में डांवाडोल है। इस हमले के पहले से इस पत्रकार ने पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर आरोप लगाए थे कि वह उन पर हमला कर सकती हैं। ऐसे आरोपों से फिलहाल इस मीडिया समूह ने अपने-आपको अलग रखा है, लेकिन पाकिस्तान में जागरूक तबका लगातार इस हमले को लेकर आईएसआई, सेना, और सरकार पर आरोप लगा रहा है। इसके साथ ही हर कुछ हफ्तों में पाकिस्तान से ऐसी खबरें आती हैं कि वहां तालिबानी या दूसरे आतंकियों ने किसी छोटी जगह पर किसी दूसरे अखबारनवीस को मार डाला है।
पाकिस्तान में लोकतंत्र की बदहाली है, और इसे लेकर हमको अधिक फिक्र इसलिए भी होती है कि जब तक वहां लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, निर्वाचित सरकार की पकड़ देश के मामलों में नहीं होती, तब तक पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ टकराव का खतरा भी बने रहेगा, और ऐसे कमजोर पाकिस्तान पर कभी अमरीका, तो कभी चीन जैसी बड़ी ताकतों की पकड़ भी बनी रहेगी। फिर भारत के साथ पाकिस्तान के टकराव वाले बहुत जाहिर मुद्दे को पल भर के लिए अलग भी रखें, तो भी खुद पाकिस्तान के भीतर के हालात बहुत फिक्र के हैं। वहां पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसी कुर्सियों पर रहे हुए लोगों के साथ वहां की सबसे बड़ी अदालत का टकराव चल ही रहा है, दूसरी तरफ वहां के फौजी तानाशाह जनरल मुशर्रफ  अदालत मुकदमे झेल रहे हैं, हिंदुस्तान की तरह वहां भी एक प्रधानमंत्री की हत्या हो चुकी है। इनसे परे हिंदुस्तान से अलग, और बहुत बड़ा खतरा यह भी है कि पाकिस्तानी फौज का वहां की चुनी हुई हुकूमत में खासा दखल रहता है, और इस फौज की खुफिया एजेंसी का पाकिस्तान की जिंदगी में भी दखल रहता है, और आरोप लगते रहते हैं कि भारत के साथ टकराव खड़ा करने में भी आईएसआई वहां की सरकार से परे अपनी हरकतें करती रहती है।
ऐसे पाकिस्तान में जब मीडिया काम करता है, मानवाधिकार संगठन और लेखक-कलाकार काम करते हैं, तो वे भारत के इन्हीं तबकों के मुकाबले अधिक खतरे उठाकर काम करते हैं। हिंदुस्तान में मीडिया पर सरकार या फौज की तरफ से किसी तरह का हिंसक हमला नहीं होता, और आतंकी भी आमतौर पर मीडिया को नहीं छूते। लोकतंत्र के अधिक मजबूत होने का यह फायदा हिंदुस्तानी मीडिया को रहता है, लेकिन बगल का पाकिस्तानी मीडिया अधिक खतरों के बीच, अधिक संघर्ष करते हुए काम कर रहा है। वहां तालिबानों का देश के खासे हिस्से पर जिस तरह का कब्जा है, या जो हिस्से उनकी मार की सीमा में हैं, वहां पर काम करने वाले लोग अधिक तारीफ के हकदार हैं। आज जब हम इस बात को यहां लिख रहे हैं, तो हिंदुस्तान में भाजपा की अगुवाई में अगली राष्ट्रीय सरकार बनने की संभावना बहुत से लोग देख रहे हैं। भाजपा और उसके साथियों के बीच कुछ लोग ऐसी उम्मीद भी रख रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान को निपटा देंगे। भाजपा के एक दूसरे प्रधानमंत्री बरसों तक हिंदुस्तान चला चुके हैं, और उस वक्त भी उनकी नीतियां देश की विदेश नीति के मुताबिक थीं, न कि हिंदुत्ववादी। इसलिए यह मानने का अभी कोई कारण नहीं है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो पाकिस्तान के साथ अनिवार्य रूप से कोई टकराव खड़ा होगा ही। यह बात तो आने वाले महीनों में सामने आएगी, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के भीतर आज फिक्र का जो माहौल है, लोकतंत्र पर वहां जो खतरा है, उससे उबरने में भारत को भी मदद करनी चाहिए। अड़ोस-पड़ोस में मजबूत लोकतंत्र रहे, तो सरहद पर जितनी कटौती हो सकती है, उससे दोनों देशों में गरीबी और कुपोषण के शिकार लोगों की जिंदगी बदल सकती है। इन दोनों देशों में जो भी सरकारें रहें, उनको ऐसे माहौल को बढ़ावा देना चाहिए। और ऐसे मौके का इस्तेमाल करने के लिए आज पाकिस्तान को अपने घर को सुधारने की जरूरत है, ताकि भारत के साथ वह मजबूती से बातचीत कर सके।

आने वाले दिन राजनीति और लोकतंत्र के लिए दिलचस्प

24 अपै्रल 2014
संपादकीय

लोकसभा चुनाव का एक बड़ा हिस्सा निपट जाने के बाद अब यह अटकल भी लगने लगी हैं कि अगली सरकार किस गठबंधन की बन सकती है, और उसका नेता कौन हो सकता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानकर चलते दिख रहा है कि नरेन्द्र मोदी अगले प्रधानमंत्री हैं, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि भाजपा की सीटें कम आने पर एनडीए को ऐसे साथियों की जरूरत पड़ सकती है जो कि मोदी के नाम पर तैयार न हों। ऐसे लोगों में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सीटों की कमी पडऩे पर भाजपा के पास मोदी के अलावा किसी दूसरे नाम को सामने रखने में दिक्कत होगी, लेकिन यूपीए की मुखिया कांगे्रस पार्टी मोदी को रोकने के लिए किसी भी तीसरे मोर्चे के किसी भी गैरभाजपाई को बाहर या भीतर से साथ देने पर अधिक आसानी से तैयार हो सकेगी।
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर भाजपा और एनडीए ने इस बार मोदी को अगला मुखिया घोषित करके उन्हीं के नाम पर पूरा दांव लगा दिया, और वोट मांगे। और सच तो यही है कि भाजपा और एनडीए के पास मोदी के मुकाबले न कोई दूसरा नाम था, न कोई दूसरा चेहरा। इसलिए मोदी जिन बातों के लिए भी विख्यात हों, या कुख्यात हों, उन बातों के साथ-साथ वे ही यूपीए के खिलाफ सबसे दमदार उम्मीदवार थे और हैं। लेकिन ऐसे में भी इस बार के लोकसभा चुनाव भाजपा-एनडीए के पक्ष का वोट, या कांगे्रस-यूपीए के विपक्ष का वोट नहीं है। मामला इससे कुछ अधिक जटिल है, और उसकी गुत्थी वोटों की गिनती के बाद ही कुछ हद तक सुलझ पाएगी। यूपीए और एनडीए, इन दोनों गठबंधनों से परे की पार्टियां इतनी अधिक हैं, और उन्होंने कहीं पर त्रिकोणीय, तो कहीं चतुष्कोणीय मुकाबला बनाकर मतदाता के सामने से सिक्का उछालने जैसी सहूलियत हटा दी थी। अब देश के एक बड़े हिस्से में लूडो के पांसे की तरह तीन या चार, और कहीं-कहीं पांच विकल्पों में से किसी एक को छांटने की नौबत है। और हम जिस तरह लिख रहे हैं, उस तरह मतदाता फैसले नहीं करते, और वे बहुत सी बातों को सोचकर, या कई अच्छी बुरी बातों से प्रभावित होकर अपना वोट तय करते हैं। 
लेकिन आज एनडीए के अधिकतर उम्मीदवारों के मुकाबले देखें, तो यूपीए, और बाकी पार्टियों के उम्मीदवार वोटों को आपस में बांटते दिख रहे हैं। हम अगर बिल्कुल लुहारी अंदाज में दो हिस्सों में लोहे के टुकड़े को काटें, तो साम्प्रदायिकता के खिलाफ वोट, बहुत से राज्यों में ऐसी पार्टियों में बंट रहे हैं, जो धर्मनिरपेक्ष होने का दावा तो करती हैं, लेकिन जिनके तेवर, और जिनके चाल-चलन धर्मनिरपेक्षता को जगह-जगह चकमा देते भी दिखते हैं। इसलिए यह चुनाव सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के बीच की पसंद का चुनाव नहीं है। एक तरफ से देखें, तो यह बेईमानी के खिलाफ, और ईमानदारी की उम्मीद के बीच का चुनाव भी लग रहा है। और इस चुनाव के और भी कई पहलू हैं, जिनकी चर्चा हम पिछले दिनों में अलग-अलग मुद्दों पर लिखते हुए करते आए हैं। 
आज यहां चर्चा का एक बचा हुआ पहलू यह है कि भारतीय चुनावी राजनीति में सीधे-सीधे दो पार्टियों के दिन लद जाने के साथ-साथ, अब दो गठबंधनों के दिन भी लद गए दिखते हैं, और बिना बना हुआ, बेचेहरा, एक तीसरा मोर्चा चुनाव के पहले न सही, चुनाव के बाद सामने आएगा, जो अपने-आपमें हो सकता है कि किसी गठबंधन की शक्ल में न हो, लेकिन हो सकता है कि उसके बिना अगली सरकार बनना मुश्किल हो। यह नौबत देश में स्थिरता के लिए अच्छी रहेगी या खराब, उसके बारे में यहां की इतनी कम जगह में लिखना मुश्किल है, और साथ-साथ यह लिखना भी मुश्किल है कि स्थिरता हर मौके पर, और हर हद तक लोकतंत्र के फायदे की रहती है या नहीं। इसलिए बहुत सी पार्टियों ने मैदान में दो बड़े गठबंधनों से बाहर रहकर तस्वीर को जिस तरह धुंधला किया है, हो सकता है कि उस धुंध के बीच से एक ऐसी तस्वीर सामने आए, जो कि खालिस यूपीए, और खालिस एनडीए की सरकार के मुकाबले बेहतर हो, और जो कि अगली सरकार को भीतरी या बाहरी समर्थन देकर, उसी तरह सही पटरी पर रखे, जिस तरह वामपंथियों ने बाहरी समर्थन देते हुए यूपीए-1 को सही पटरी पर रखा था। आने वाले दिन बड़े दिलचस्प होंगे, भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में दिलचस्पी रखने वाले हर किसी के लिए।

सजायाफ्ता और संभावना के बीच हो रहे ये चुनाव

23 अप्रैल 14
संपादकीय
भारत के आम चुनाव में मतदान के बीच बहुत से जागरूक और समझदार लोगों के बीच मुद्दा यह है कि साम्प्रदायिकता की आशंका के साथ भाजपा-एनडीए को जिताया जाए, मोदी को प्रधानमंत्री बनाया जाए, या फिर भ्रष्टाचार में गले-गले तक डूबी यूपीए सरकार को फिर से चुना जाए? कई लोग इस बात पर हैरान हैं कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी मोदी न सिर्फ गुजरात में लगातार किस तरह जीते, बल्कि आज देश में अगर किसी एक नेता की सबसे अधिक शोहरत है, तो वह मोदी की है, और दंगों के दाग के साथ गुजरात के इस नेता की देश के और भी हिस्सों में कितनी शोहरत कैसी हुई? 
दरअसल इसे समझने के लिए साम्प्रदायिकता और भूख, इन दो बातों को एक साथ समझना होगा। साम्प्रदायिकता का दर्द उस तबके को ही आमतौर पर होता है जो कि साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार होता है। उससे परे के दूसरे तबके के लोगों को एक हमदर्दी हो सकती है, लेकिन उनका दर्द जख्मों जितना बड़ा नहीं हो सकता। यह एक वजह है कि गुजरात में जिस बहुसंख्यक हिन्दू तबके ने साम्प्रदायिक हिंसा के जख्म उतने नहीं झेले हैं, उसे देश के बाकी हिस्सों में साम्प्रदायिकता उतना बड़ा खतरा नहीं दिखती है। अल्पसंख्यकों को साम्प्रदायिकता के जख्म भुलाए नहीं भूलते, और वे इस बात को लेकर मोदी को कभी माफ भी नहीं करते, और भाजपा को वोट भी नहीं देते। लेकिन इन सीधे जख्मों से परे के बाकी के जो समुदाय हैं, उनकी भूख, और उनकी गरीबी, अल्पसंख्यकों के जख्मों के दर्द से अधिक है, और उनको यूपीए-कांग्रेस के भ्रष्टाचार, जिंदगी पर हावी गरीबी, और कांग्रेस नेताओं के बर्ताव का घमंड अधिक दर्द देते हैं। इसलिए साम्प्रदायिकता कुछ लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो सकती है, और बाकी बहुत से लोगों के लिए भूखी जिंदगी की गरीबी से लड़ाई उससे कहीं अधिक बड़ा मुद्दा हो सकती है। 
देश के बहुत से हिस्से ने साम्प्रदायिक हिंसा को रूबरू नहीं देखा है, जैसे छत्तीसगढ़। इसलिए यहां पर न उसके जख्म हैं, न उसका दर्द है। लेकिन गरीबी का दर्द है, और यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार की खबरें हैं। अब तो यूपीए के एक बड़े ईमानदार समझे जाने वाले नेता, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने भी यह मंजूर किया है कि यूपीए के भ्रष्टाचार की खबरों ने उसकी उपलब्धियों को ढांक दिया। इसलिए आज जब देश की आधी गरीब आबादी साम्प्रदायिकता के खतरे, उसके इतिहास, उसके जख्म और दर्द से नावाकिफ रहते हुए, एक साफ-सुथरी और ईमानदार, भ्रष्टाचार विरोधी मोदी सरकार की हिमायती दिखती है, तो उसे साम्प्रदायिक कहना गलत होगा। और जो लोग साम्प्रदायिकता को देश का सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं, जाहिर है कि उनके पेट भरे हुए हैं। खाली पेट पर कोई साम्प्रदायिकता और गरीबी में से पहले गरीबी से छुटकारा पाना ही चाहेंगे। मोदी के पैदा होने के भी जमाने पहले से यह बात चली आ रही है कि भूखे भजन न होए गोपाला। 
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली ताकतें जब गरीबों के मुंह के कौर को बेच-बेचकर अपने लिए माल-मेवा जुटाने लगती हैं, तो उस डकैती के खिलाफ खड़ी होने वाली ताकतें अगर साम्प्रदायिक इतिहास वाली भी रहती हैं, तो भी उनके दाग-धब्बों को भूखी जनता नजरअंदाज कर देती है। आज देश में वही नौबत है। कल जब आम आदमी पार्टी की सबसे चर्चित महिला नेता शाजिया इल्मी कैमरे के सामने मुस्लिमों से बार-बार कम्युनल (साम्प्रदायिक) बनने को कहते कैद होती हैं, तब एक तबके की साम्प्रदायिकता, और दूसरे तबके की साम्प्रदायिकता में कौन सा सतही फर्क बच जाता है? ये चुनाव भारत के लोकतंत्र की विविधता वाली संस्कृति को लेकर नहीं हो रहे, ये चुनाव बेईमानी, और बेईमानी के खिलाफ एक संभावना के बीच हो रहे हैं। ये चुनाव अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियों की साम्प्रदायिकता और हिंसा की वजह से धुंधले हो गए हैं।  
जिन पार्टियों को दस या अधिक बरसों से सरकार चलाने का मौका मिला, और जिन्होंने देश-प्रदेशों को लूटने का काम किया, वे अब साख खोने के बाद भूखी जनता के बीच वोट पाने का हक खो चुकी हैं। इसलिए ये चुनाव साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, ध्रुवीकरण, या हिन्दू-मुस्लिम के आधार पर नहीं हो रहे, ये चुनाव भूखे-गरीब की नजर में एक सजायाफ्ता और एक संभावना के बीच हो रहे हैं। 

मीडिया और राजनीति, एक कारोबार के दूसरे कारोबार से रिश्ते का मामला...

22 अपै्रल 2014
संपादकीय
चुनाव के इस अंधड़ में न तो चुनाव से परे किसी दूसरे मुद्दे को लिखने लायक ढूंढ पाना आसान है, और न ही चुनाव से जुड़े मुद्दे पर बार-बार दुहराना अच्छा है। इसलिए इसके बीच का एक रास्ता यही निकल सकता है कि कुछ किनारे के मामलों पर लिखा जाए। ऐसा एक मामला कल शाम सामने आया है जब समाचार चैनल जी न्यूज ने भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी का एक लंबा समाचार दिखाया कि किस तरह एक इंटरव्यू में अपनी ही कही बातों को बाद में जोर डालकर, दबाव डालकर, धमकी देकर कैमरे के टेप पर से उन्होंने मिटवाया, और उसके बाद ही टीवी के एक सीनियर पत्रकार को वहां से जाने दिया। मजे की बात यह रही कि टीवी चैनल का एक और कैमरा मुरली मनोहर जोशी के पीछे चालू था, और वह उनकी सारी धमकी-चमकी को रिकॉर्ड कर रहा था, और बाद में चैनल ने उसका इस्तेमाल भी किया। 
अब आज यहां लिखने की बात चुनाव से परे की यह है कि एक इंटरव्यू देने के साथ-साथ क्या इंटरव्यू देने वाले नेता की यह जिद जायज है कि दिए जा चुके जवाबों को वो मिटवाए, और उसके बाद दुबारा रिकॉर्ड करने के लिए यह शर्त रखे कि सवालों की दिशा वह तय करेगा? इस मामले में मुरली मनोहर जोशी की बहुत दुर्गति हुई है कि उन्होंने अपने ही दिए हुए जवाबों से हड़बड़ाकर, टीवी चैनल को धमकाकर, रिकॉर्डिंग मिटाए बिना घर से बाहर न निकलने देने की धमकी दी। लोग यहां पर दो बातों को देख सकते हैं, एक तो यह कि मोदी के बारे में पूछे गए सवाल के, अपने ही दिए गए जवाब से जोशी किस तरह दहशत में आ गए। और दूसरी बात यह कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रहे चुके, एक भूतपूर्व प्राध्यापक, किस तरह मीडिया को धमका सकते हैं। 
इससे राजनीति और मीडिया के बीच के संबंधों पर भी सोचने का मौका मिलता है, क्योंकि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा शायद एक या दूसरे राजनीतिक दल, एक या दूसरे नेता, के लिए बेरहम या रहमदिल होने का दर्जा पा चुका है। ऐसे में लोग यह भी सोचते हैं कि लंबे इंटरव्यू में भी जब सबसे जलते और सुलगते हुए मुद्दों पर सवाल नहीं पूछे जाते, तो उसके पीछे किस तरह के समझौते रहते हैं? क्या कुछ लोगों की खरीदी-बिक्री की चर्चा सच रहती है? या फिर कुछ सवालों को न पूछने की शर्त पर भी बाकी इंटरव्यू पाने की पेशे की मजबूरी लोगों को कुछ सवालों से परे रहने को मजबूर करती है? इन दोनों में से कोई एक बात कई मामलों में लागू हो सकती है, क्योंकि मीडिया की आजादी कोई आदर्श स्थिति नहीं है, और वह जिंदगी के बाकी दूसरे दायरों की तरह समझौतों से घिरी रहती है, बहुत से समझौते अनचाहे रहते हैं, बहुत से चाहकर किए जाते हैं। 
हम उन अखबारनवीसों, और नेताओं को बेहतर मानते हैं, जो हर सवाल को पूछने का हौसला रखते हैं, और पूछे गए हर सवाल का जवाब देने का। पिछले महीनों में राहुल गांधी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक ऐसे इंटरव्यू के लिए सामने आए, जैसे कि उन्होंने पहले दिए नहीं थे। और इस बीच में ही मीडिया के बीच भी यह बात भी उठी कि किस इंटरव्यू में किसके साथ नरमी बरती गई। लगे हाथों यह अटकल भी लगने लगी कि कौन से कारखानेदारों ने मीडिया के कौन-कौन से हिस्से को खरीद लिया है, और उनके दबाव में किस चैनल या अखबार का रूख, किस नेता के लिए कैसा रह गया है, या हो गया है। 
इसमें भी हमको किसी तरह की हैरानी नहीं होती, क्योंकि मीडिया की आजादी का इस्तेमाल न तो आजादी की लड़ाई की तरह आज हो सकता है, और न ही उसकी जरूरत है। दरअसल लोगों को इस बारे में सोचने-विचारने की जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि मीडिया ने अपने-आपको एक कारोबार मानने से इंकार करते हुए अपने-आपको लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की खुद की बनाई हुई तख्ती से सजा रखा है। हकीकत यह है कि मीडिया की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातें मीडिया के मालिकों पर ही लागू होती हैं, न कि अखबारनवीसों पर, चैनलों के संपादकों या, रिपोर्टरों पर। हिंदुस्तानी लोकतंत्र में जिस तरह राजनीति एक कारोबार बन चुकी है, उसी तरह मीडिया भी एक पूरा कारोबार रहते आया है, और रहेगा भी। इसलिए दो उद्योगों या दो व्यापारों के बीच आपस में जैसे व्यापारिक संबंध रहते हैं, वैसे संबंध अगर मीडिया और राजनीति के बीच हैं, तो उसमें कुछ अटपटा नहीं है, और न ही हैरानी की कोई बात है। पवित्रतावादी-आदर्शवादी लोगों को हमारी यह व्याख्या कुछ घटिया लग सकती है, लेकिन हकीकत यही है। इससे परे किसी और लोकतांत्रिक रिश्ते की कल्पना करके कुछ लोग खुश रह सकते हैं।
एक बार फिर कल के उस टीवी प्रसारण पर लौटें, जिसमें मुरली मनोहर जोशी ने अपनी फजीहत करवाई है, तो यह साफ है कि बीते कल के एक नेता का, आज की हकीकत से कोई संपर्क नहीं रह गया है, और उनको आज के मीडिया की समझ भी नहीं रह गई है।

Bat ke bat, बात की बात,

21 april 2014

प्रवीण तोगडिय़ा मोदी के हिमायती हैं या दुश्मन?

21 अप्रैल 14
संपादकीय
जहर भरी और घोर साम्प्रदायिक बातें करने के लिए कुख्यात, विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिय़ा ने गुजरात में अभी एक हिन्दू बहुल बस्ती में एक मुस्लिम के मकान खरीदने के विरोध में वहां किए जा रहे आक्रामक धार्मिक प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए कहा कि हिन्दू संगठनों के लोगों को इस मकान पर कब्जा कर लेना चाहिए और हिन्दू बस्तियों में मुस्लिमों को मकान नहीं खरीदने देना चाहिए। इस खबर के सुबह आ जाने के बाद से लगातार इसके खिलाफ प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन अपने मिजाज के मुताबिक इस बात को कहने वाले प्रवीण तोगडिय़ा की तरफ से इसका कोई खंडन आठ घंटे बाद भी नहीं आया है, और इस वजह से यह मानने की कोई वजह नहीं है कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा होगा। 
यही मानकर हम इस बात पर आज यहां लिख रहे हैं कि ऐसी घोर साम्प्रदायिक बात न सिर्फ चुनाव के मौके पर बल्कि किसी भी मौके पर नहीं की जानी चाहिए, और इसके लिए चुनाव आयोग की जरूरत नहीं है, गुजरात के जिस शहर में मकान खरीदने वाले मुस्लिम के खिलाफ रामधुन और राम दरबार लगाकर ऐसा विरोध किया जा रहा है, उस शहर के अफसरों को बिना देर किए हुए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। पिछले दो-चार दिनों के भीतर देश के मुस्लिमों के खिलाफ आक्रामक हिन्दू नेताओं की कही हुई यह दूसरी-तीसरी बात है, और इसका भयानक असर देश के लोगों पर होना तय है। बाकी लोग तो जुबानी बयान देकर रह जा रहे हैं, लेकिन गुजरात में अगर मुस्लिम के मकान खरीदने पर भी सार्वजनिक हमलावर-हिंसक तेवरों से अगर हिन्दू संगठन दबाव डाल रहे हैं, तो इससे यह जाहिर है कि उस प्रदेश में कानून की हालत खराब है, और वैसी नहीं है, जैसी कि वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश भर में घूम-घूमकर बता रहे हैं। 
यहां पर इंसाफ के लिए, हमको यह चर्चा करना भी जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी से तोगडिय़ा के मतभेद और खराब रिश्ते बरसों से जगजाहिर हैं, और हम इसके पीछे अगर तोगडिय़ा की ऐसी कोई साजिश हो कि जिससे नरेन्द्र मोदी को नुकसान पहुंचता हो, तो हम उस खतरे से भी इंकार नहीं करेंगे। राजनीतिक दलों में, और उनके सहयोगी संगठनों में ऐसी कोई साजिश अनहोनी बात नहीं रहती, और तोगडिय़ा जैसे लोगों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए भी हो सकता है कि मोदी को हराना जरूरी हो। इसलिए हम अभी तोगडिय़ा की कही बात को मोदी की कही बात सीधे-सीधे नहीं मान रहे, क्योंकि अपनी पिछली साख के खिलाफ जाकर भी मोदी ने दो दिन पहले एक इंटरव्यू में यह कहा था कि वे धर्म के नाम पर वोट मांगने के बजाय हार जाना बेहतर समझेंगे। हमारे विचार इस पूरे मुद्दे पर अपने हैं, लेकिन सच के साथ इंसाफ के लिए यह जरूरी है कि हिन्दुत्व से जुड़े इन अलग-अलग मुद्दों को जोड़कर एक तस्वीर यहां रखी जाए, ताकि पाठक उसे पूरा समझ सकें। आज भी तोगडिय़ा के बयान के खिलाफ जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें बहुत से ऐसे हिन्दू लोग हैं जो कि अब तक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वे किसे वोट देंगे, लेकिन अब तोगडिय़ा की ऐसी हिंसक बात के बाद उन्होंने अपना दिमाग बना लिया है। 
आज हिन्दुस्तान के चुनाव में एक ऐसी तस्वीर बन रही है, और बनाई जा रही है कि लोग नरेन्द्र मोदी को एक हिन्दू नेता के रूप में साथ दे रहे हैं। हकीकत यह है कि आज का वोट केन्द्र की कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ वोट है, राज्यों में मुलायम सिंह जैसे लोगों के खिलाफ वोट है, और जगह-जगह यूपीए के साथियों के खिलाफ वोट है। भाजपा और एनडीए की इतनी ताकत नहीं थी, और इतनी ताकत नहीं है कि वे देश में अपने बूते पर इतना माहौल बना पाते। लेकिन कांग्रेस और यूपीए के कुकर्मो ने देश में एक ऐसा शून्य खड़ा किया है कि उसमें नरेन्द्र मोदी टहलते हुए ही जा खड़े हुए हैं, और उन्होंने वह खाली जगह भर दी है। इसलिए आज जो लोग कांग्रेस से नाराज हैं, उन तमाम लोगों को हिन्दुत्ववादी, या मोदीवादी मानना ठीक नहीं है। कांग्रेस-यूपीए ने आम जनता को तकलीफ दे-देकर उनको एक ऐसे कोने में धकेल दिया है कि उनके पास मोदी और एनडीए के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। ऐसे में हम चुनावी नतीजों पर अटकल लगाए बिना भी, यह बात लिखना चाहते हैं कि इस चुनाव के नतीजों को हिन्दुत्व पर जनमत संग्रह नहीं माना जाना चाहिए। देश की जनता धर्म के आधार पर बंटी हुई नहीं है, और आने वाले चुनावी नतीजे मोटे तौर पर राजनीतिक मुद्दों पर फैसला सामने रखेंगे। 

Bat ke bat, बात की बात,

20 april 2014

बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इतिहास में बुद्धूजीवी दर्ज होंगे

20 अप्रैल 14
संपादकीय
भाजपा के उत्तर भारत के एक बड़बोले और हिंसक जुबान बोलने वाले नेता गिरिराज किशोर ने अपनी पार्टी के लिए एक नई दिक्कत खड़ी की है। जिस दिन नरेन्द्र मोदी एक टीवी इंटरव्यू में यह कह रहे हैं कि वे धर्म के नाम पर वोट मांगने के बजाय हार जाना पसंद करेंगे, उसी दिन गिरिराज किशोर ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके विरोधियों को पाकिस्तान जाना होगा। और ये ऐसी गंदी और राष्ट्रविरोधी बात कहने वाले वे अकेले नहीं हैं, उनकी पार्टी के नेता वरूण गांधी के हाथ काटने वाले वीडियो लोगों को याद हैं, और दूसरी भी कई पार्टियों के नेताओं ने तरह-तरह की हिंसक बातें पिछले दिनों में की हैं। और तो और जम्मू-कश्मीर पर तीन पीढ़ी से राज करते आ रहे फारूख अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि उनके हाथ अगर आतंकी होते, तो वे विरोधियों पर हमले करवाते। समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने और कई किस्म की गंदी और संविधान विरोधी बातें कहीं, और पूरी हवा ऐसी हो गई है कि मानो पूरा देश सबसे बुरी गंदगी का घूरा बन गया है। 
हमने अभी कल-परसों ही लिखा कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को चुनाव सुधार के लिए कुछ कोशिशें करनी चाहिए, लेकिन अब यह लग रहा है कि कानून जहां-जहां कार्रवाई न भी कर पाए, वहां-वहां मीडिया को और समाज के लोगों को खुद होकर गंदी बातों का खतरा उजागर करते हुए उसके खिलाफ खुलकर सामने आना चाहिए। जब एक राजनीतिक दल के बयान के खिलाफ दूसरे राजनीतिक दल की तरफ से कुछ कहा जाता है, तो उसका वजन कम होता है। जब राजनीति का हिस्सा न रहने वाली बाकी ताकतें, अपनी विश्वसनीयता के साथ हिंसक जुबान के खिलाफ कुछ कहेंगी, तो उसका वजन बहुत अधिक होगा, और ऐसा करना जरूरी भी है। 
समाज में जो लोग सोचना-विचारना जानते हैं, जो राजनीति और जिंदगी के बाकी मुद्दों की बारीकियों को समझते हैं, जो लोकतंत्र के पहलुओं को जानते हैं, और लोकतंत्र को बचाने में दिलचस्पी रखते हैं, वैसे लोगों को अलग-अलग छोटे-छोटे अनौपचारिक समूह बनाकर भी, अलोकतांत्रिक बयानों और हरकतों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र ने जब हर किसी को आजादी से जीने का हक दिया है, तो ऐसा हक बिना जिम्मेदारी के नहीं मिल सकता। और जो तबके अपने आपको पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी, और जिम्मेदार मानते हैं, उनकी चुप्पी मानो हिंसक बातों को मौन सहमति रहती है, देश में ऐसा लगता है कि ऐसी हिंसक और नाजायज बातों को देश मान रहा है। इसलिए चुप्पी को खत्म करने की जरूरत है, लोगों को खुलकर बोलने और लिखने की जरूरत है। 
राजनीति तो अपनी रफ्तार से, और अपने गैरजिम्मेदार तौर-तरीकों से चलती ही रहेगी, लेकिन राजनीति से परे के लोगों को इस देश को बचाने के लिए, इस लोकतंत्र को बचाने के लिए, गांधी की अहिंसा की सोच को बचाने के लिए, देश की धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए, गरीबों के हक को बचाने के लिए, मुंह खोलना पड़ेगा। वरना इतिहास याद रखेगा कि किस तरह लोकतांत्रिक अधिकार रहते हुए भी तथाकथित बुद्धिजीवियों ने नाजुक और जरूरी मौके पर अपना मुंह नहीं खोला। उतना भी नहीं बोला जितना कि सैकड़ों बरस पहले बिना लोकतंत्र, बिना अदालत, बिना मीडिया, बिना मानवाधिकार आयोग के कबीर ने कहा था। आज शायद ही ऐसे लोग सक्रिय दिखते हैं, जिनमें कबीर जितना कहने का हौसला हो। आज और कुछ नहीं, तो लोग कम से कम कबीर को पढ़ लें, और उस बारे में दूसरों से चर्चा ही कर लें। गांधी, भगतसिंह को पढ़ लें, और दूसरों से उस पर चर्चा कर लें। ऐसा न करने वाले बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इतिहास में बुद्धूजीवी दर्ज होंगे। 

अनचाहे चुनावी संदेशों से लेकर बदनीयत जुर्म वाले संदेशों तक

19 अप्रैल 14
संपादकीय
अभी चल रहे भारतीय आम चुनावों में ट्विटर पर अगर किसी ने मोदी शब्द भी लिख दिया, तो कम्प्यूटर की मदद से मोदी समर्थक ऐसे लोगों को मोदी के पक्ष में संदेश भेजना शुरू कर देते हैं। और लोगों को मशीनी मदद से ऐसे संदेशों से लाद दिया जा रहा है। यह कुछ उसी तरह का है, जिस तरह की लोगों के फोन पर घंटी बजती है, और नेताओं के रिकॉर्ड किए हुए संदेश उन्हीं की आवाज में आने लगते हैं। आज फोन, ई-मेल, और सोशल वेबसाईटों पर लोगों के अकाउंट की जानकारी आसानी से मिल जाती है, और उनको जिस तरह बाजार अपने विज्ञापनों से और अनचाही जानकारी से लाद देता है, उसी तरह राजनीतिक दल और उम्मीदवार यह काम कर रहे हैं। 
यह चुनाव निपट जाए इसके बाद चुनाव आयोग को, और शायद सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देकर लोगों को अनचाहे प्रचार के हमले का शिकार होने से बचाना चाहिए। आज टेक्नॉलाजी की वजह से यह आसान हो गया है कि लाखों-करोड़ों फोन नंबरों पर एक साथ प्रचार के संदेश भेज दिए जाएं। लेकिन इससे लोगों का सुख-चैन छिनता है, और उनको बार-बार अपना फोन उठाकर बाजारू प्रचार का यह हमला देखना पड़ता है। जब कोई देश और समाज टेक्नॉलाजी के विकास का फायदा उठाने की हालत में आते हैं, तो उसी वक्त इस तरह के हमले भी बढ़ते हैं, और ऐसे नाजायज और अनचाहे हमलों को रोकने के लिए सरकार को दखल देनी चाहिए, अदालत को भी पहल करनी चाहिए, और दूरसंचार को नियमित करने के लिए बनाए गए नियामक आयोग को भी अपना जिम्मा निभाना चाहिए। 
आज का जमाना सूचना के बोझ का है। बहुत से लोग अपने खुद के काम के बोझ से इतने दबे रहते हैं, कि उनकी जिंदगी में फालतू के प्रचार को झेलने का वक्त नहीं रहता। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों से यह जवाब मांगना चाहिए कि जिन फोन नंबरों, ई-मेल खातों, और ट्विटर या फेसबुक अकाउंट पर वे संदेश भेज रहे हैं, वहां क्या वे पाने वालों को यह भी बता रहे हैं कि प्रचार का यह कूड़ा वे कैसे रोक सकते हैं? जिस तरह चुनाव आयोग ने दीवारों को रंगना बंद करवाया है, उसी तरह की डिजिटल गंदगी भी रोकनी चाहिए। टेक्नॉलाजी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने देने की इजाजत किसी को नहीं देनी चाहिए। 
इससे लगी हुई एक दूसरी बात यह है कि इंटरनेट, और फोन पर जो लोग झूठी जानकारी फैलाते हैं, गुमनाम अफवाहें फैलाते हैं, और दूसरों को बदनाम करने के लिए गढ़ी हुई तस्वीरें फैलाते हैं, दंगों के वक्त दूसरे देशों के दंगों को हिन्दुस्तान की हिंसा बताकर वीडियो फैलाते हैं, उनके खिलाफ चुनाव आयोग से लेकर सरकार तक, और अदालत तक, सबको तेजी से कार्रवाई इसलिए करनी चाहिए क्योंकि डिजिटल सुबूत आसान होते हैं, और उनके मार्फत ऐसे मुजरिमों को पकड़कर जब तक तेजी से सजा नहीं मिलेगी, तब तक बाकी लोगों को यह अंदाज भी नहीं लगेगा कि उनकी ऐसी हरकतें उन्हें जेल भेज सकती हैं। अभी तक हमने आईटी एक्ट के तहत सजा पाते हुए लोगों को नहीं देखा है, और कुछ लोग अदालती कार्रवाई तक ही पहुंच पाए हैं। भारतीय अदालतों की धीमी रफ्तार और डिजिटल टेक्नॉलाजी की तेज रफ्तार के चलते ऐसे मुजरिम और ऐसे जुर्म बढ़ते ही चले जाएंगे। इसलिए बाजार से लेकर राजनीति तक अनचाहे संदेशों से लेकर बदनीयत जुर्म वाले संदेशों तक पर तेजी से कार्रवाई की जरूरत है। भारत की संवैधानिक संस्थाएं अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। 

लोकतंत्र को बचाने के लिए चुनाव सुधार की जरूरत...

18 अप्रैल 14
संपादकीय

महाराष्ट्र की खबर है कि किस तरह वहां के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने अपनी भतीजी, और शरद पवार की बेटी, सुप्रिया सुले के लिए वोट मांगते हुए खुली धमकी दी कि अगर वोट नहीं मिला तो गांव के लोगों को पानी मिलना भी बंद हो जाएगा। देश भर में जगह-जगह नेता हिंसक बातें कर रहे हैं, दूसरों को गंदी गालियां दे रहे हैं, और चुनाव प्रचार को लेकर एक हिंसक और बदबूदार माहौल खड़ा कर रहे हैं। ऐसे में चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं पर मामूली रोक लगाई है, लेकिन आज की गंदगी पर इससे कोई फर्क पड़ते नहीं दिख रहा है। ऐसे में जरूरत एक ऐसे कारगर कानून की है, या कि मौजूदा कानून के भीतर ऐसी कारगर कार्रवाई की है कि जिससे गंदी बातों का यह सिलसिला, धमकी, और साम्प्रदायिकता, नफरत, इन सबको रोका जा सके। 
भारत में चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया पर मतदान और मतगणना की हद तक तो काबू कर लिया है, लेकिन चुनाव प्रचार की गंदगी, चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल, बेईमानी और भ्रष्टाचार, खरीद-बिक्री पर कोई भी काबू नहीं हो पाया है, और इसी का नतीजा है कि धीरे-धीरे राजनीति में अब हिंसक-मुजरिम उम्मीदवार कम हो रहे हैं, और आर्थिक-अपराधी-कारोबारी उम्मीदवार बढ़ते चले जा रहे हैं। लगातार करोड़पति और अरबपति लोग न सिर्फ चुनावों में टिकट अधिक पा रहे हैं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में भी उनकी आबादी बढ़ती जा रही है। नतीजा यह हो रहा है कि चुनाव के वक्त तो चुनाव को खरीदने की ताकत एक बड़ा पैमाना मान ली गई है, और उसके बाद का नतीजा यह होता है कि संसद और विधानसभाओं में गरीबी की समझ रखने वाले लोग घटते चले जा रहे हैं, और उनसे जुड़े मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। भारत का चुनाव आयोग दुनिया भर में जिस बात के लिए वाहवाही पा रहा है, उससे अधिक करने की जरूरत है। सिर्फ मतदान केन्द्रों पर कब्जा रोकना काफी नहीं है। मतदान को खरीदने की ताकत का हिंसक और अश्लील इस्तेमाल भी रोका जाना चाहिए, वरना लोकतंत्र का बाजारीकरण भी हो रहा है, और बाजारूकरण भी हो रहा है। कारोबार ने अपने ही एक डिपार्टमेंट की तरह देश की संसदीय राजनीति को खरीदकर रखने का काम किया है, और भारत के चुनाव कानून, संसदीय कानून, ये सब मिलकर भी इसे रोक नहीं पा रहे हैं। एक तरफ संसद अपनी विशेषाधिकार को इंसाफ के ऊपर लेकर चल रही है और यही वजह है कि जब झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को खरीदकर नरसिंह राव की सरकार बचाई गई थी, तब सब कुछ साबित हो जाने के बाद भी मामला संसद के भीतर का होने की वजह से देश की अदालत बिके हुए लोगों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई थी। 
लोकतंत्र के तहत संसदीय व्यवस्था को, लोकतंत्र से भी पहले के प्राकृतिक और बुनियादी इंसाफ के ऊपर मान लेना एक गलती है। भारत में चुनाव सुधार के लिए न सिर्फ चुनाव कानूनों को सुधारने की जरूरत है, बल्कि संसद और विधानसभा के ऐसे विशेषाधिकार खत्म करने की भी जरूरत है जो कि भ्रष्ट सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कुल मिलाकर आज की तस्वीर यह है कि जो पार्टियां चुनाव के पहले कारोबारियों के हाथ नहीं बिकतीं, वे संसद बन जाने के बाद, विधानसभा बन जाने के बाद वहां के मतदान के मौकों पर बिक जाती हैं, सवाल पूछने के मौकों पर बिक जाती हैं। यह नौबत सुधारना अधिकतर राजनीतिक दलों को गैरजरूरी लग सकता है क्योंकि ऐसा भ्रष्टाचार विपक्ष में बैठी पार्टियों को भी भ्रष्टाचार का मौका देता है, और उनकी भी कीमत लगती है। लेकिन हिन्दुस्तान को बचाने की फिक्र जिन लोगों को है, उनको चुनावों में पैसों के बोलबाले को खत्म करना होगा, वरना लोकतंत्र खत्म हो रहा है, और गरीबों का हक खत्म हो चुका है। 
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को संविधान के बुनियादी ढांचे के भीतर इस सुधार की कोशिश करनी होगी क्योंकि संसद में बिके हुए लोग ऐसा होने नहीं देंगे। हमारा यह मानना है कि भारतीय संविधान को बनाने वाले उस वक्त के महान नेताओं ने इस संविधान की भावना में ऐसे सुधार की गुंजाइश रखी है, और आज सुप्रीम कोर्ट को उसका इस्तेमाल करना चाहिए।