दिल्ली पर फिर आतंकी हमला

7 सितंबर 2011
दिल्ली पर फिर आतंकी हमला हुआ और राजधानी होने की वजह से, दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर और संसद के करीब होने से इसे लेकर सनसनी बहुत अधिक फैली है। संसद की कार्रवाई चल ही रही है और सत्ता और विपक्ष इस पर अब तक तो जिम्मेदारी से बोल रहे हैं। लेकिन आज मायने जो बात रखती है वह है कि सबसे ज्यादा इंतजाम वाली दिल्ली में ऐसा हमला फिर हुआ। सरकार के लिए यह शर्मिंदगी की बात है और विपक्ष के लिए आने वाले कुछ दिनों में भी यह एक नाजुक फैसला होगा कि इस हमले को लेकर वह कितनी राजनीति करे और कितनी न करे।
हम इसे देश में होने वाले, खासकर शहरी इलाकों में होने वाले आतंकी हमलों की एक ताजा कड़ी मानते हैं। इसकी इससे अधिक और कोई अहमियत नहीं है कि आतंकी हमले पूरी तरह से रोके नहीं जा सक रहे हैं। एक सवाल यह उठता है कि क्या इन हमलों को पूरी तरह रोका भी जा सकता है? और अगर किसी तरह ऐसा करना मुमकिन भी हो, तो वह किस कीमत पर हो सकेगा? हम यहां पर देश के भीतर सुरक्षा के इंतजाम, उनकी दिक्कतें और उन दिक्कतों के पीछे के कारण, इन सबको जब एक साथ देखते हैं तो लगता है कि भारत जैसे विविधता वाले देश, जिसकी चारों तरफ की सरहद ऐसे देशों से घिरी हुई है जहां भारत के खिलाफ कुछ संगठन तो हथियारबंद नफरत के साथ काम करते ही हैं, यहां पर हर किस्म के हमलों को रोकना नामुमकिन सा लगता है। फिर देश के भीतर बहुत से ऐसे संगठन हैं जो इस किस्म के हमले करते चले आ रहे हैं, उनके बाद या उनके पहले गिरफ्तारियां भी होती हैं, सजा भी होती है, फांसी में देर भी होती है। लेकिन एक बात जो खटकती है वह यह कि अपने-आपको अतिमहत्वपूर्ण कहने वाला और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण साबित करने वाला तबका सुरक्षा इंतजाम का कितना हिस्सा अपने ऊपर झोंक देता है? किस बंगले पर कितनी बंदूकों की तैनाती है, इस बात को अगर उजागर करना जरूरी कर दिया जाए तो ताकतवर तबके से कमजोर तबकों की नफरत और अधिक बढ़ जाएगी। दूसरी बात जो बहुत अधिक खटकती है वह यह कि अगर देश के एक दर्जन नक्सल प्रभावित राज्यों के जंगल के इलाकों जैसी अराजकता और हिंसा अगर देश के शहरों में किसी भी शक्ल में किसी भी गिरोह द्वारा फैला दी गई, तो क्या भारत ऐसे खतरे से निपट भी सकेगा? हम एकाएक सरकार को इसलिए नहीं कोसना चाहेंगे क्योंकि चौकसी के सारे इंतजाम एक दाम के साथ ही आते हैं। अगर अमरीका जैसी कड़क सुरक्षा भारत में देनी है तो सरकार पर इसका लंबा-चौड़ा बोझ पड़ेगा और इसकी लागत देश के कुछ दूसरे कार्यक्रमों में कटौती करके ही जुटाई जा सकेगी। और दाम से परे एक दूसरी बात, नाम की भी है। सरकार जब भी आतंक को रोकने के लिए सख्ती से काम करती है तो कहीं पर मानवाधिकारों को कुचलने के मामले सामने आते हैं या शिकायतें सामने आती हैं। कहीं पर सुरक्षा एजेंसियां उस इलाके के बेकसूर लोगों से बलात्कार या उनकी फर्जी मुठभेड़ हत्या में लग जाती हैं, या ऐसे आरोपों से घिर जाती हैं। फिर यह भी है कि निगरानी रखने के लिए अगर केंद्र या राज्य सरकारें अधिक टेलीफोन टैप करने लगती हैं तो उसे निजी जिंदगी में एक खतरनाक दखल पाया जाता है और उसका विरोध भी होता है। तो ऐसे में चौकसी और निगरानी के लिए जिम्मेदार एजेंसियां लगातार विरोधाभासों और अंतरद्वंद्वों से गुजरती रहती हैं। हम इसे देश की खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों की कोई बहुत बड़ी या बुरी असफलता भी कुछ घंटों के भीतर इसलिए नहीं मानेंगे कि इन दोनों का काम लोगों की नजरों में तभी आता है जब ये नाकामयाब रहते हैं। इन बरसों में इन दोनों ने कितने हमलों को कहां रोका है यह अंदाज भी लगाना चाहिए। इस मौके पर हम लोगों को यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि जब एक-एक पखवाड़े तक इसी राजधानी में ऐसे आंदोलन चलते हैं, जिनके इंतजाम में पुलिस ओवरटाईम करने को मजबूर रहती है, तो उससे भी पुलिस के जिम्मे के बाकी काम पिछड़ते हैं।
एक दूसरी खबर यह है कि पाकिस्तान में आज ही सुबह एक आत्मघाती आतंकी हमले में बीस लोग मारे गए हैं। सरहद के दोनों तरफ आतंकी हमले इस तरह हुए हैं कि मानो यह सरहद ही नहीं है और दिल्ली से लेकर क्वेटा तक आतंक एक सरीखा फैला हुआ है। इन दोनों जगहों पर लोगों को थोक में मारने के पीछे तर्क अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों जगहों पर आम लोगों के बीच अपनी जिंदगी को लेकर एक बेचैनी तो फैली हुई है ही। भारत के भीतर की फिक्र करें तो शहरों की आतंकी वारदातें आनन-फानन इलेक्ट्रॉनिक बेचैनी ब्रॉडकास्ट करने लगती हैं, इससे कहीं अधिक गिनती जब एक-एक हमले में बस्तर जैसे इलाके में होने लगती हैं तो भी राजधानियां नहीं हिलतीं और न ही टेलीविजन समाचार चैनलों पर सुनामी सा सैलाब आता है। हम शहरों में चल रहे गैरनक्सली आतंकी हमलों से पैदा होने वाली फिक्र के ऐसे मौकों पर हमेशा यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि नक्सल इलाकों में होने वाले आतंकी हमलों पर भी आज के शहरी कफन-दफन के बाद बात होनी चाहिए।

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