4 सितंबर 2011
इंटरनेट पर विकीलीक्स के भांडाफोड़ से दुनिया के देशों और लोगों के रिश्ते खतरे में पड़ रहे हैं। खासकर, अमरीका के साथ जिन लोगों का बर्ताव रहा है या आज भी जिनको अमरीकी राजदूतों और उनसे नीचे के राजनयिकों से बात करनी होती है, या अमरीकी सरकार से किसी भी किस्म का लेना-देना रहता है वे लोग बुरी तरह से हिले हुए हैं। जिसने अमरीकी सरकार के किसी भी प्रतिनिधि से कोई भी अनौपचारिक बात की हो वह अमरीकी दूतावास के अफसरों की खुफिया रिपोर्ट की शक्ल में अब इंटरनेट पर इस सहूलियत के साथ मौजूद है कि उसमें से किसी एक शब्द को भी आसानी से ढूंढा जा सकता है।
इस अखबार के संपादक जैसे देश में दसियों हजार लोग हैं जो किसी-किसी ऐसे पेशे में हैं कि अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि जब उनके शहर में जाते हैं तो उनके इलाके की जानकारी पाने के लिए उनसे एक शिष्टाचार की मुलाकात करते हैं और अनौपचारिक चर्चा करते हैं। अब वैसी अनौपचारिक चर्चा विकीलीक्स तक पहुंची हुई ईमेल की शक्ल में हर किसी को हासिल है। विकीलीक्स का यह काम अच्छा है या बुरा, नैतिक है या अनैतिक, कानूनी है या जुर्म है यह एक बाद की बात है, पहली बात तो यह है कि अमरीकी सरकार के किसी से भी की गई बातचीत अब सुरक्षित नहीं है और सब कुछ खतरे में है। विकीलीक्स का अमरीका की सरकार से सारा तनाव आपस का है, उसमें किसी दूसरे देश की साजिश की बात अमरीका भी नहीं करता। जब पिछले बरस यह भांडाफोड़ शुरू हुआ तो अमरीकी सरकार ने इसके खिलाफ यह तर्क दिया कि अमरीकी फौजी कार्रवाई के बारे में खुफिया बातें उजागर हो जाने से अफगानिस्तान से लेकर ईरान और पाकिस्तान तक तैनात अमरीकी सैनिक खतरे में पड़ जाएंगे। हम इस बात को पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं मानते, और हो सकता है कि अमरीका के लिए इससे बहुत बड़े खतरे खड़े हुए हों, लेकिन यह पूरा सिलसिला खुद अमरीका की साजिशों से उपजा हुआ है और अपनी तमाम ताकत के बावजूद अगर वह अपनी खुफिया जानकारी को सम्हालकर नहीं रख पा रहा है तो फिर उसे दुनिया के लोगों से अनौपचारिक चर्चा करने और उसे रिकॉर्ड में लाने का क्या हक है? जिस तरह किसी बैंक में कोई खाता खोले और फिर वहां सेंधमारी करके कोई जालसाजी कर ले तो उसके लिए खातेदार नहीं, बैंक जिम्मेदार होता है, उसी तरह अगर राहुल ने, अडवानी ने या किसी और बंद कमरे के भरोसे में किसी अमरीकी से अनौपचारिक बातचीत में कुछ कहा है तो उसके उजागर होने की पूरी जिम्मेदारी अमरीका पर है। आज दुनिया के सबसे ताकतवर दबंग की शक्ल में वह अभी भी शर्मिंदगी जाहिर करने के बजाए विकीलीक्स के मुखिया के खिलाफ अलग-अलग देशों में कई किस्म के संदिग्ध मामलों में कार्रवाई करवाने के पीछे लगा दिख रहा है।
यह बात अखबारनवीसों के बीच कम ही सुनाई पड़ती है कि किसी ने भरोसे में कुछ कहा और अखबारनवीस ने उसे लिख दिया हो। कभी-कभी ऐसा होता है लेकिन अगर ऐसा लगातार भी होते चले तो अखबार वालों से कोई किस भरोसे पर, न छापने की शर्त वाली बातें करेगा? वैसे तो इस जिम्मेदारी के बावजूद हम यह नहीं मानते कि अमरीका ने जानबूझकर ऐसी कोई लीक करवाई हो क्योंकि इससे उसी की बदनामी सबसे अधिक हुई है। और यह मामला कुछ उस तरह का है जैसा कि अमर सिंह के फोन को फर्जी आदेश से टेप करवाया गया और बाद में उस रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किया गया। विकीलीक्स के पास अमरीकी सरकार के जितने खुफिया और गोपनीय दस्तावेज आए हैं और जिनमें से वह दसियों लाख को अब तक जारी कर चुका है, उन सबसे अमरीकी सरकार की शर्मिंदगी तो शर्तिया हो रही है, लेकिन उससे किसी का कोई भला हो रहा है, या नुकसान के मुकाबले नफा अधिक हो रहा है ऐसा अंदाज लगाना हमारे लिए अभी मुश्किल है। दुनिया का व्यापक जनहित तो यह कहता है कि ऐसे तमाम भांडाफोड़ होते चलना चाहिए क्योंकि इन्हीं से सरकारों की साजिशें उजागर हो सकती हैं। लेकिन हमारा यह भी मानना है कि सरकार की कार्रवाई से परे की और साजिशों से परे की, दुनिया भर की अनौपचारिक बातचीत को भी इस भांडाफोड़ में शामिल कर लेने से सभ्य समाज में एक-दूसरे से अनौपचारिक बातचीत करने का सिलसिला टूटने लगेगा। इसलिए हम विकीलीक्स से उजागर हुई बातों को लेकर आज यहां पर कुछ नहीं लिख रहे हैं क्योंकि उनमें से अधिकतर बातें अमरीकी दूतावास द्वारा भारत से अमरीका में अपनी सरकार को लिखी गई बातें हों और वे कितनी सच हैं, कितनी झूठ यह क्या पता? दुनिया भर में गलत बात को फैलाकर उससे शक फैलाने, लोगों को नुकसान पहुंचाने का हथियार बहुत समय से इस्तेमाल होते आया है, इसलिए हम विकीलीक्स को खरा और भारत के नेताओं को खोटा एकदम से नहीं मानेंगे। बिना सुबूत के किसी के बारे में यह लिखना कि ऐसा उसने कहा था, इसे सुबूत मान लेना ठीक नहीं होगा। लेकिन पढऩे के लिए यह दिलचस्प तो है ही कि भारत के लोगों ने अमरीकी सरकार के लोगों से क्या-क्या कहा हो सकता है।
इंटरनेट पर विकीलीक्स के भांडाफोड़ से दुनिया के देशों और लोगों के रिश्ते खतरे में पड़ रहे हैं। खासकर, अमरीका के साथ जिन लोगों का बर्ताव रहा है या आज भी जिनको अमरीकी राजदूतों और उनसे नीचे के राजनयिकों से बात करनी होती है, या अमरीकी सरकार से किसी भी किस्म का लेना-देना रहता है वे लोग बुरी तरह से हिले हुए हैं। जिसने अमरीकी सरकार के किसी भी प्रतिनिधि से कोई भी अनौपचारिक बात की हो वह अमरीकी दूतावास के अफसरों की खुफिया रिपोर्ट की शक्ल में अब इंटरनेट पर इस सहूलियत के साथ मौजूद है कि उसमें से किसी एक शब्द को भी आसानी से ढूंढा जा सकता है।
इस अखबार के संपादक जैसे देश में दसियों हजार लोग हैं जो किसी-किसी ऐसे पेशे में हैं कि अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि जब उनके शहर में जाते हैं तो उनके इलाके की जानकारी पाने के लिए उनसे एक शिष्टाचार की मुलाकात करते हैं और अनौपचारिक चर्चा करते हैं। अब वैसी अनौपचारिक चर्चा विकीलीक्स तक पहुंची हुई ईमेल की शक्ल में हर किसी को हासिल है। विकीलीक्स का यह काम अच्छा है या बुरा, नैतिक है या अनैतिक, कानूनी है या जुर्म है यह एक बाद की बात है, पहली बात तो यह है कि अमरीकी सरकार के किसी से भी की गई बातचीत अब सुरक्षित नहीं है और सब कुछ खतरे में है। विकीलीक्स का अमरीका की सरकार से सारा तनाव आपस का है, उसमें किसी दूसरे देश की साजिश की बात अमरीका भी नहीं करता। जब पिछले बरस यह भांडाफोड़ शुरू हुआ तो अमरीकी सरकार ने इसके खिलाफ यह तर्क दिया कि अमरीकी फौजी कार्रवाई के बारे में खुफिया बातें उजागर हो जाने से अफगानिस्तान से लेकर ईरान और पाकिस्तान तक तैनात अमरीकी सैनिक खतरे में पड़ जाएंगे। हम इस बात को पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं मानते, और हो सकता है कि अमरीका के लिए इससे बहुत बड़े खतरे खड़े हुए हों, लेकिन यह पूरा सिलसिला खुद अमरीका की साजिशों से उपजा हुआ है और अपनी तमाम ताकत के बावजूद अगर वह अपनी खुफिया जानकारी को सम्हालकर नहीं रख पा रहा है तो फिर उसे दुनिया के लोगों से अनौपचारिक चर्चा करने और उसे रिकॉर्ड में लाने का क्या हक है? जिस तरह किसी बैंक में कोई खाता खोले और फिर वहां सेंधमारी करके कोई जालसाजी कर ले तो उसके लिए खातेदार नहीं, बैंक जिम्मेदार होता है, उसी तरह अगर राहुल ने, अडवानी ने या किसी और बंद कमरे के भरोसे में किसी अमरीकी से अनौपचारिक बातचीत में कुछ कहा है तो उसके उजागर होने की पूरी जिम्मेदारी अमरीका पर है। आज दुनिया के सबसे ताकतवर दबंग की शक्ल में वह अभी भी शर्मिंदगी जाहिर करने के बजाए विकीलीक्स के मुखिया के खिलाफ अलग-अलग देशों में कई किस्म के संदिग्ध मामलों में कार्रवाई करवाने के पीछे लगा दिख रहा है।
यह बात अखबारनवीसों के बीच कम ही सुनाई पड़ती है कि किसी ने भरोसे में कुछ कहा और अखबारनवीस ने उसे लिख दिया हो। कभी-कभी ऐसा होता है लेकिन अगर ऐसा लगातार भी होते चले तो अखबार वालों से कोई किस भरोसे पर, न छापने की शर्त वाली बातें करेगा? वैसे तो इस जिम्मेदारी के बावजूद हम यह नहीं मानते कि अमरीका ने जानबूझकर ऐसी कोई लीक करवाई हो क्योंकि इससे उसी की बदनामी सबसे अधिक हुई है। और यह मामला कुछ उस तरह का है जैसा कि अमर सिंह के फोन को फर्जी आदेश से टेप करवाया गया और बाद में उस रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किया गया। विकीलीक्स के पास अमरीकी सरकार के जितने खुफिया और गोपनीय दस्तावेज आए हैं और जिनमें से वह दसियों लाख को अब तक जारी कर चुका है, उन सबसे अमरीकी सरकार की शर्मिंदगी तो शर्तिया हो रही है, लेकिन उससे किसी का कोई भला हो रहा है, या नुकसान के मुकाबले नफा अधिक हो रहा है ऐसा अंदाज लगाना हमारे लिए अभी मुश्किल है। दुनिया का व्यापक जनहित तो यह कहता है कि ऐसे तमाम भांडाफोड़ होते चलना चाहिए क्योंकि इन्हीं से सरकारों की साजिशें उजागर हो सकती हैं। लेकिन हमारा यह भी मानना है कि सरकार की कार्रवाई से परे की और साजिशों से परे की, दुनिया भर की अनौपचारिक बातचीत को भी इस भांडाफोड़ में शामिल कर लेने से सभ्य समाज में एक-दूसरे से अनौपचारिक बातचीत करने का सिलसिला टूटने लगेगा। इसलिए हम विकीलीक्स से उजागर हुई बातों को लेकर आज यहां पर कुछ नहीं लिख रहे हैं क्योंकि उनमें से अधिकतर बातें अमरीकी दूतावास द्वारा भारत से अमरीका में अपनी सरकार को लिखी गई बातें हों और वे कितनी सच हैं, कितनी झूठ यह क्या पता? दुनिया भर में गलत बात को फैलाकर उससे शक फैलाने, लोगों को नुकसान पहुंचाने का हथियार बहुत समय से इस्तेमाल होते आया है, इसलिए हम विकीलीक्स को खरा और भारत के नेताओं को खोटा एकदम से नहीं मानेंगे। बिना सुबूत के किसी के बारे में यह लिखना कि ऐसा उसने कहा था, इसे सुबूत मान लेना ठीक नहीं होगा। लेकिन पढऩे के लिए यह दिलचस्प तो है ही कि भारत के लोगों ने अमरीकी सरकार के लोगों से क्या-क्या कहा हो सकता है।
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