कोर्ट को लेकर मोदी के जश्न में उड़ाए जा रहे गुबार का सच

15 सितंबर 2011
अमरीकी सरकार के एक अंदरूनी ईमेल में मोदी सरकार की तारीफ को लेकर मीडिया खबरों से पट गया है और भाजपा का हौसला बढ़ गया है। पिछले काफी समय से भाजपा के पास यूपीए सरकार के कुकर्मों के अलावा खुद का हासिल कुछ नहीं था। गुजरात दंगों को लेकर मोदी को वीजा देने से मना कर देने वाली अमरीकी सरकार के भारत के एक अफसर की लिखी बातों को अपनी सरकार की तारीफ से परे, गुजरात की साढ़े छह करोड़ जनता की तारीफ बताते हुए खुद मोदी ने इसे अपने ब्लॉग पर डाला है। मोदी-गौरव का यह ताजा सिलसिला सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से शुरू हुआ जिसके अदालत से बाहर कागज पर आने से पहले ही जुबानी जमा-खर्च आसमान तक पहुंच गया था और इसे मोदी की फतह बताते हुए भाजपा के दिग्गज मोदी को मुबारकबाद देने में जुट गए थे। इस हल्ले के बीच भाजपा के आज के सक्रिय सबसे बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवानी की गुजरात से रथयात्रा शुरू करने की मुनादी भी हाशिए पर चली गई, और लोग पल भर को यह भी भूल गए कि भाजपा के पास अभी भी अपना एक अध्यक्ष है, एक मजबूत संगठन है और वह एनडीए नाम के एक ऐसे गठबंधन का हिस्सा भी है जिसके तमाम भागीदार अनिवार्य रूप से साम्प्रदायिक नहीं है। ऐसे माहौल में भी यह हल्ला आखिर एक गुबार की तरह उठा कि अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को मोदी को सामने लाना चाहिए या वह ला सकती है, और क्या अगला चुनाव इस देश में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्वों के टकराव के रूप में होगा?
एक तो अमरीकी कूटनीतिक-विश्लेषण और फिर अन्ना के बाद अनाथ बैठे मीडिया की भूख और प्यास। इन दोनों ने मिलाकर देश के टीवी खबर-चैनलों के बड़े-बड़े सितारों को इस अटकलबाजी में झोंक दिया कि मोदी अपने-आपको बहुत बड़ा नेता साबित करने के लिए गुजरात विधानसभा भंग करके राज्य में चुनाव करवाकर एक बार फिर अपने को जनता की अदालत में सही और सबसे मजबूत साबित कर सकते हैं। कुछ और का कहना था कि अब मोदी का वक्त राष्ट्रीय राजनीति में आने का हो गया है। और मीडिया के भूख-प्यास से बेचैन पंडितों (यह शब्द जाति के लिए नहीं, प्रचलित भाषा में जानकारों के लिए इस्तेमाल होने वाले एक मनुवादी शब्द के रूप में) का कम से कम एक अंदाज सही है कि भाजपा के भीतर मोदी की तरह नाटकीय लोकप्रियता वाला दूसरा कोई नेता नहीं है और अगर अदालतों से मोदी को ऐसी राहत मिल गई है तो फिर अब उनके लिए गुजरात से ऊपर उभरने का वक्त आ गया है।
लेकिन यहां पर इस बात को समझने की जरूरत है कि मोदी के समर्थन के सारे हल्ले के बीच सुप्रीम कोर्ट का आदेश आखिर है क्या? गुजरात के 2002 के साम्प्रदायिक मानवसंहार का एक चर्चित हिस्सा गुलबर्ग सोसायटी का था जहां पर बड़ी संख्या में जलाए गए लोगों में कांगे्रस के एक मुसलमान सांसद भी थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक इस सांसद की पत्नी सहित कुछ और लोग गए थे और अपील की थी कि मोदी और 62 दूसरे अफसरों ने इन दंगों को रोकने के लिए जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया और हिंसा को बढ़ावा दिया। इस अपील का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद कोई आदेश देने से इंकार किया और कहा कि इस मामले पर गुजरात की निचली अदालत फैसला करे।
हम पिछले कुछ दिनों से सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर हवा में तैर रही बधाईयों और मिठाईयों को देखकर हैरान हैं, लेकिन चुप रहे क्योंकि इस आदेश की कॉपी हमें नहीं मिली थी। जो लोग देश की इस सबसे बड़ी अदालत के इस आदेश को मोदी को मिली हुई क्लीनचिट मानते हैं उन्हें न्याय की प्रक्रिया को कुछ समझना होगा। भारत के अदालती ढांचे में क्या यह मुमकिन है कि सुप्रीम कोर्ट किसी को क्लीनचिट दे दे और उसके बाद अहमदाबाद जिले की अदालत का एक मजिस्ट्रेट या जज उस मामले में फैसला दे? यह मामला पूरी तरह से अदालत के न्यायक्षेत्र का था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कोई टिप्पणी करने के बजाय उसे इसलिए एक जिले की अदालत को भेजा क्योंकि उसी अदालत में यह मामला चल रहा है और वहीं सुनवाई कर रहे जज-मजिस्ट्रेट को यह भी तय करने का अधिकार है कि मोदी पर लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच की जाए, या न की जाए। यह न सिर्फ अदालती ढांचे में, बल्कि सरकार के ढांचे में भी होता है कि जब किसी अधिकारी का कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र तय किया हुआ रहता है तो आदेश उसी स्तर से जारी होता है न कि राज्य के सबसे बड़े अधिकारी के स्तर से। मोदी के खिलाफ यह मामला चूंकि जिला अदालत या मामले की सुनवाई कर रहे अदालत के स्तर का था इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उसमें दखल नहीं की और इस मामले के गुण-दोष (मेरिट ऑफ द केस) पर कुछ कहने के बजाय उसे उपयुक्त अदालत को भेजा।
सुप्रीम कोर्ट अगर किसी मामले को अपनी दखल से नीचे की अदालत के दखल के लायक पाता है, तो बस इस तकनीकी बात को मोदी के गुनाह या मोदी की बेगुनाही पर अदालती फैसला बताते हुए भाजपा के बहुत से नेताओं ने इसे एक राष्ट्रीय जलसे में तब्दील कर दिया। क्या इस देश की सुप्रीम कोर्ट नीचे की तमाम अदालतों में चल रहे, चलने के लायक, उनके अधिकार क्षेत्र के मामलों पर सीधे आदेश करने लगे तो वह लोकतंत्र के भीतर की न्याय-व्यवस्था के लिए बेहतर होगा? ऐसे आदेश उसी समय होते हैं जब ऐसा साबित होने लगता है कि नीचे की अदालत या तो ठीक काम नहीं कर रही है, उसने कोई गलत आदेश दिए हैं, या वहां पर हो रही देर से कोई ऐसा नुकसान हो रहा है जिसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाएगी। ऐसे कुछ और कारण भी हो सकते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इस मामले पर आदेश चाहे मोदी के पक्ष में होता या मोदी के खिलाफ, अगर वह निचली अदालत के न्यायक्षेत्र को कुचलते हुए आता तो वह एक खराब आदेश होता। उससे एक नाटकीय खबर तो बनी होती, जैसी कि अभी मोदी के समर्थन में बनाई गई है, लेकिन क्या देश भर की जिला अदालतों का, ट्रायल कोर्ट का काम उनसे छीनकर सुप्रीम कोर्ट करने लगे?
पिछले बहुत समय में किसी अदालत के आदेश को लेकर इतनी रफ्तार से इतनी बड़ी गलतफहमी कम ही फैलाई जाती या कम ही फैलती दिखी है। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न तो मोदी के पक्ष में और न मोदी के विरोध में कुछ भी कहा है। मोदी और उनके हिमायती सुप्रीम कोर्ट से बहुत ही कड़े चाबुक की दहशत में जी रहे थे और वहां से ऐसा कुछ न होने पर वे उन्हें मिली राहत को एक अदालती राहत की तरह पेश कर रहे हैं और जश्न मना रहे हैं। लेकिन देश के लोगों को यह बात बहुत साफ-साफ समझने की जरूरत है कि यह राहत ऐसी दहशत को मिली हो सकती है, यह राहत कोई अदालती राहत नहीं है, यह न कोई चाबुक है और न कोई क्लीनचिट। यह मुमकिन है कि अहमदाबाद के ट्रायल कोर्ट से इस अपील पर फैसला होने के बाद उसके खिलाफ मोदी या उनके विरोधी ऊपर की अदालत में जाएं और वहां के फैसले से नाखुश खेमा फिर सुप्रीम कोर्ट तक इसे लेकर पहुंचे और तब सुप्रीम कोर्ट इस केस के मेरिट (गुण-दोष) पर फैसला करे। नरेन्द्र मोदी ने इस आदेश को लेकर यह कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उनके और गुजरात की सरकार के खिलाफ 2002 के दंगों के बाद से बेबुनियाद और झूठे आरोपों से खड़ा किया गया एक अस्वस्थ वातावरण खत्म होने का वक्त आ गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश में ऐसी कोई बात नहीं है जिसकी कि कोई ऐसी व्याख्या कर सके। इस बारे में गुजरात में मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले एक आईपीएस अफसर संजीव भट्ट का मोदी को लिखा एक खुला खत भी देखा जाना चाहिए।
एक आम अखबार के संपादकीय कॉलम में अदालती प्रक्रिया का इतना बारीक विश्लेषण करने की नौबत आमतौर पर नहीं आती है लेकिन हवा में गुलाल उड़ाकर जो धुंध खड़ी की गई है उसे साफ करना भी जरूरी है। मोदी पर अदालती फैसला अभी बहुत दूर है।

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