पड़ोसी और अपना घर...

6 सितंबर 2011
बांग्लादेश के साथ पानी के बंटवारे को लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने कुछ महीनों के अमन-चैन के बाद एक बार फिर अपने तेवर दिखाए हैं। केन्द्र की मनमोहन सरकार में ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस भागीदार तो है, लेकिन जब बंगाल के हितों की बात आती है तो ममता को न तो यूपीए में अपनी हिस्सेदारी दिखती है, और न ही उन्हें हिन्दुस्तान के विदेश-हित दिखते हंै। सच तो यह है कि ममता जैसी तेवर वाले लोग किसी दूसरी देश के साथ रिश्तों में बहुत बड़े हिस्सेदारी के लायक भी नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में जिस तरह एक नफीस अंदाज में बातें होती हैं, ममता के तेवर उससे बिल्कुल अलग हैं। हमारी याद में यह पहला मौका होता जब भारत का प्रधानमंत्री देश के पांच मुख्यमंत्रियों को लेकर इस तरह एक पड़ोसी देश गया होता, लेकिन कल ममता ने जिस तरह बांग्लादेश को अधिक पानी देने का विरोध किया, उससे यूपीए सरकार का प्रतिनिधिमंडल कुछ फीका पड़ सकता है।
लेकिन हम इस मुद्दे के दो-तीन अलग-अलग पहलुओं पर बात करना चाहते हैं। पड़ोस के, या दूर के भी, देशों के साथ रिश्ते रखते हुए देश के भीतर के एक प्रदेश के नेता की सोच से कुछ अलग सोच से भी काम लेना होता है। फिर यह भी कि किसी देश से लेन और देन हर बार नफे का दिखे, ऐसा भी जरूरी नहीं होता। कई बार किसी तीसरी देश की जेब में जाती हुई किसी देश को अपने साथ बनाए रखने के लिए भी किसी दलवाले, प्रांतीय दल के नेताओं से देश के साथ रियायत करनी पड़ती है। अब जिसे मान लें कि श्रीलंका या बांग्लादेश चीन के साथ जा रहे हों, तो उस हाल में भारत के लिए अपनी सरहद के इस तरफ भी फौजी तैयारियां कुछ अलग किस्म की करनी पड़ेंगी। और वह नौबत इस देश पर दसियों हजार करोड़ का बोझ बनकर आ सकती है। ऐसे में इन पड़ोसी देशों  को कुछ नर्मी दिखाकर, उनका कुछ फायदा करके भी भारत फायदे में रहेगा। लेकिन एक राज्य की नेतागिरी को ही सब कुछ मानकर चलने वाले नेताओं को यह बात खुले शब्दों में समझाई नहीं जा सकती। ऐसे में एक बार फिर गठबंधन सरकारों के खतरे का यह एक तर्क दिखता है कि उनकी सोच सीमित होती है। ऐसे में यह भी लगता है कि जिस तरह पड़ोस के देशों के साथ घाटा झेलकर भी अच्छे रिश्ते रखना बेहतर होता है। उसी तरह गठबंधन के साथी दलों को भी रियायतें देकर उनसे रिश्ते ठीक रखना जरूरी होता है। इस तरह का छोटा तनाव श्रीलंका के तमिलों पर हुई हिंसा को लेकर डीएमके की तरफ से यूपीए पर पिछले बरसों में रहा भी है। लेकिन अपने कुकर्मों से लड़े हुए डीएमके की अधिक बोलती नहीं थी, ममता की पार्टी के साथ वैसा कोई अपराधबोध नहीं जुड़ा हुआ इसलिए वह जब चाहे तब केन्द्र की गठबंधन सरकार को आंखें दिखाती रहती हैं।
कूटनीति के जानकार लोगों का मानना है कि भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों में गरमाहट की जरूरत को अनदेखा किया है। जिस बांग्लादेश को भारत ने बनाया, उस बांग्लादेश के बारे में आज का समझदार माना जाने वाला हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री अगर लापरवाह भाषण देता है, तो यह लापरवाही हिन्दुस्तान की प्राथमिकता भी बताती है। पिछले दिनों मनमोहन सिंह ने जिस तरह बांग्लादेश की आबादी के एक बड़े हिस्से को कट्टरपंथी बता दिया था, उसे लेकर भारत को माफी भी मांगनी पड़ी और शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी। ऐसा अमरीका के साथ तो भारत नहीं कर सकता था।
दरअसल पांच-पांच मुख्यमंत्रियों को साथ लेकर जाने की सोच बहुत महत्वाकांक्षा ही थी और है। इन राज्यों में से कुछ तो ऐसे हैं जो कि बांग्लादेश से लगे हुए हैं। और इन राज्यों को ममता की तरह अपने वोटरों को यह भी दिखाना है कि वे बांग्लादेश के हाथों अपने राज्य के हित बेचकर नहीं आई हैं। अभी हम यह नहीं सोच पा रहे हैं कि इतने मुख्यमंत्रियों को सरहद पार के दूसरे देश साथ ले जाना केन्द्र सरकार का सही फैसला था या नहीं। लेकिन विदेश-संबंध केन्द्र सरकार के दायरे की बात है और उसे लेकर अगर केन्द्र और राज्य के बीच दरार दिखे, तो यह ठीक नहीं है। सोनिया के मौजूद न रहने पर यूपीए के साथी घटक दलों के बीच एक बड़ी संवेदन शून्यता बनकर उभरी है। ममता यूपीए की एक बड़ी घटकों में से एक हैं। अत: सरकार को खुद होकर उनके साथ बात करनी थी। खुद अपने साथियों को विश्वास में लिए बिना मनमोहन की इस यात्रा ने एक तरह से सार्वजनिक शर्मिंदगी पैदा कर दी है। हम इसे केन्द्र के सत्तारूढ़ गठबंधन की जिम्मेदारी मानते हैं कि वह अपने साथियों को समझाकर, उन्हें विश्वास में लेकर ही उनसे जुड़े मुद्दों पर दूसरे देशों से बात करे। लेकिन जब राज्यों को इस तरह साथ रखा जाएगा, तो उसे कई दिक्कतें भी होंगी। क्षेत्रीय दलों की सोच में आज की अंतरराष्ट्रीय समझ आसानी से नहीं आ सकती।
हम बांग्लादेश सहित तमाम पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्तों की सिफारिश करते हैं। भारत के साथ बांग्लादेश का यह खास रिश्ता और है कि  वहां से आकर भारत में बसे हुए लोग ही करोड़ों में हैं। और इन लोगों को लेकर यूपीए सरकार को हिन्दू ताकतों के हमले लगातार झेलने पड़ते हैं। इनमें से अधिकतर या तकरीबन सभी लोग मुस्लिम हैं, और हिन्दू पार्टियों को लगता है कि वे चुनाव में गैर-हिन्दू पार्टियों के काम आते हैं। बांग्लादेश भारत से छोटा देश है, इसलिए वह कुछ अधिक रियायतें चाह सकता है, उसे भारत की हार नहीं माननी चाहिए, और न ही नुकसान। 1971 से लेकर अब तक इन देशों ने बहुत अच्छे रिश्ते भी देखे हैं, और हम और बेहतर की उम्मीद करते हैं।

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