24 सितंबर 2011
राजस्थान में गहलोत मंत्रिमंडल के एक बुजुर्ग मंत्री के खिलाफ हत्या और बलात्कार का मामला दर्ज हो जाने से वहां कांगे्रस की राज्य सरकार की एक ताजा किरकिरी हुई है। एक नर्स के गायब हो जाने के बाद से वहां के एक मंत्री का नाम शक के घेरे में चले आ रहा था और अब मामला दर्ज होने से यह जाहिर है कि शक में कुछ दम तो है ही। दूसरी तरफ दिल्ली में कांगे्रस के एक सबसे बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी को एक मामले में डीएनए नमूना देने से राहत देते हुए एक अदालत ने यह कहा कि उनका बेटा होने का दावा करने वाला नौजवान जिस मामले को लेकर अदालत में लड़ रहा है उसमें नमूना न देने की तिवारी की अपील को ऐसे भी देखा जा सकता है कि मानो एक नौजवान के आरोप सही हों। लोगों को याद होगा कि आंध्र के राजभवन में इन्हीं बुजुर्गवार के बिस्तर पर खेलकूद के जैसे वीडियो सामने आए थे और जिनके चलते उन्हें बहुत ही शर्मनाक हालत में इस्तीफा देकर निकलना पड़ा था, उसे देखते हुए उनकी एक पुरानी महिला मित्र के बेटे का यह दावा कुछ दमदार भी लगता है कि वह एनडी तिवारी का बेटा है।
भारतीय बोलचाल की जुबान में ऐसे लोगों को लंगोट का कच्चा कहते हैं और यह बात उत्तरप्रदेश के राजभवन से लेकर अमरीका के राष्ट्रपति भवन तक सभी जगहों पर भरपूर लागू होती है, जहां-जहां सत्ता की ताकत कुछ लोगों को आसपास के दायरे में अधिक आकर्षक, अधिक असरदार बना देती है। ऐसे लोग सेक्स के मामले में चाहे जैसे हों, उन पर फिदा लोगों की नजरों में उनके करीब पहुंचना ही पर्याप्त मादक रहता है। शोहरत और ताकत के साथ सोने वालों की कमी नहीं रहती और दूसरी तरफ शोहरत और ताकत की ऊंचाई पर पहुंचे हुए लोग अपने आसपास के दायरे पर हाथ धर देने को अपना हक सा समझ बैठते हैं। इसलिए जॉन एफ कैनेडी का नाम मर्लिन मनरो के साथ जुड़े रहता था, बिल क्लिंटन का नाम मोनिका लेविंस्की के साथ और नेहरू का नाम एडविना माउंटबेटन के साथ। इससे परे भी अगर देखें तो सत्ता की ताकत में मदमस्त मर्दों के बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की एक अंतहीन कतार तो उत्तरप्रदेश में एक महिला मुख्यमंत्री के रहते हुए बनती दिखती है, और एक बड़ी त्रासदी यह है कि बलात्कारी अमूमन मायावती की पार्टी के मंत्री-विधायक दिखते हैं तो बलात्कार और हत्या की शिकार लड़कियां और महिलाएं अमूमन मायावती के दलित समाज की। इससे अधिक शर्मनाक और क्या बात हो सकती है? लेकिन जब लोगों के राजनीतिक मूल्य गटर में चले जाते हैं तो सत्ता का नशा और घमंड सिर चढ़कर बोलने लगता है। जिन वामपंथी दलों पर पश्चिम बंगाल में कानून हाथ लेने के आरोप लगते ही रहते थे, उस राज में भी उत्तरप्रदेश जैसे बलात्कार-हत्या के मामले कभी नजर नहीं आए। वामपंथी विचारधारा में महिलाओं और समाज के बाकी दूसरे कमजोर तबकों के लिए बराबरी के हक की सोच ऐसे बलात्कार नहीं होने देती। लेकिन बाकी किसी पार्टी के राज में ऐसी जिम्मेदारी देखने नहीं मिलती, और देश के बाकी सारे राजनीतिक दल, उनके नेता समय-समय पर ऐसे जुर्म करते पकड़ाते रहे हैं, और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों जुर्म के बाद कोई एक-दो शिकायतकर्ता ही पुलिस तक पहुंचने का हौसला जुटा पाते होंगे।
हम आए दिन सत्ता के बेजा इस्तेमाल के अलग-अलग पहलुओं के बारे में लिखते हैं, लेकिन आज हम सिर्फ इसी एक पहलू को लेकर लिख रहे हैं जिसका शिकार भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में सिर्फ महिलाएं हैं। यह नौबत अभी पूरी भयानक इसलिए नहीं लग रही है क्योंकि ऐसी कोई शिकायत लेकर जब कोई महिला सरकार या अदालत के पास जाती है तो वहां काबिज मर्दों की बहुतायत उसे खारिज करने की पूरी कोशिश करती है और उस महिला के साथ अगले कई बरसों तक सार्वजनिक जीवन में चर्चा और प्रताडऩा की शक्ल में बलात्कार जारी रहता है। हम पहले कई दूसरे किस्म के अपराधों को लेकर यह सुझाव देते आए हैं कि सत्ता की ताकत के अलग-अलग दर्जों पर काबिज नेताओं, अफसरों या जजों, ऐसे तमाम लोगों के अपराधों के लिए अलग तेज रफ्तार अदालतें होनी चाहिए जिन्हें लालबत्ती-वीआईपी अदालत जैसा कोई बहुत इज्जत का नाम दिया जा सकता है ताकि ऐसे दर्जे का सिर इन अदालतों में ऊंचा रह सके। इसके साथ ही जब ऐसे लोगों के अपराध उनके मुकाबले कमजोर या बहुत कमजोर लोगों पर रहें तो उसके लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम रहना चाहिए।
ऐसे जुर्म का हौसला लोगों को शायद इसलिए भी होता है कि राजनीतिक दलों में निजी चाल-चलन को लेकर कोई आचार संहिता बनी हुई नहीं है और तमाम किस्म की ज्यादतियों के बाद भी अय्याश और बलात्कारी लोग तब तक अपनी पार्टियों और सरकारों के नेता बने रहते हैं जब तक कि पुलिस या अदालत में फंसने लायक वजनदार कोई मामला उनके खिलाफ सीना तानकर खड़ा न हो जाए। क्या एक महिला की अध्यक्षता वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी, कांगे्रस अपनी पार्टी के लोगों के लिए कोई नियम-कायदे सामने रखेगी?
राजस्थान में गहलोत मंत्रिमंडल के एक बुजुर्ग मंत्री के खिलाफ हत्या और बलात्कार का मामला दर्ज हो जाने से वहां कांगे्रस की राज्य सरकार की एक ताजा किरकिरी हुई है। एक नर्स के गायब हो जाने के बाद से वहां के एक मंत्री का नाम शक के घेरे में चले आ रहा था और अब मामला दर्ज होने से यह जाहिर है कि शक में कुछ दम तो है ही। दूसरी तरफ दिल्ली में कांगे्रस के एक सबसे बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी को एक मामले में डीएनए नमूना देने से राहत देते हुए एक अदालत ने यह कहा कि उनका बेटा होने का दावा करने वाला नौजवान जिस मामले को लेकर अदालत में लड़ रहा है उसमें नमूना न देने की तिवारी की अपील को ऐसे भी देखा जा सकता है कि मानो एक नौजवान के आरोप सही हों। लोगों को याद होगा कि आंध्र के राजभवन में इन्हीं बुजुर्गवार के बिस्तर पर खेलकूद के जैसे वीडियो सामने आए थे और जिनके चलते उन्हें बहुत ही शर्मनाक हालत में इस्तीफा देकर निकलना पड़ा था, उसे देखते हुए उनकी एक पुरानी महिला मित्र के बेटे का यह दावा कुछ दमदार भी लगता है कि वह एनडी तिवारी का बेटा है।
भारतीय बोलचाल की जुबान में ऐसे लोगों को लंगोट का कच्चा कहते हैं और यह बात उत्तरप्रदेश के राजभवन से लेकर अमरीका के राष्ट्रपति भवन तक सभी जगहों पर भरपूर लागू होती है, जहां-जहां सत्ता की ताकत कुछ लोगों को आसपास के दायरे में अधिक आकर्षक, अधिक असरदार बना देती है। ऐसे लोग सेक्स के मामले में चाहे जैसे हों, उन पर फिदा लोगों की नजरों में उनके करीब पहुंचना ही पर्याप्त मादक रहता है। शोहरत और ताकत के साथ सोने वालों की कमी नहीं रहती और दूसरी तरफ शोहरत और ताकत की ऊंचाई पर पहुंचे हुए लोग अपने आसपास के दायरे पर हाथ धर देने को अपना हक सा समझ बैठते हैं। इसलिए जॉन एफ कैनेडी का नाम मर्लिन मनरो के साथ जुड़े रहता था, बिल क्लिंटन का नाम मोनिका लेविंस्की के साथ और नेहरू का नाम एडविना माउंटबेटन के साथ। इससे परे भी अगर देखें तो सत्ता की ताकत में मदमस्त मर्दों के बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की एक अंतहीन कतार तो उत्तरप्रदेश में एक महिला मुख्यमंत्री के रहते हुए बनती दिखती है, और एक बड़ी त्रासदी यह है कि बलात्कारी अमूमन मायावती की पार्टी के मंत्री-विधायक दिखते हैं तो बलात्कार और हत्या की शिकार लड़कियां और महिलाएं अमूमन मायावती के दलित समाज की। इससे अधिक शर्मनाक और क्या बात हो सकती है? लेकिन जब लोगों के राजनीतिक मूल्य गटर में चले जाते हैं तो सत्ता का नशा और घमंड सिर चढ़कर बोलने लगता है। जिन वामपंथी दलों पर पश्चिम बंगाल में कानून हाथ लेने के आरोप लगते ही रहते थे, उस राज में भी उत्तरप्रदेश जैसे बलात्कार-हत्या के मामले कभी नजर नहीं आए। वामपंथी विचारधारा में महिलाओं और समाज के बाकी दूसरे कमजोर तबकों के लिए बराबरी के हक की सोच ऐसे बलात्कार नहीं होने देती। लेकिन बाकी किसी पार्टी के राज में ऐसी जिम्मेदारी देखने नहीं मिलती, और देश के बाकी सारे राजनीतिक दल, उनके नेता समय-समय पर ऐसे जुर्म करते पकड़ाते रहे हैं, और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों जुर्म के बाद कोई एक-दो शिकायतकर्ता ही पुलिस तक पहुंचने का हौसला जुटा पाते होंगे।
हम आए दिन सत्ता के बेजा इस्तेमाल के अलग-अलग पहलुओं के बारे में लिखते हैं, लेकिन आज हम सिर्फ इसी एक पहलू को लेकर लिख रहे हैं जिसका शिकार भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में सिर्फ महिलाएं हैं। यह नौबत अभी पूरी भयानक इसलिए नहीं लग रही है क्योंकि ऐसी कोई शिकायत लेकर जब कोई महिला सरकार या अदालत के पास जाती है तो वहां काबिज मर्दों की बहुतायत उसे खारिज करने की पूरी कोशिश करती है और उस महिला के साथ अगले कई बरसों तक सार्वजनिक जीवन में चर्चा और प्रताडऩा की शक्ल में बलात्कार जारी रहता है। हम पहले कई दूसरे किस्म के अपराधों को लेकर यह सुझाव देते आए हैं कि सत्ता की ताकत के अलग-अलग दर्जों पर काबिज नेताओं, अफसरों या जजों, ऐसे तमाम लोगों के अपराधों के लिए अलग तेज रफ्तार अदालतें होनी चाहिए जिन्हें लालबत्ती-वीआईपी अदालत जैसा कोई बहुत इज्जत का नाम दिया जा सकता है ताकि ऐसे दर्जे का सिर इन अदालतों में ऊंचा रह सके। इसके साथ ही जब ऐसे लोगों के अपराध उनके मुकाबले कमजोर या बहुत कमजोर लोगों पर रहें तो उसके लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम रहना चाहिए।
ऐसे जुर्म का हौसला लोगों को शायद इसलिए भी होता है कि राजनीतिक दलों में निजी चाल-चलन को लेकर कोई आचार संहिता बनी हुई नहीं है और तमाम किस्म की ज्यादतियों के बाद भी अय्याश और बलात्कारी लोग तब तक अपनी पार्टियों और सरकारों के नेता बने रहते हैं जब तक कि पुलिस या अदालत में फंसने लायक वजनदार कोई मामला उनके खिलाफ सीना तानकर खड़ा न हो जाए। क्या एक महिला की अध्यक्षता वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी, कांगे्रस अपनी पार्टी के लोगों के लिए कोई नियम-कायदे सामने रखेगी?
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