3 सितंबर 2011
अन्ना हजारे की टीम के लोगों पर सरकार की कार्रवाई के बारे में कल ही हमने यहां लिखा था और आज उससे जुड़ा हुआ एक ऐसा दूसरा मामला सामने आया है जिसमें देश की संसद ने इस टीम के एक प्रमुख सदस्य, देश के एक बड़े और चर्चित वकील प्रशांत भूषण को विशेषाधिकार हनन का नोटिस भेजा है। संसद के कुछ सदस्यों का यह मानना है कि प्रशांत भूषण ने संसद और सांसदों के बारे में अपमानजनक बातें कही हैं। दूसरी तरफ तुषार गांधी जैसे कुछ दूसरे जागरूक लोगों का यह भी मानना है कि दो दिन पहले अपनी टोली के अरविन्द केजरीवाल को आयकर विभाग से मिले एक वसूली के नोटिस के जवाब में अन्ना हजारे ने जिस जुबान में सरकार को गालियां दी हैं, वह जुबान सही नहीं है। ऐसे में ही एक अलग खबर यह बताती है कि अन्ना हजारे के बारे में कांगे्रस के जिस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने बहुत ही ओछी जुबान में गालियां सी दी थीं, और बाद में अन्ना के अनशन को खत्म करवाने के लिए की गई कोशिशों में से एक, मनीष तिवारी की माफी, के बाद अब कांगे्रस एक जिद पर अड़ी हुई सी मनीष तिवारी को लोकपाल पर संसद की कमेटी में बनाए रख रही है।
इन कुछ बातों को मिलाकर हम यहां यह सोचना चाह रहे हैं कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे लोगों के अपने मान-अपमान के हक के बीच बात कहां पर आकर टिकनी चाहिए? जिस तरह एक तराजू के दो पलड़ों के बीच एक संतुलन के बिना कुछ नापा-तौला नहीं जा सकता, उसी तरह अभिव्यक्ति और सम्मान के बीच अगर एक संतुलन न रहे, बोलने के हक और अपनी इज्जत के बीच संतुलन न रहे तो यह लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि तराजू में जिस तरह एक कांटा संतुलन को बता देता है, लोकतांत्रिक समाज में वैसा कांटा न होकर अधिकार और जिम्मेदारी के बीच एक बड़ा फैला हुआ सा सलेटी फासला होता है जिसमें काले और सफेद की कोई विभाजन रेखा नहीं होती। अलग-अलग देश के रीति-रिवाज, वहां की संस्कृति-सभ्यता, वहां की जुबान के आधार पर वहां के हक और वहां की जिम्मेदारी को तय करने का काम ऐसे सलेटी फासले के बीच होता है। हम मोटेतौर पर इन दोनों बातों के बीच थोड़ी-थोड़ी सी सावधान बरतने के हिमायती रहते हैं। लोगों के जो अधिकार हैं उनके तहत बोलते हुए अगर लोग अपनी बात के साथ खड़े हुए सुबूतों पर भी एक नजर डाल लें, अपनी जुबान पर थोड़ा सा ध्यान दे दें तो अपमान की सीमा तक पहुंचने के पहले ही लोगों की बात थम सकती है। हमारा यह मानना है और चूंकि हम रात-दिन लिखने के ही पेशे में हैं इसलिए हमारा यह लंबा अनुभव भी रहा है कि भारत का कानून लोगों को सच बात कहने और अपने विचार खुलकर सामने रखने की जरूरत से शायद थोड़ी अधिक ही, आजादी देता है। इसके बाद भी अगर कोई अदालत में या संसद-विधानसभा में अवमानना का कुसूरवार पाया जाता है तो ऐसे अधिकतर मामलों में ऐसे लोग कुसूरवार होते भी हैं। आमतौर पर कानून और नियम बोलने वालों को काफी रियायत देते हैं। ऐसे में हम अभी इस बात पर नहीं जा रहे कि प्रशांत भूषण की कही हुई बातें संसद या सांसदों की बेइज्जती करती हैं या नहीं, हम संसद में कागज या जमीन पर होने वाले तर्क-वितर्क को दिलचस्पी से देखेंगे। लेकिन एक दूसरी बात जो हमें खटकती है वह यह कि संसद और विधानसभाएं अपने आचरण और अपने सदस्यों के आचरण को लेकर उतना कुछ नहीं कर रही हैं जितना कि उन्हें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के तहत करना चाहिए। आज दिक्कत यह है कि भारतीय लोकतंत्र में किसी सांसद या विधायक का बर्ताव अगर उसके सदन का अपमान करने वाला है तो भी उस पर देश की जनता सदन के अपमान का नोटिस किसी को नहीं दे सकती जबकि वह सदन देश की जनता के प्रतिनिधि के रूप में ही बनाया गया है और उसे उसी रूप में काम करना चाहिए। जब अपने चुने हुए सदन के आचरण के खिलाफ अपने चुने हुए सांसद या विधायक काम करते हैं और जनता उनका कुछ भी नहीं कर पाती तो फिर उसकी भड़ास शायद उसी तरह निकलती है जिस तरह अभी किसी टीवी चैनल की बहस में प्रशांत भूषण की निकली है या कुछ दिन पहले रामलीला मैदान के मंच से सांसदों के बारे में किरण बेदी की भड़ास निकली थी। हमारा यह मानना है कि समाज के जिस तबके को भी किसी किस्म के विशेषाधिकार मिले हैं उसे अपने अधिकारों से अधिक फिक्र अपनी जिम्मेदारियों की भी करनी चाहिए। हम पूरी संसद को भ्रष्ट या सभी सांसदों को भ्रष्ट कहने के बजाय यह याद दिलाना चाहेंगे कि एक स्टिंग ऑपरेशन के मार्फत कुछ सांसद भ्रष्ट पकड़ाए जा चुके हैं, देश में जगह-जगह कई सांसद बदसलूकी करते पाए जाते हैं, कुछ सांसद उन्हें मिले मकानों के बेजा इस्तेमाल में पकड़ाते हैं और कई सांसद सांसद-निधि को जारी करने में भ्रष्टाचार करने के लिए भी जाने जाते हैं। इसलिए आज प्रशांत भूषण या किरण बेदी को संसद द्वारा दिए गए नोटिसों के साथ शायद भारत की आम जनता की हमदर्दी नहीं होगी। अदालत हो या संसद-विधानसभा, विशेषाधिकार या अवमानना के कानून का हकदार बनकर दिखाना भी यहां की कुर्सियों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है और आज हम इस जिम्मेदारी में भारी सुधार की गुंजाइश दिखती है।
इस तरह हम आज दोनों पक्षों से अपने-अपने अधिकारों के इस्तेमाल में सावधानी बरतने और अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को न्यूनतम से चार कदम अधिक चलकर पूरा करने की उम्मीद करते हैं, वही बात लोकतंत्र होगी, वही बात संसदीय परिपवक्ता होगी। इज्जत का हकदार बनकर दिखाना जरूरी होता है, बजाय किसी कानून के तहत इज्जत का दावा करने के।
अन्ना हजारे की टीम के लोगों पर सरकार की कार्रवाई के बारे में कल ही हमने यहां लिखा था और आज उससे जुड़ा हुआ एक ऐसा दूसरा मामला सामने आया है जिसमें देश की संसद ने इस टीम के एक प्रमुख सदस्य, देश के एक बड़े और चर्चित वकील प्रशांत भूषण को विशेषाधिकार हनन का नोटिस भेजा है। संसद के कुछ सदस्यों का यह मानना है कि प्रशांत भूषण ने संसद और सांसदों के बारे में अपमानजनक बातें कही हैं। दूसरी तरफ तुषार गांधी जैसे कुछ दूसरे जागरूक लोगों का यह भी मानना है कि दो दिन पहले अपनी टोली के अरविन्द केजरीवाल को आयकर विभाग से मिले एक वसूली के नोटिस के जवाब में अन्ना हजारे ने जिस जुबान में सरकार को गालियां दी हैं, वह जुबान सही नहीं है। ऐसे में ही एक अलग खबर यह बताती है कि अन्ना हजारे के बारे में कांगे्रस के जिस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने बहुत ही ओछी जुबान में गालियां सी दी थीं, और बाद में अन्ना के अनशन को खत्म करवाने के लिए की गई कोशिशों में से एक, मनीष तिवारी की माफी, के बाद अब कांगे्रस एक जिद पर अड़ी हुई सी मनीष तिवारी को लोकपाल पर संसद की कमेटी में बनाए रख रही है।
इन कुछ बातों को मिलाकर हम यहां यह सोचना चाह रहे हैं कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे लोगों के अपने मान-अपमान के हक के बीच बात कहां पर आकर टिकनी चाहिए? जिस तरह एक तराजू के दो पलड़ों के बीच एक संतुलन के बिना कुछ नापा-तौला नहीं जा सकता, उसी तरह अभिव्यक्ति और सम्मान के बीच अगर एक संतुलन न रहे, बोलने के हक और अपनी इज्जत के बीच संतुलन न रहे तो यह लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि तराजू में जिस तरह एक कांटा संतुलन को बता देता है, लोकतांत्रिक समाज में वैसा कांटा न होकर अधिकार और जिम्मेदारी के बीच एक बड़ा फैला हुआ सा सलेटी फासला होता है जिसमें काले और सफेद की कोई विभाजन रेखा नहीं होती। अलग-अलग देश के रीति-रिवाज, वहां की संस्कृति-सभ्यता, वहां की जुबान के आधार पर वहां के हक और वहां की जिम्मेदारी को तय करने का काम ऐसे सलेटी फासले के बीच होता है। हम मोटेतौर पर इन दोनों बातों के बीच थोड़ी-थोड़ी सी सावधान बरतने के हिमायती रहते हैं। लोगों के जो अधिकार हैं उनके तहत बोलते हुए अगर लोग अपनी बात के साथ खड़े हुए सुबूतों पर भी एक नजर डाल लें, अपनी जुबान पर थोड़ा सा ध्यान दे दें तो अपमान की सीमा तक पहुंचने के पहले ही लोगों की बात थम सकती है। हमारा यह मानना है और चूंकि हम रात-दिन लिखने के ही पेशे में हैं इसलिए हमारा यह लंबा अनुभव भी रहा है कि भारत का कानून लोगों को सच बात कहने और अपने विचार खुलकर सामने रखने की जरूरत से शायद थोड़ी अधिक ही, आजादी देता है। इसके बाद भी अगर कोई अदालत में या संसद-विधानसभा में अवमानना का कुसूरवार पाया जाता है तो ऐसे अधिकतर मामलों में ऐसे लोग कुसूरवार होते भी हैं। आमतौर पर कानून और नियम बोलने वालों को काफी रियायत देते हैं। ऐसे में हम अभी इस बात पर नहीं जा रहे कि प्रशांत भूषण की कही हुई बातें संसद या सांसदों की बेइज्जती करती हैं या नहीं, हम संसद में कागज या जमीन पर होने वाले तर्क-वितर्क को दिलचस्पी से देखेंगे। लेकिन एक दूसरी बात जो हमें खटकती है वह यह कि संसद और विधानसभाएं अपने आचरण और अपने सदस्यों के आचरण को लेकर उतना कुछ नहीं कर रही हैं जितना कि उन्हें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के तहत करना चाहिए। आज दिक्कत यह है कि भारतीय लोकतंत्र में किसी सांसद या विधायक का बर्ताव अगर उसके सदन का अपमान करने वाला है तो भी उस पर देश की जनता सदन के अपमान का नोटिस किसी को नहीं दे सकती जबकि वह सदन देश की जनता के प्रतिनिधि के रूप में ही बनाया गया है और उसे उसी रूप में काम करना चाहिए। जब अपने चुने हुए सदन के आचरण के खिलाफ अपने चुने हुए सांसद या विधायक काम करते हैं और जनता उनका कुछ भी नहीं कर पाती तो फिर उसकी भड़ास शायद उसी तरह निकलती है जिस तरह अभी किसी टीवी चैनल की बहस में प्रशांत भूषण की निकली है या कुछ दिन पहले रामलीला मैदान के मंच से सांसदों के बारे में किरण बेदी की भड़ास निकली थी। हमारा यह मानना है कि समाज के जिस तबके को भी किसी किस्म के विशेषाधिकार मिले हैं उसे अपने अधिकारों से अधिक फिक्र अपनी जिम्मेदारियों की भी करनी चाहिए। हम पूरी संसद को भ्रष्ट या सभी सांसदों को भ्रष्ट कहने के बजाय यह याद दिलाना चाहेंगे कि एक स्टिंग ऑपरेशन के मार्फत कुछ सांसद भ्रष्ट पकड़ाए जा चुके हैं, देश में जगह-जगह कई सांसद बदसलूकी करते पाए जाते हैं, कुछ सांसद उन्हें मिले मकानों के बेजा इस्तेमाल में पकड़ाते हैं और कई सांसद सांसद-निधि को जारी करने में भ्रष्टाचार करने के लिए भी जाने जाते हैं। इसलिए आज प्रशांत भूषण या किरण बेदी को संसद द्वारा दिए गए नोटिसों के साथ शायद भारत की आम जनता की हमदर्दी नहीं होगी। अदालत हो या संसद-विधानसभा, विशेषाधिकार या अवमानना के कानून का हकदार बनकर दिखाना भी यहां की कुर्सियों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है और आज हम इस जिम्मेदारी में भारी सुधार की गुंजाइश दिखती है।
इस तरह हम आज दोनों पक्षों से अपने-अपने अधिकारों के इस्तेमाल में सावधानी बरतने और अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को न्यूनतम से चार कदम अधिक चलकर पूरा करने की उम्मीद करते हैं, वही बात लोकतंत्र होगी, वही बात संसदीय परिपवक्ता होगी। इज्जत का हकदार बनकर दिखाना जरूरी होता है, बजाय किसी कानून के तहत इज्जत का दावा करने के।
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