14 सितंबर
विकीलीक्स के खुलासे में अभी यह सामने आया था कि किस तरह वैटिकन के अमरीकी राजदूत ने अपनी सरकार को यह लिखकर भेजा था कि पोप चाहते हैं कि अमरीका में बच्चों के यौन शोषण में पकड़ाए पादरियों पर मुकदमे न चलाए जाएं। इसका कैथोलिक ईसाईयों के मुख्यालय, वैटिकन, की तरफ से कोई खंडन भी नहीं किया गया। आज दूसरी खबर यह है कि यौन शोषण के दोषी किसी भी पादरी को सजा न होने से निराश उनके शिकार लोगों ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पोप के खिलाफ एक मामला दायर किया है। ऐसा करने वाले लोगों की गिनती नौ हजार है।
धर्म के साम्राज्य में बच्चों के यौन शोषण की यह एक भयानक नौबत है। पूरी दुनिया का धर्म का इतिहास इस बात का गवाह है कि जहां कहीं ब्रम्हचर्य को किसी पर थोपा जाता है, वहां सेक्स अपराध का खतरा खड़ा हो जाता है या फिर ऐसे अघोषित संबंध विकसित होने लगते हैं जिन्हें धर्म और समाज की भाषा में अवैध कहा जाता है। हम तो दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से होने वाले किसी भी सेक्स संबंध को अवैध नहीं मानते और न ही उसे बुरा मानते। लेकिन अलग-अलग कई ऐसे धर्म हैं जो अपने गुरूओं और प्रचारकों को शादी से रोकते हैं और जैसा कि धर्मों का तौर-तरीका रहता है, बिना शादी के सेक्स संबंधों से तो वे रोकते ही हैं। नतीजा यह होता है कि ईसाई धर्म साम्राज्य पूरी दुनिया में बच्चों के देहशोषण के आरोपों, मामलों और अपराधों से घिरा हुआ है, भारत में हम हिंदू धर्म में कहीं मंदिरों में देवदासी प्रथा के नाम पर वेश्यावृत्ति देखते हैं तो कहीं मठों और आश्रमों में कोठारिन रहती है तो कहीं कोई स्वघोषित साधू-महात्मा अघोषित रूप से सार्वजनिक हो चुके सेक्स संबंधों के लिए कुख्यात रहता है।
आज बच्चों के देह शोषण के मामले में अगर सिर्फ ईसाई धर्म के भीतर भांडाफोड़ रोजाना हो रहे हैं तो इसकी वजह महज यह नहीं है कि ऐसा शोषण सिर्फ वहीं हो रहा है। ऐसे मामले मोटे तौर पर अमरीका और योरप में ही उजागर हो रहे हैं जहां पर लोगों के बीच कानूनी जागरूकता अधिक है और जहां का लोकतंत्र लोगों को बचपन में हुए शोषण के खिलाफ भी आज अदालत जाने जैसे हक देता है। भारत जैसे देश में कोई क्या खाकर अदालत जाएगा जहां पर कि कल हुए बलात्कार की आज हुई रिपोर्ट के बाद उस लड़की से थाने में फिर बलात्कार करके उसे रस्सी पर टांग दिया जाता है और अगर मामला अदालत तक पहुंच पाया तो वहां पर जिरह के दौरान अपराधी और उसका वकील उस लड़की से सबके सामने कई बार और जुबानी-बलात्कार करते हैं। बचपन के शोषण के खिलाफ लोग तभी अपने देश की अदालत या अंतरराष्ट्रीय अदालत तक जाने की सोच पाते हैं जब उन्हें वहां का कानून असरदार दिखता है। भारत में तो परिवार के बच्चे इस बात को लेकर शर्मिंदगी में जीते रहेंगे कि उनके दादा या नाना अपने बचपन में उनके हुए देह शोषण को लेकर आधी सदी से अदालत में खड़े हैं।
लेकिन अमरीका और योरप के इन मामलों से सीधा वास्ता न होते हुए भी इस पर हम इसलिए लिख रहे हैं, और पहले भी इसलिए लिख चुके हैं, कि बच्चों के देह शोषण का खतरा धर्म से परे भी समाज में, घर-बार में, पड़ोस और स्कूल में, मैदान और हॉस्टल में बने ही रहता है। भारत में जहां पर कि लोग सेक्स पर चर्चा से कतराते हैं, मां-बाप बनने के लायक उम्र तक पहुंच गए बच्चों को भी किसी तरह की सेक्स शिक्षा देने के नाम से राजनीतिक दल दहशत में आ जाते हैं, वहां पर अपने खुद के बच्चों की ऐसी शिकायत को कोई मां-बाप शायद ही सुनते हों। अगर कोई बच्चा ऐसे शोषण या ऐसी छेडख़ानी की शिकायत करता है तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है। इन फिरंगी वारदातों से भारत को यह सबक लेने की जरूरत है कि वह अपनी धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों को किस तरह निगरानी में रख सकता है ताकि यहां पर ऐसा जुल्म होने पर तुरंत वह बात उजागर हो और उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो सके। दूसरों को लगी ठोकर से जो समाज सबक ले लेता है वही समाज अपनी पूरी संभावनाओं तक पहुंचने का हकदार होता है। अगर भारतीय समाज में अनगिनत बच्चे बचपन में ऐसे शोषण का शिकार होकर एक घायल मानसिकता के साथ बड़े होते हैं तो उनका सामाजिक योगदान भी एक सेहतमंद मानसिकता के व्यक्ति से कम होगा। इसलिए देश के व्यापक हित में यह है कि उसका समाज चौकस रहे और उस समाज के हर इंसान को ऐसी यातना के बिना बड़े होने का हक मिले।
विकीलीक्स के खुलासे में अभी यह सामने आया था कि किस तरह वैटिकन के अमरीकी राजदूत ने अपनी सरकार को यह लिखकर भेजा था कि पोप चाहते हैं कि अमरीका में बच्चों के यौन शोषण में पकड़ाए पादरियों पर मुकदमे न चलाए जाएं। इसका कैथोलिक ईसाईयों के मुख्यालय, वैटिकन, की तरफ से कोई खंडन भी नहीं किया गया। आज दूसरी खबर यह है कि यौन शोषण के दोषी किसी भी पादरी को सजा न होने से निराश उनके शिकार लोगों ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पोप के खिलाफ एक मामला दायर किया है। ऐसा करने वाले लोगों की गिनती नौ हजार है।
धर्म के साम्राज्य में बच्चों के यौन शोषण की यह एक भयानक नौबत है। पूरी दुनिया का धर्म का इतिहास इस बात का गवाह है कि जहां कहीं ब्रम्हचर्य को किसी पर थोपा जाता है, वहां सेक्स अपराध का खतरा खड़ा हो जाता है या फिर ऐसे अघोषित संबंध विकसित होने लगते हैं जिन्हें धर्म और समाज की भाषा में अवैध कहा जाता है। हम तो दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से होने वाले किसी भी सेक्स संबंध को अवैध नहीं मानते और न ही उसे बुरा मानते। लेकिन अलग-अलग कई ऐसे धर्म हैं जो अपने गुरूओं और प्रचारकों को शादी से रोकते हैं और जैसा कि धर्मों का तौर-तरीका रहता है, बिना शादी के सेक्स संबंधों से तो वे रोकते ही हैं। नतीजा यह होता है कि ईसाई धर्म साम्राज्य पूरी दुनिया में बच्चों के देहशोषण के आरोपों, मामलों और अपराधों से घिरा हुआ है, भारत में हम हिंदू धर्म में कहीं मंदिरों में देवदासी प्रथा के नाम पर वेश्यावृत्ति देखते हैं तो कहीं मठों और आश्रमों में कोठारिन रहती है तो कहीं कोई स्वघोषित साधू-महात्मा अघोषित रूप से सार्वजनिक हो चुके सेक्स संबंधों के लिए कुख्यात रहता है।
आज बच्चों के देह शोषण के मामले में अगर सिर्फ ईसाई धर्म के भीतर भांडाफोड़ रोजाना हो रहे हैं तो इसकी वजह महज यह नहीं है कि ऐसा शोषण सिर्फ वहीं हो रहा है। ऐसे मामले मोटे तौर पर अमरीका और योरप में ही उजागर हो रहे हैं जहां पर लोगों के बीच कानूनी जागरूकता अधिक है और जहां का लोकतंत्र लोगों को बचपन में हुए शोषण के खिलाफ भी आज अदालत जाने जैसे हक देता है। भारत जैसे देश में कोई क्या खाकर अदालत जाएगा जहां पर कि कल हुए बलात्कार की आज हुई रिपोर्ट के बाद उस लड़की से थाने में फिर बलात्कार करके उसे रस्सी पर टांग दिया जाता है और अगर मामला अदालत तक पहुंच पाया तो वहां पर जिरह के दौरान अपराधी और उसका वकील उस लड़की से सबके सामने कई बार और जुबानी-बलात्कार करते हैं। बचपन के शोषण के खिलाफ लोग तभी अपने देश की अदालत या अंतरराष्ट्रीय अदालत तक जाने की सोच पाते हैं जब उन्हें वहां का कानून असरदार दिखता है। भारत में तो परिवार के बच्चे इस बात को लेकर शर्मिंदगी में जीते रहेंगे कि उनके दादा या नाना अपने बचपन में उनके हुए देह शोषण को लेकर आधी सदी से अदालत में खड़े हैं।
लेकिन अमरीका और योरप के इन मामलों से सीधा वास्ता न होते हुए भी इस पर हम इसलिए लिख रहे हैं, और पहले भी इसलिए लिख चुके हैं, कि बच्चों के देह शोषण का खतरा धर्म से परे भी समाज में, घर-बार में, पड़ोस और स्कूल में, मैदान और हॉस्टल में बने ही रहता है। भारत में जहां पर कि लोग सेक्स पर चर्चा से कतराते हैं, मां-बाप बनने के लायक उम्र तक पहुंच गए बच्चों को भी किसी तरह की सेक्स शिक्षा देने के नाम से राजनीतिक दल दहशत में आ जाते हैं, वहां पर अपने खुद के बच्चों की ऐसी शिकायत को कोई मां-बाप शायद ही सुनते हों। अगर कोई बच्चा ऐसे शोषण या ऐसी छेडख़ानी की शिकायत करता है तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है। इन फिरंगी वारदातों से भारत को यह सबक लेने की जरूरत है कि वह अपनी धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों को किस तरह निगरानी में रख सकता है ताकि यहां पर ऐसा जुल्म होने पर तुरंत वह बात उजागर हो और उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो सके। दूसरों को लगी ठोकर से जो समाज सबक ले लेता है वही समाज अपनी पूरी संभावनाओं तक पहुंचने का हकदार होता है। अगर भारतीय समाज में अनगिनत बच्चे बचपन में ऐसे शोषण का शिकार होकर एक घायल मानसिकता के साथ बड़े होते हैं तो उनका सामाजिक योगदान भी एक सेहतमंद मानसिकता के व्यक्ति से कम होगा। इसलिए देश के व्यापक हित में यह है कि उसका समाज चौकस रहे और उस समाज के हर इंसान को ऐसी यातना के बिना बड़े होने का हक मिले।
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