बच्चे खोने वाले हाथ कब तक महज कागज थामे रहेंगे?

1 सितंबर 2011
मुंबई के अखबार मिड-डे में आज छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र के नासिक जिले में पिछले चार महीनों में साढ़े चार सौ बच्चे भूख से मर गए हैं। और छह सौ करोड़ रुपए का शिशु कल्याण बजट उसी अंदाज में खिलौने जैसे सामान खरीदने पर खर्च किया गया जिस अंदाज में कलमाड़ी ने राष्ट्रमंडल खेलों के लिए खर्च किया। कांगे्रस और एनसीपी की महाराष्ट्र सरकार ने एक बाल्टी, एक मग, एक जग और पानी का एक ड्रम, ऐसे चार बर्तनों के सेट को तेरह हजार आठ सौ रुपयों के हिसाब से इसी मद से खरीदा। सौ पेज के रजिस्टर को बावन रुपए में लिया और तीन सौ पेज के रजिस्टर को एक सौ छत्तीस रुपए में लिया। बच्चों की डफली को चार सौ उनसठ रुपए में खरीदा। बाजार भाव से चार-पांच गुना दाम पर इन बच्चों के नाम पर सामान खरीदे गए और विटामिन की बोतल अठारह रुपए के बजाय तीन सौ रुपए देकर ली गई। कुछ सौ रुपए में आने वाली वजन करने की मशीन साढ़े चार-चार हजार में ली गई। सौ ग्राम का बिस्किट का पैकेट इक्कीस रुपए में लिया गया। ऐसे हर सामान करोड़ों के खरीदे गए। एक तरफ इससे वहां जाहिर तौर पर नेता और अफसर करोड़पति-अरबपति होते गए और दूसरी तरफ जिन बच्चों के नाम पर यह पैसा आया था वे बच्चे मरते चले गए। भूख और कुपोषण से जिस नासिक में साढ़े चार सौ अधिक बच्चे पिछले चार महीने में मारे गए हैं वहां पर इस तरह के दूसरे एक लाख बच्चे और पाए गए हैं जो मरने के पहले के अलग-अलग दर्जे की जिंदगी जी रहे हैं।
दूसरी तरफ आज की ही एक दूसरी खबर बताती है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और बच्चों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था 'सेव द चिल्ड्रनÓ की एक संयुक्त रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में नवजात शिशु मृत्यु दर पूरे विश्व में सबसे ज़्यादा है। विश्व में नवजात शिशुओं की मौत के 99 प्रतिशत मामले विकासशील देशों में होती हैं। वर्ष 2009 में पूरे विश्व में आधे से ज़्यादा नवजात शिशुओं की मृत्यु पांच देशों में हुई भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, चीन और कांगो में। भारत में ये आंकड़ा सबसे ज़्यादा पाया गया जहां 2009 में नौ लाख नवजात शिशुओं ने पैदा होने के एक महीने के भीतर दम तोड़ दिया। विश्व में होने वाली कुल नवजात शिशु मृत्यु के मामलों में से मृत्यु के 28 प्रतिशत मामले भारत में दर्ज होते हैं। हालांकि केवल भारतीय तस्वीर को ही आंका जाए, तो यहां पिछले 20 वर्षों में नवजात शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई है।
महाराष्ट्र में बहुत समय से कांगे्रस और एनसीपी की सरकार है। और जैसा कि पिछले एक बरस में सामने आया है, राजधानी मुंबई में बैठे हुए बड़े-बड़े मुख्यमंत्री, मंत्री और अफसर-विधायक जमीनों के बड़े-बड़े घपले करके करोड़ों का फायदा पाने में लगे हुए हैं। वह तो फिर भी महंगी शहरी जमीन की लूटपाट थी, यह तो इतने बेबस और गरीब बच्चों के हक पर डाका डाला गया कि जिसे लेकर ऐसा लगता है कि सरकारी भ्रष्टाचार जब किसी की जिंदगी खत्म करने के लिए जिम्मेदार हो तो उसके लिए फांसी की सजा होनी चाहिए। हम फांसी की सजा के खिलाफ हैं लेकिन अगर यह सजा भारत में जारी रहनी है तो उत्तेजना में किसी की हत्या कर देने वाले किसी अपराधी को यह सजा देने के बजाय ऐसे भ्रष्ट लोगों को यह सजा देनी चाहिए जो सोच-समझकर ऐसा भ्रष्टाचार करते हैं जिससे बेबस जिंदगियां खत्म होने की गारंटी होती है। इस पूरे देश में कुपोषण के शिकार बच्चों की आबादी इतनी अधिक है कि इसका हाल अफ्रीका के गरीब देशों से भी गया-गुजरा पाया गया है। ऐसे में अगर राजनीति और नौकरशाही, कारखाने और कारोबार, देश को लगातार लूटने में लग रहते हैं और देश का कानून उसके खिलाफ कुछ नहीं कर पाता, सरकार की कुछ करने की नीयत नहीं रहती तो फिर कुछ लोग बंदूकें कैसे नहीं उठाएंगे? जिस महाराष्ट्र में गढ़चिरौली जैसे इलाके नक्सल हिंसा का गढ़ बन चुके हैं उसी महाराष्ट्र के कुछ दूसरे आदिवासी इलाकों में अगर अपने बच्चों को भ्रष्टाचार के हाथों इस तरह खोने के बाद भी अगर वहां के लोग नक्सली नहीं बनते हैं तो फिर वे गांधी से बड़े अहिंसक हैं। गांधी ने तो यह कहा था कि हिंसा को बर्दाश्त करना भी हिंसा है, लेकिन कुछ नक्सलियों को अगर छोड़ दें तो बाकी देश आज भी सत्ता की हिंसा को चुपचाप झेल रहा है और क्या कोई यह कल्पना कर सकता है कि अपने हक के लिए बाकी लोगों गांधी की ही साधारण नसीहत को मान लें और हिंसा को बर्दाश्त न करें, तो क्या होगा? जिस छत्तीसगढ़ में एक हिस्से में नक्सलियों का पूरा-पूरा कब्जा खुद सरकार बताती है, उस पूरे के पूरे छत्तीसगढ़ में महिला और बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग में बैठे लोगों ने किस तरह सैकड़ों करोड़ के घपले किए हैं यह भी पिछले बरसों में सामने आया है और मामूली जांच से परे अब तक किसी का कुछ बिगड़ते तो दिखा नहीं है। यह तय है कि यहां भी बच्चों और बड़ों के जिंदा रहने के हक को ही बेचकर लोगों ने भ्रष्टाचार किया।
यह देश एक भयानक दौर से गुजर रहा है। यह कब तक हिंसा से बचे रहेगा यह सोच पाना हमारे लिए मुश्किल हो रहा है। जब सरकारी भ्रष्टाचार के आंकड़े और सुबूत सारे कागजातों पर जनता के हाथ आ रहे हैं, आएंगे, तो फिर वे हाथ कब तक महज कागज थामे रहेंगे, यह कल्पना कम से कम हम तो नहीं कर पा रहे हैं।

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