3 जुलाई 2011
नीरज ग्रोवर हत्याकंाड में तीन साल की अपनी सजा काटकर छूट गई मारिया सुसईराज, और उनके साथी नौसेना के पूर्व अधिकारी को दी गई सजा पर पूरे देश में हर मंच पर चर्चा छिड़ी हुई है। नीरज ग्रोवर के परिवार वाले अदालते के इस फैसले से नाखुशी जाहिर करते, यह बात समझ में आती थी, लेकिन पूरे देश का खासोआम इस मौके पर मारिया को कोसने के बहाने देश की न्यायापालिका पर, न्यायिक प्रक्रिया पर जैसे लातें बरसाने में जुटे हैं। पुलिस तो इस देश के लोगों को यंू भी सस्ते में मिली हुई है, जिसकी काबीलियत पर जो भी ,जब चाहे जो भी बोल सकता है। नीरज ग्रोवर के मामले में मारिया को कथित रूप से मिली कम सजा का दोष पुलिस के निकम्मेपन पर डाला जा रहा है, यह विचारे बिना कि यह पुलिस ही थी जिसने इस हत्याकांड के सुराग ढूंढकर अपराधियों को उनके अंजाम पर पहुंचाया। हमेशा सनसनीखेज खबरों की तलाश में रहना मीडिया का पेशा, और जरूरत दोनों है, लेकिन बड़े-बड़े विचारक माने जाते लोग, जिन्हें गंभीर मुद्दों पर टेलिविजन पर चर्चा के लिए बुलाया जाता है, जिनकी बातें लोग ध्यान से सुनते हंै, उनके नजरिये से प्रभावित होकर अपनी राय कायम करते हंै, वह भी मारिया और इस तरह इस फैसले के खिलाफ अनर्गल बोले जा रहे हैं। की-बोर्ड, माऊस और इंटरनेट की सुविधा ने उनकी असली शख्सियत उघाड़ कर रख दी है, कि बौद्धिक समझे जाते, नफीस जुबान बोलने वाले ऊंचे-ऊंचे आदर्शों का दावा करने वाले इतने कमजोर हैं कि इंटरनेट से मिली बेपनाह आजादी पचा नहीं पा रहे हैं। एक सेक्सी, खूबसूरत, स्ट्रगलिंग अभिनेत्री की बात आते ही, आज तक जो जामा पहनकर वह दुनिया के सामने आते रहे हंै, उसे चीरकर उनके अंदर का असली इंसान ट्विटर पर, सोशल नेट्वर्किंग पर नजर आ रहा है। कल तक बिनायक सेन को सजा देने वाली निचली अदालत को कोसने वाले आज मारिया सुसाईराज को कथित रूप से सस्ते में छोड़ देने वाली निचली अदालत के फैसले पर सवाल उठाने के बहाने, यह लोग उसके बारे में बेलगाम जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या इसलिए कि इन्हें देश में अदालती इंसाफ की बहुत भारी चिंता है, या इसलिए कि मारिया एक सुन्दर जवान सिने तारिका है ,जिस पर जो जी चाहे बोलना सब अपना अधिकर समझते हंै?
हमने अभी कुछ ही दिन पहले जे डे के मामले पर इसी जगह यह लिखा है कि आपराधिक मामलों में जांच के नतीजों के बारे में जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया दिखाना कई बार गलत साबित होता है। किसी घटना में कभी-कभी जो नजर आता है बरसों बाद पता चलता है कि सच उससे कुछ और ही था। ऐसी हालत में किसी मामले में अदालत से बाहर खुद जज बन बैठना, फैसले सुनाना, इंटरनेट की सुविधा के कारण आसान और लुभावना तो लग सकता है, लेकिन इस तरह के फैसले सुनाने वाले क्या कल को इस मामले में कोई और बात सामने आने पर, अपनी कही हुई बातों की जिम्मेदारी ले सकते हैं? क्या इसके लिए उन्हें बाद में जिम्मेदार ठराया जा सकता है? क्या आगे कभी नौबत आने पर उनके ब्लॉग्स, ट्वीट्स, या पोस्ट्स के कारण किसी को हुए नुकसान का मुआवजा चुकाने को वह तैयार होंगे? अभी कुछ ही दिनों के भीतर ऐसी खबरें आ रही हंै, जिनमें अपराधों में रहस्य 50 साल बाद खुल रहे हैं। यह भारत की हमेशा लतियाई जाने वाली पुलिस नहीं, बेहतरीन और काबिल गिनी जाने वाली अमरीकी पुलिस के साथ हुआ है। हाल ही में इलिनॉइस में पुलिस ने 54 साल पहले 7 बरस की एक बच्ची मारिया रुडालफ के अपहरण और हत्या के मामले में अपराधी को पकडऩे का दावा किया है। यह एक ऐसा मामला था जिस पर देश में इतना बवाल मचा था कि राष्ट्रपति आईजन हावर तक ने इसमें रोज घटनाक्रम से वाकिफ करवाने की ताकीद की थी। यह वह व्यक्ति था, जिसके पास घटना के समय कहीं और मौजूद होने का सुबूत था, लेकिन आज 54 साल बाद वह सुबूत पुलिस को झूठा साबित होता लग रहा है। एक और अहम घटना में नोबल पुरस्कार विजेता मशहूर साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे की आत्महत्या के बारे में यह दावा किया जा रहा है कि एफबीआई ने उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर किया। उनकी आत्महत्या पर पहले यह माना जा रहा था कि एक साहित्यकार के रूप में अपनी प्रतिभा चुक जाने की हताशा में उन्होंने आत्महत्या की। अब उनके एक करीबी दोस्त ने लिखा है कि किस तरह उन्हें लगातार अपने घर, अपनी कार तक के, एफ बी आई द्वारा "बग" किए जाने का शक था, वह इतने डरे हुए रहते थे कि अपने दिल की बात अपने दोस्त से कहने के लिए दूसरे किसी की कार में सफर करते थे। कहने की बात यह है कि किसी घटना से जुड़े बहुत से पहलू हो सकते हंै,जिनकी जांच के लिए हर देश में एक तंत्र होता है, उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए एक अलग व्यवस्था होती है, जनता को इन दोनों की राय से अपनी असहमति जताने का हक है, लेकिन उसका एक तरीका है। उसके लिए भी एक व्यवस्था है। इस तरह आमराय के आधार पर फैसला सुनाना, लोकप्रिय भावनाओं का ज़ोर दिखाकर किसी व्यवस्था पर उंगली उठना, वह भी देश के जिम्मेदार समझे जाने वाले लोगों के द्वारा, बहुत डरावना है।
हमने बिनायक सेन के मामले में भी यही लिखा था, जब देश के बड़े-बड़े कानूनविद् तक निचली अदालत के फैसले के खिलाफ टीका कर रहे थे, और आज भी, जब देश में कानून के बड़े जानकार समझे जाने वाले मारिया सुसाईराज को कथित रूप से सस्ते में छोड़ दिया बता रहे हैं, तब भी हम यही लिखना चाह रहे हंै कि समाज को ऐसे मामलों में मीडिया के साथ नहीं जुड़ जाना चाहिए, क्योंकि एक घटना के सारे पहलुओं को तलाशना, और उसमें से खबर पैदा करना मीडिया का काम है, उसके बाजार में जिंदा रहने के लिए यह उसकी मजबूरी कही जाए या जरूरत, पर यह उसके पेशे का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, लेकिन नीरज ग्रोवर हत्याकांड पर फैसले पर टिप्पणी करते हुए देश के नामी वकीलों रामजेठमलानी और मुकुल रोहतगी जैसे लोग जब एक कानूनी फैसले पर खुले आम अखबारों में सवाल उठाएं, तो यह सोचने पर मजबूर हो जाना पड़ता है कि कभी खुद भी इसी कानूनी व्यवस्था में अहम् जिम्मेदार पदों पर बैठ चुके इन लोगों में, खुद इस व्यवस्था के लिए कितना सम्मान है। इस तरह के बयान एक व्यवस्था के खिलाफ देश में अराजक, लोकलुभावनी बातों के पीछे दौडऩे की मानसिकता को ही बढ़ावा नहीं देते, यह उस अदालत का भी सीधे-सीधे अपमान करते हंै जिसके फैसले पर यह सब टिप्प्णियां अदालत से बाहर सार्वजनिक क्षेत्र में अपने नाम के साथ की जा रही है।
अगर किसी अदालती फैसले से असहमति है तो उसके खिलाफ अपील के लिए राष्ट्रपति तक जाने की लंबी सुविधा इस देश में हासिल है ,और अब हम देविन्दर पाल भुल्लर के मामले में तो देख रहे हंै कि जिम्मेदार संगठन उस फैसले को भी चुनौती दे रहे हंै। शाहबानो मामले में हमने देखा कि किस तरह देश की संसद ने अपनी संवैधानिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति को और कमजोर करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलट डाला था। जब एक फैसले के खिलाफ खड़े होने के इतने वैध मंच उपलब्ध हंै, तो इंटरनेट पर मिल रही आजादी का गलत इस्तेमाल एक अदालत के जज की काबीलियत की टीका करने के लिए क्यों किया जा रहा है? पुलिस ने अपनी तरफ से यह मामला सुलझाते हुए, अपनी क्षमता के मुताबिक सुबूत जुटाकर अदालत के सामने रखे, और संबंधित जज ने मामले के तमाम पहलुओं पर विचार कर के अपना फैसला सुनाया। अगर इस तरह सुर्खियां बटोरने के लिए अदालती फैसलों पर टिप्पणिया की जाएंगी, किसी मामले में पुलिस की काबीलियत पर इस तरह सवाल उठाए जाएंगे तो यह दोनों एजेंसियां किस हौसले से अपना काम कर पाएंगी ? या फिर वह भी जनता की भावनाओं के दबाव में आकर अपना काम करेंगी? पुलिस ने कई बार ऐसा किया भी है, लेकिन जिस दिन अदालतों को इसके लिए मजबूर किया जाएगा, इंसाफ क्या केवल उन्हीं लोगों के हाथों का खिलौना नहीं बन जाएगा, जिन्हें इंटरनेट पर, पेज -3 पर अपनी राय जाहिर करके पूरे देश को एक खास दिशा में हकालने की सहूलियत मिली हुई है ? उस दिन अदालतों की जरूरत ही क्या रहेगी? कंगारू अदालतें लगाकर विशेष सलाहकारों से पूछकर,आम जनता की राय पर ही फैसला कर दिया जाएगा। हमारे यहां ऐसे भी मामले हुए हैं, जब आम राय ने अदालतों को दबंग लोगों के खिलाफ सख्त होने की प्रेरणा दी है, लेकिन उन्हें मजबूर नहीं किया, लेकिन अब मारिया के मामले में लग रहा है कि मीडिया की अदालतों के जमाने से आगे बढ़कर हम इंटरनेट की अदालतों तक पहुंच गए हंै, जहां तक देश के कुछ थोड़े से चुनिंदा अभिजात लोग अपनी अंदरूनी प्रवृत्तियों से मजबूर होकर, एक बड़ी, कच्ची उम्र की आबादी को एक खतरनाक दिशा में मोड़ रहे हंै। क्या यह लोग अदालती अवमानना के दोषी नहीं हंै? आज जब हमें मजबूर होकर साईबर सुरक्षा, आई टी के कानून बनाने पड़े हंै तब क्या इंटरनेट पर कही जा रही बातों को भी अदालती अवमानना के कायदों के दायरे में लाने के दिन आ गए हंै ? बात वहीं आ कर अटकती है कि इस तरह फैसले सुनाने बैठे लोगों के पास उस वक्त क्या जवाब होगा, जब ऐसी कोई बात सामने आए, जैसी मरिया रुडाल्फ की हत्या के जुर्म में आज 54 साल बाद पकड़ाए इंसान के बारे सामने आई है। आज जब कानून एक जुर्म करने के लिए पकड़ाए इंसान को उसका आखिरी मौका तक देने के लिए बरसों बरस की मोहलत देता है। कानूनी व्यवस्था और संविधान में दिए गए रास्ते अपनाए बिना एक अदालत और पुलिस को इस तरह कोसना पूरी तरह गलत और गैर जिम्मेदाराना है। हां, नीरज ग्रोवर पर हुए फैसले का यह अहसान देश पर रहा कि उसने इन बुद्धिजीवियों का दोगलापन उजागर कर दिया है,जो कभी तो महिलाओं के मान सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करते हंै, और आज इनके ही द्वारा और इनके ही कारण मारिया सुसाईराज के बारे में जितनी तरह की हो सकती हैं, अपमानजनक बातें इंटरनेट पर हो रही हैं। यह वही तबका है, जो निचली अदालत द्वारा बिनायक सेन को सजा देने पर हल्ला मचाता हुए कहता है कि सजा क्यों दी,और आज मारिया छूट गई है तो यही तबका कह रहा है कि मारिया को छोड़ा क्यों?
नीरज ग्रोवर हत्याकंाड में तीन साल की अपनी सजा काटकर छूट गई मारिया सुसईराज, और उनके साथी नौसेना के पूर्व अधिकारी को दी गई सजा पर पूरे देश में हर मंच पर चर्चा छिड़ी हुई है। नीरज ग्रोवर के परिवार वाले अदालते के इस फैसले से नाखुशी जाहिर करते, यह बात समझ में आती थी, लेकिन पूरे देश का खासोआम इस मौके पर मारिया को कोसने के बहाने देश की न्यायापालिका पर, न्यायिक प्रक्रिया पर जैसे लातें बरसाने में जुटे हैं। पुलिस तो इस देश के लोगों को यंू भी सस्ते में मिली हुई है, जिसकी काबीलियत पर जो भी ,जब चाहे जो भी बोल सकता है। नीरज ग्रोवर के मामले में मारिया को कथित रूप से मिली कम सजा का दोष पुलिस के निकम्मेपन पर डाला जा रहा है, यह विचारे बिना कि यह पुलिस ही थी जिसने इस हत्याकांड के सुराग ढूंढकर अपराधियों को उनके अंजाम पर पहुंचाया। हमेशा सनसनीखेज खबरों की तलाश में रहना मीडिया का पेशा, और जरूरत दोनों है, लेकिन बड़े-बड़े विचारक माने जाते लोग, जिन्हें गंभीर मुद्दों पर टेलिविजन पर चर्चा के लिए बुलाया जाता है, जिनकी बातें लोग ध्यान से सुनते हंै, उनके नजरिये से प्रभावित होकर अपनी राय कायम करते हंै, वह भी मारिया और इस तरह इस फैसले के खिलाफ अनर्गल बोले जा रहे हैं। की-बोर्ड, माऊस और इंटरनेट की सुविधा ने उनकी असली शख्सियत उघाड़ कर रख दी है, कि बौद्धिक समझे जाते, नफीस जुबान बोलने वाले ऊंचे-ऊंचे आदर्शों का दावा करने वाले इतने कमजोर हैं कि इंटरनेट से मिली बेपनाह आजादी पचा नहीं पा रहे हैं। एक सेक्सी, खूबसूरत, स्ट्रगलिंग अभिनेत्री की बात आते ही, आज तक जो जामा पहनकर वह दुनिया के सामने आते रहे हंै, उसे चीरकर उनके अंदर का असली इंसान ट्विटर पर, सोशल नेट्वर्किंग पर नजर आ रहा है। कल तक बिनायक सेन को सजा देने वाली निचली अदालत को कोसने वाले आज मारिया सुसाईराज को कथित रूप से सस्ते में छोड़ देने वाली निचली अदालत के फैसले पर सवाल उठाने के बहाने, यह लोग उसके बारे में बेलगाम जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या इसलिए कि इन्हें देश में अदालती इंसाफ की बहुत भारी चिंता है, या इसलिए कि मारिया एक सुन्दर जवान सिने तारिका है ,जिस पर जो जी चाहे बोलना सब अपना अधिकर समझते हंै?
हमने अभी कुछ ही दिन पहले जे डे के मामले पर इसी जगह यह लिखा है कि आपराधिक मामलों में जांच के नतीजों के बारे में जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया दिखाना कई बार गलत साबित होता है। किसी घटना में कभी-कभी जो नजर आता है बरसों बाद पता चलता है कि सच उससे कुछ और ही था। ऐसी हालत में किसी मामले में अदालत से बाहर खुद जज बन बैठना, फैसले सुनाना, इंटरनेट की सुविधा के कारण आसान और लुभावना तो लग सकता है, लेकिन इस तरह के फैसले सुनाने वाले क्या कल को इस मामले में कोई और बात सामने आने पर, अपनी कही हुई बातों की जिम्मेदारी ले सकते हैं? क्या इसके लिए उन्हें बाद में जिम्मेदार ठराया जा सकता है? क्या आगे कभी नौबत आने पर उनके ब्लॉग्स, ट्वीट्स, या पोस्ट्स के कारण किसी को हुए नुकसान का मुआवजा चुकाने को वह तैयार होंगे? अभी कुछ ही दिनों के भीतर ऐसी खबरें आ रही हंै, जिनमें अपराधों में रहस्य 50 साल बाद खुल रहे हैं। यह भारत की हमेशा लतियाई जाने वाली पुलिस नहीं, बेहतरीन और काबिल गिनी जाने वाली अमरीकी पुलिस के साथ हुआ है। हाल ही में इलिनॉइस में पुलिस ने 54 साल पहले 7 बरस की एक बच्ची मारिया रुडालफ के अपहरण और हत्या के मामले में अपराधी को पकडऩे का दावा किया है। यह एक ऐसा मामला था जिस पर देश में इतना बवाल मचा था कि राष्ट्रपति आईजन हावर तक ने इसमें रोज घटनाक्रम से वाकिफ करवाने की ताकीद की थी। यह वह व्यक्ति था, जिसके पास घटना के समय कहीं और मौजूद होने का सुबूत था, लेकिन आज 54 साल बाद वह सुबूत पुलिस को झूठा साबित होता लग रहा है। एक और अहम घटना में नोबल पुरस्कार विजेता मशहूर साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे की आत्महत्या के बारे में यह दावा किया जा रहा है कि एफबीआई ने उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर किया। उनकी आत्महत्या पर पहले यह माना जा रहा था कि एक साहित्यकार के रूप में अपनी प्रतिभा चुक जाने की हताशा में उन्होंने आत्महत्या की। अब उनके एक करीबी दोस्त ने लिखा है कि किस तरह उन्हें लगातार अपने घर, अपनी कार तक के, एफ बी आई द्वारा "बग" किए जाने का शक था, वह इतने डरे हुए रहते थे कि अपने दिल की बात अपने दोस्त से कहने के लिए दूसरे किसी की कार में सफर करते थे। कहने की बात यह है कि किसी घटना से जुड़े बहुत से पहलू हो सकते हंै,जिनकी जांच के लिए हर देश में एक तंत्र होता है, उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए एक अलग व्यवस्था होती है, जनता को इन दोनों की राय से अपनी असहमति जताने का हक है, लेकिन उसका एक तरीका है। उसके लिए भी एक व्यवस्था है। इस तरह आमराय के आधार पर फैसला सुनाना, लोकप्रिय भावनाओं का ज़ोर दिखाकर किसी व्यवस्था पर उंगली उठना, वह भी देश के जिम्मेदार समझे जाने वाले लोगों के द्वारा, बहुत डरावना है।
हमने बिनायक सेन के मामले में भी यही लिखा था, जब देश के बड़े-बड़े कानूनविद् तक निचली अदालत के फैसले के खिलाफ टीका कर रहे थे, और आज भी, जब देश में कानून के बड़े जानकार समझे जाने वाले मारिया सुसाईराज को कथित रूप से सस्ते में छोड़ दिया बता रहे हैं, तब भी हम यही लिखना चाह रहे हंै कि समाज को ऐसे मामलों में मीडिया के साथ नहीं जुड़ जाना चाहिए, क्योंकि एक घटना के सारे पहलुओं को तलाशना, और उसमें से खबर पैदा करना मीडिया का काम है, उसके बाजार में जिंदा रहने के लिए यह उसकी मजबूरी कही जाए या जरूरत, पर यह उसके पेशे का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, लेकिन नीरज ग्रोवर हत्याकांड पर फैसले पर टिप्पणी करते हुए देश के नामी वकीलों रामजेठमलानी और मुकुल रोहतगी जैसे लोग जब एक कानूनी फैसले पर खुले आम अखबारों में सवाल उठाएं, तो यह सोचने पर मजबूर हो जाना पड़ता है कि कभी खुद भी इसी कानूनी व्यवस्था में अहम् जिम्मेदार पदों पर बैठ चुके इन लोगों में, खुद इस व्यवस्था के लिए कितना सम्मान है। इस तरह के बयान एक व्यवस्था के खिलाफ देश में अराजक, लोकलुभावनी बातों के पीछे दौडऩे की मानसिकता को ही बढ़ावा नहीं देते, यह उस अदालत का भी सीधे-सीधे अपमान करते हंै जिसके फैसले पर यह सब टिप्प्णियां अदालत से बाहर सार्वजनिक क्षेत्र में अपने नाम के साथ की जा रही है।
अगर किसी अदालती फैसले से असहमति है तो उसके खिलाफ अपील के लिए राष्ट्रपति तक जाने की लंबी सुविधा इस देश में हासिल है ,और अब हम देविन्दर पाल भुल्लर के मामले में तो देख रहे हंै कि जिम्मेदार संगठन उस फैसले को भी चुनौती दे रहे हंै। शाहबानो मामले में हमने देखा कि किस तरह देश की संसद ने अपनी संवैधानिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति को और कमजोर करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलट डाला था। जब एक फैसले के खिलाफ खड़े होने के इतने वैध मंच उपलब्ध हंै, तो इंटरनेट पर मिल रही आजादी का गलत इस्तेमाल एक अदालत के जज की काबीलियत की टीका करने के लिए क्यों किया जा रहा है? पुलिस ने अपनी तरफ से यह मामला सुलझाते हुए, अपनी क्षमता के मुताबिक सुबूत जुटाकर अदालत के सामने रखे, और संबंधित जज ने मामले के तमाम पहलुओं पर विचार कर के अपना फैसला सुनाया। अगर इस तरह सुर्खियां बटोरने के लिए अदालती फैसलों पर टिप्पणिया की जाएंगी, किसी मामले में पुलिस की काबीलियत पर इस तरह सवाल उठाए जाएंगे तो यह दोनों एजेंसियां किस हौसले से अपना काम कर पाएंगी ? या फिर वह भी जनता की भावनाओं के दबाव में आकर अपना काम करेंगी? पुलिस ने कई बार ऐसा किया भी है, लेकिन जिस दिन अदालतों को इसके लिए मजबूर किया जाएगा, इंसाफ क्या केवल उन्हीं लोगों के हाथों का खिलौना नहीं बन जाएगा, जिन्हें इंटरनेट पर, पेज -3 पर अपनी राय जाहिर करके पूरे देश को एक खास दिशा में हकालने की सहूलियत मिली हुई है ? उस दिन अदालतों की जरूरत ही क्या रहेगी? कंगारू अदालतें लगाकर विशेष सलाहकारों से पूछकर,आम जनता की राय पर ही फैसला कर दिया जाएगा। हमारे यहां ऐसे भी मामले हुए हैं, जब आम राय ने अदालतों को दबंग लोगों के खिलाफ सख्त होने की प्रेरणा दी है, लेकिन उन्हें मजबूर नहीं किया, लेकिन अब मारिया के मामले में लग रहा है कि मीडिया की अदालतों के जमाने से आगे बढ़कर हम इंटरनेट की अदालतों तक पहुंच गए हंै, जहां तक देश के कुछ थोड़े से चुनिंदा अभिजात लोग अपनी अंदरूनी प्रवृत्तियों से मजबूर होकर, एक बड़ी, कच्ची उम्र की आबादी को एक खतरनाक दिशा में मोड़ रहे हंै। क्या यह लोग अदालती अवमानना के दोषी नहीं हंै? आज जब हमें मजबूर होकर साईबर सुरक्षा, आई टी के कानून बनाने पड़े हंै तब क्या इंटरनेट पर कही जा रही बातों को भी अदालती अवमानना के कायदों के दायरे में लाने के दिन आ गए हंै ? बात वहीं आ कर अटकती है कि इस तरह फैसले सुनाने बैठे लोगों के पास उस वक्त क्या जवाब होगा, जब ऐसी कोई बात सामने आए, जैसी मरिया रुडाल्फ की हत्या के जुर्म में आज 54 साल बाद पकड़ाए इंसान के बारे सामने आई है। आज जब कानून एक जुर्म करने के लिए पकड़ाए इंसान को उसका आखिरी मौका तक देने के लिए बरसों बरस की मोहलत देता है। कानूनी व्यवस्था और संविधान में दिए गए रास्ते अपनाए बिना एक अदालत और पुलिस को इस तरह कोसना पूरी तरह गलत और गैर जिम्मेदाराना है। हां, नीरज ग्रोवर पर हुए फैसले का यह अहसान देश पर रहा कि उसने इन बुद्धिजीवियों का दोगलापन उजागर कर दिया है,जो कभी तो महिलाओं के मान सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करते हंै, और आज इनके ही द्वारा और इनके ही कारण मारिया सुसाईराज के बारे में जितनी तरह की हो सकती हैं, अपमानजनक बातें इंटरनेट पर हो रही हैं। यह वही तबका है, जो निचली अदालत द्वारा बिनायक सेन को सजा देने पर हल्ला मचाता हुए कहता है कि सजा क्यों दी,और आज मारिया छूट गई है तो यही तबका कह रहा है कि मारिया को छोड़ा क्यों?
हाँ ,अब लगता है की इंटरनेट पर लोगों द्वारा कही जा रही अनर्गल बातें /बातों को अदालती अवमानना के दायरे में लाने का.क्योंकि कुछ लोग बगेर सबूत/साक्च्य के इंटरनेट पर सुर्ख़ियों में रहने के लालच में गलत बयानी/टिप्पणी कर रहे हैं .
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