क्या देश में ऐसे रास्ते निकालने लायक मैनेजमेंट-गुरू नहीं हैं?

16 सितंबर 2011
अपनी खुद की उम्मीदों के खिलाफ और अपनी आशंकाओं के बावजूद आज हम यह सलाह देने जरूरी और जायज समझते हैं कि देश में पेट्रोल-डीजल, रसोईगैस और मिट्टीतेल की रियायत के लिए जरूरतमंद तबके को पहचान लिया जाए और समाज के आर्थिक रूप से मलाईदार तबके को इससे बाहर कर दिया जाए। यह तरीका आसान नहीं होगा, लेकिन पेट्रोलियम खरीदी के बढ़ते हुए घाटे को देखते हुए अब यह जरूरी है कि इसकी रियायतों को संपन्न लोगों तक पहुंचने से रोकने के रास्ते निकाले जाएं। जिस तरह आज देश में गरीबों को मिलने वाले रियायती मिट्टीतेल में नीला रंग मिलाकर उसे खुले बाजार के गैररियायती मिट्टीतेल से अलग करने की कोशिश की गई वैसी ही तरकीबें, लेकिन कामयाब होने लायक, पेट्रोल-डीजल और रसोईगैस के लिए निकालनी चाहिए।
अब कम्प्यूटरों और संचार उपकरणों के सहारे पेट्रोलियम की बिक्री पर कुछ नजर रखना पहले के मुकाबले अधिक आसान है। इस देश में मैनेजमेंट और सूचना तकनीक के बड़े-बड़े जानकार हैं। लाखों करोड़ की सरकारी रियायत को कम करने के लिए ऐसे विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक तरकीब बनाई जा सकती है जिससे कि चार पहिया गाडिय़ों को पेट्रोलियम रियायत न मिले और दुपहिया वाहनों को मिलती रहे। ऐसे दुपहिया वाहनों के लिए यह भी जरूरी हो सकता है कि वे उन गाडिय़ों के नंबर के कार्ड बनवाएं और उन पर ही हर महीने एक निर्धारित कोटा उन्हें रियायत पर मिले और बाकी के लिए वे खुले बाजार के रेट से पैसा दें। एक तरीका यह हो सकता है कि दुपहियों के लिए पेट्रोल पंप ही अलग बन जाएं। एक आसान तरीका यह हो सकता है कि आयकरदाता तबके को किसी भी रियायत से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए और उससे नीचे के तबके को रियायती पेट्रोलियम मिले। आयकर देने वाले लोगों को रियायती रसोई गैस सिलेंडर क्यों मिलना चाहिए? अगर ऐसा करने के लिए कोई रास्ता असरदार नहीं निकल सकता तो फिर अलग-अलग गाडिय़ों की इंजन क्षमता के मुताबिक उन पर ऐसा टैक्स लगाना चाहिए जो कि हर बरस ईंधन की एक अनुमानित खपत के आधार पर वसूला जाए। जिन लोगों को बड़ी गाडिय़ां चलानी है, वे हर बरस एक अधिक टैक्स देने को तैयार रहे क्योंकि वे रियायती ईंधन खुले बाजार से पाते रहेंगे।
लेकिन एक बड़ी बात जो होनी चाहिए वह सार्वजनिक परिवहन की है। हम हर कुछ महीनों में उसके बारे में लिखते हैं। दिल्ली जैसे शहर में जहां लोगों को बसों में पैर धरने की जगह नहीं मिलती थी, वहां आज स्थानीय मेट्रो ट्रेन के चलते दसियों लाख लोग रोजाना सड़कों से परे अब इन तेज रफ्तार डिब्बों में पटरियों पर चलते हैं और दिल्ली अब उतनी मुश्किल नहीं रह गई है। लेकिन पैसे वाले लोगों की भरमार से वहां अब लाखों कारें दिन भर में किसी भी वक्त सड़कों पर रहती हैं और यह एक ऐसा तबका है जो कि मेट्रो के सफर के पहले और बाद के सफर के लिए कोई आरामदेह जरिया नहीं पाता और अपनी गाड़ी में ही चलता है। दिल्ली में अपनी कारों में चलने वाले लोगों से सौ गुना अधिक कमाने वाले लोग न्यूयॉर्क जैसे शहर में भूमिगत रेलगाड़ी से चलते हैं क्योंकि उसके पहले और उसके बाद पैदल चलने के लिए वहां साफ-सुथरी सड़कें हैं और अच्छे फुटपाथ हैं। दिल्ली में आज कोई संपन्न व्यक्ति फुटपाथों पर लंबा चलने की सोच नहीं सकते क्योंकि वहां इतनी गंदगी है और इतने लोग बसे हुए हैं। तो जब तक आरामदेह और सहूलियतों वाला इंतजाम नहीं होगा लोग अपनी गाडिय़ों पर चलने के लिए मजबूर होंगे और यह बात सिर्फ पेट्रोलियम की खपत को लेकर हम नहीं कह रहे, धरती को प्रदूषण से बचाने के लिए भी कह रहे हैं।
दुनिया के बाजार में पेट्रोलियम के दाम हिंदुस्तान की सरकार के काबू के नहीं हैं। इसलिए उसे लेकर अगर देश के विपक्षी दल केंद्र सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर चाहे वह दर्द भरी जनता की हमदर्दी का हकदार क्यों न हो, वह जायज नहीं होगा। इसलिए पेट्रोलियम की कटौती कहां-कहां हो सकती है और साधारण जनता से लेकर मामूली पैसे वालों तक के लिए अगर कोई भरोसेमंद और अच्छी सार्वजनिक यातायात प्रणाली बनाई जा सकती है तो उस तरफ जाना चाहिए। आज शहरों में बसों या ट्रेन के लिए जहां सरकार खुद नहीं बना पा रही वहां निजी क्षेत्र को बढ़ावा देकर जनता को सुविधा क्यों मुहैया नहीं कराई जा सकती? लोगों को अब याद भी नहीं होगा कि किस तरह इस देश में एक टेलीफोन कनेक्शन के लिए दस-दस बरस लोगों को इंतजार करना पड़ता था। आज शहरों में छोटे-छोटे बच्चे दो-दो, तीन-तीन सिम कार्ड जेब में लिए चलते हैं। इसलिए शहरी यातायात को बड़े पैमाने पर निजी भागीदारी से ही खड़ा कर लिया जाए अगर सरकार खुद नहीं खड़ा कर पा रही है।
नेता और अफसर अपने स्तर पर जो काम नहीं कर पा रहे हैं उसके लिए इस देश के ऐसे मैनेजमेंट विशेषज्ञों को क्यों शामिल नहीं किया जा रहा जो कि दुनिया के बड़े-बड़े देशों में जाकर बड़ी-बड़ी कंपनियां चलाने में अपनी कामयाबी दिखा चुके हैं और उनमें जालसाजी तक में कामयाब रहे हैं। यह जरूर है कि बाहरी लोगों को ऐसे काम में लाने पर पेट्रोलियम खरीदी के वैसे कमीशन के भांडाफोड़ होने का खतरा बने रहेगा जो कि किसी भी सरकार के राज में स्विस बैंकों में जमा होने की चर्चा दिल्ली के गलियारों में हमेशा रहती है। लेकिन हम तो पेट्रोलियम के देश में आ जाने के बाद उसे रियायत के हकदार तबके तक ही सीमित रखने की तरकीब की सलाह दे रहे हैं, और ऐसी सलाह तो खरीदी के भ्रष्टाचार से परे भी ली जा सकती है। आज चिकित्सा विज्ञान शरीर के बहुत छोटे-छोटे हिस्से के सीधे इलाज, वहां सीधे दवा पहुंचाने की तरकीबें ढूंढ चुका है, जिनके चलते बाकी शरीर ऐसे इलाज को झेलने से बच जाता है। हम ऐसे ही सब्सिडी को सीधे गरीब-हकदार तक पहुंचाने की बात कर रहे हैं जिससे मलाईदार तबके को बाहर रखा जा सके। क्या इस देश में ऐसे रास्ते निकालने लायक मैनेजमेंट-गुरू नहीं हैं?

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