13 सितंबर 2011
कानून बेदिमाग कैसे होता है इसकी एक शानदार मिसाल अभी सामने आई जब आयकर ट्रिब्यूनल ने यह फैसला दिया कि नरसिंह राव सरकार को बचाने के वक्त झारखंड मुक्तिमोर्चा के सांसदों को मिली रिश्वत इसलिए टैक्स फ्री है क्योंकि वह मोर्चा ने अपने को मिला राजनीतिक दान बताया है। ऐसे चार सांसदों को मिली रिश्वत उन्होंने अपने निजी बैंक खातों में जमाकर दिया था। बाद में उन्होंने उनके खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार निवारण मामले में यह मंजूर भी किया था कि विश्वास मत पर साथ देने के लिए कांगे्रस पार्टी ने उन्हें यह रिश्वत दी थी। बाद में वे अदालत से इस आधार पर बरी हो गए थे कि संविधान के तहत सांसदों को इस मामले में अदालत की पहुंच से बाहर रखा गया है। इस रिश्वत के इनकम टैक्स से भी आजाद रहने के बाद यह पूरा मामला कानून की मसखरी करता हुआ लगता है। और ऐसे ही एक दूसरे मामले में जिसमें सांसदों को संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों कैमरे पर पकड़ा गया था, उनको भी संसद द्वारा दी गई बर्खास्तगी की सजा के अलावा और कोई सजा नहीं दी गई। देश का कानून संसद के भीतर के भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता और यही वजह है कि आज जब अन्ना हजारे की टोली सांसदों को गालियां देती है, संसद का अपमान करती है, तो यह बात गलत होने पर भी देश में शायद किसी को नहीं खटकती।
बोलचाल की जुबान में कहा जाता है कि यह अंधा कानून है। लेकिन हम इस भाषा को भी बदलना चाहते हैं क्योंकि यह नेत्रहीन लोगों के लिए अपमानजनक है। कानून किस तरह तंग सीमाओं में कैद होता है यह दिखाने के लिए सांसदों के ये मामले बहुत मददगार हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के तौर-तरीकों से पूरी तरह असहमत रहते हुए भी हम उनके उठाए हुए मुद्दों को महत्वपूर्ण मानते हैं और चुनाव सुधार को लेकर जो बातें वे कर रहे हैं उन पर भी देश में एक खुली बहस होनी चाहिए। चूंकि आज की बातचीत यह सिलसिला सांसदों के भ्रष्टाचार से शुरू हुआ है इसलिए हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि चुनाव कानून के ढीले होने से इस देश में चुनाव लगातार भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं और एक तरफ जहां लोगों को लगता है कि अब पहले की तरह बूथ पर कब्जा करके वोट छाप देने का सिलसिला खत्म हो गया है तो दूसरी तरफ यह भी बहुत साफ दिखता है कि पैसों का खेल किस कदर बढ़ गया है। अब बंदूकों की नोंक पर बूथ पर काबिज होने की जरूरत नहीं रहती, अब वोटरों के एक हिस्से को खरीदकर अहिंसक तरीके से लोकतंत्र का गला रेत दिया जाता है। चूंकि कानून को गला रेतने का यह लहू दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए देश को लगता है कि चुनावों में हिंसा अब खत्म हो गई है। लेकिन करोड़ों के अवैध खर्च की वजह से अब पार्टियां अरबपतियों को अधिक टिकटें दे रही हैं और वे संसद की सीटें अधिक खरीद रहे हैं। हमारी तो यह भी सोच है कि जिस तरह जातियों के आधार पर संसद या विधानसभा में लोगों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं, उसी तरह एक यह सीमा तय करनी चाहिए कि कोई भी पार्टी अपनी कितनी फीसदी सीटें करोड़पतियों और अरबपतियों को दे सकती है? यह इसलिए भी जरूरी है कि अब संसद में गरीबों के मुद्दों पर चर्चा करने वाले लोग घटते चले जा रहे हैं और बड़े-बड़े कारोबार से जिनके हित जुड़े हुए हैं वे संसद और विधानसभाओं में बढ़ चुके हैं, बढ़ते चले जा रहे हैं। जिस तरह महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए महिला आरक्षण जरूरी है, उसी तरह गरीबों को चुनाव की टिकटों के दौरान अच्छा खासा मौका मिलने का कानूनी इंतजाम होना चाहिए। यह आरक्षण एक अधिक असरदार आरक्षण होगा क्योंकि आज के आरक्षित तबकों में से जब तक अधिक आयवर्ग या संपन्नता वाले मलाईदार तबके को अलग नहीं किया जाएगा तब तक इन कमजोर तबकों को आरक्षण का फायदा देने के संवैधानिक प्रावधान का फायदा सचमुच कमजोर लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता।
यह चुनाव सुधार पर बातचीत का वक्त इसलिए भी है क्योंकि आज हर किस्म के अपराधी, चुनाव कानून में तरह-तरह के छेद तलाशकर उसके रास्ते संसद और विधानसभाओं तक पहुंच रहे हैं। कानून को ऐसा असरदार बनाने की जरूरत है कि भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को संसद और विधानसभाओं से बाहर रखा जा सके। पिछले दिनों हमने संसद के समय के इस्तेमाल के बारे में लिखा ही है और देश की जनता अगर संसद और विधानसभा से, बाकी लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाओं से निराश है, तो यह तस्वीर भी बदलनी चाहिए वरना अन्ना हजारे जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोग भी देश की जनता को लोकतांत्रिक लगते रहेंगे।
फिलहाल हम इस बेदिमाग कानून को तो तुरंत सुधारने की मांग करते हैं जिसके तहत संसद के भीतर की रिश्वतखोरी के मामले भी कानून से परे हैं और जिन पर खुद सजा देने से संसद बची है। संसद की सदस्यता को खत्म करने को हम पर्याप्त सजा नहीं मानते और हमारा मानना है कि रिश्वत लेने वाले सांसदों को कैद देने का काम संसद को करना चाहिए था और वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई है। सांसदों के तबके को ही अगर भ्रष्ट सांसदों को सजा देने कहा जाएगा तो उसका यही हाल होगा। संसद का पूरा बर्ताव प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के ठीक खिलाफ है, और अपने भ्रष्ट-रिश्वतखोर सदस्यों को सजा न देने के लिए संसद देश के लिए जवाबदेह भी है, और ऐसा न करने पर वह अपने-आपको अन्ना-टोली की गालियों का हकदार ही साबित करके दिखाएगी।
कानून बेदिमाग कैसे होता है इसकी एक शानदार मिसाल अभी सामने आई जब आयकर ट्रिब्यूनल ने यह फैसला दिया कि नरसिंह राव सरकार को बचाने के वक्त झारखंड मुक्तिमोर्चा के सांसदों को मिली रिश्वत इसलिए टैक्स फ्री है क्योंकि वह मोर्चा ने अपने को मिला राजनीतिक दान बताया है। ऐसे चार सांसदों को मिली रिश्वत उन्होंने अपने निजी बैंक खातों में जमाकर दिया था। बाद में उन्होंने उनके खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार निवारण मामले में यह मंजूर भी किया था कि विश्वास मत पर साथ देने के लिए कांगे्रस पार्टी ने उन्हें यह रिश्वत दी थी। बाद में वे अदालत से इस आधार पर बरी हो गए थे कि संविधान के तहत सांसदों को इस मामले में अदालत की पहुंच से बाहर रखा गया है। इस रिश्वत के इनकम टैक्स से भी आजाद रहने के बाद यह पूरा मामला कानून की मसखरी करता हुआ लगता है। और ऐसे ही एक दूसरे मामले में जिसमें सांसदों को संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों कैमरे पर पकड़ा गया था, उनको भी संसद द्वारा दी गई बर्खास्तगी की सजा के अलावा और कोई सजा नहीं दी गई। देश का कानून संसद के भीतर के भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता और यही वजह है कि आज जब अन्ना हजारे की टोली सांसदों को गालियां देती है, संसद का अपमान करती है, तो यह बात गलत होने पर भी देश में शायद किसी को नहीं खटकती।
बोलचाल की जुबान में कहा जाता है कि यह अंधा कानून है। लेकिन हम इस भाषा को भी बदलना चाहते हैं क्योंकि यह नेत्रहीन लोगों के लिए अपमानजनक है। कानून किस तरह तंग सीमाओं में कैद होता है यह दिखाने के लिए सांसदों के ये मामले बहुत मददगार हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के तौर-तरीकों से पूरी तरह असहमत रहते हुए भी हम उनके उठाए हुए मुद्दों को महत्वपूर्ण मानते हैं और चुनाव सुधार को लेकर जो बातें वे कर रहे हैं उन पर भी देश में एक खुली बहस होनी चाहिए। चूंकि आज की बातचीत यह सिलसिला सांसदों के भ्रष्टाचार से शुरू हुआ है इसलिए हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि चुनाव कानून के ढीले होने से इस देश में चुनाव लगातार भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं और एक तरफ जहां लोगों को लगता है कि अब पहले की तरह बूथ पर कब्जा करके वोट छाप देने का सिलसिला खत्म हो गया है तो दूसरी तरफ यह भी बहुत साफ दिखता है कि पैसों का खेल किस कदर बढ़ गया है। अब बंदूकों की नोंक पर बूथ पर काबिज होने की जरूरत नहीं रहती, अब वोटरों के एक हिस्से को खरीदकर अहिंसक तरीके से लोकतंत्र का गला रेत दिया जाता है। चूंकि कानून को गला रेतने का यह लहू दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए देश को लगता है कि चुनावों में हिंसा अब खत्म हो गई है। लेकिन करोड़ों के अवैध खर्च की वजह से अब पार्टियां अरबपतियों को अधिक टिकटें दे रही हैं और वे संसद की सीटें अधिक खरीद रहे हैं। हमारी तो यह भी सोच है कि जिस तरह जातियों के आधार पर संसद या विधानसभा में लोगों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं, उसी तरह एक यह सीमा तय करनी चाहिए कि कोई भी पार्टी अपनी कितनी फीसदी सीटें करोड़पतियों और अरबपतियों को दे सकती है? यह इसलिए भी जरूरी है कि अब संसद में गरीबों के मुद्दों पर चर्चा करने वाले लोग घटते चले जा रहे हैं और बड़े-बड़े कारोबार से जिनके हित जुड़े हुए हैं वे संसद और विधानसभाओं में बढ़ चुके हैं, बढ़ते चले जा रहे हैं। जिस तरह महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए महिला आरक्षण जरूरी है, उसी तरह गरीबों को चुनाव की टिकटों के दौरान अच्छा खासा मौका मिलने का कानूनी इंतजाम होना चाहिए। यह आरक्षण एक अधिक असरदार आरक्षण होगा क्योंकि आज के आरक्षित तबकों में से जब तक अधिक आयवर्ग या संपन्नता वाले मलाईदार तबके को अलग नहीं किया जाएगा तब तक इन कमजोर तबकों को आरक्षण का फायदा देने के संवैधानिक प्रावधान का फायदा सचमुच कमजोर लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता।
यह चुनाव सुधार पर बातचीत का वक्त इसलिए भी है क्योंकि आज हर किस्म के अपराधी, चुनाव कानून में तरह-तरह के छेद तलाशकर उसके रास्ते संसद और विधानसभाओं तक पहुंच रहे हैं। कानून को ऐसा असरदार बनाने की जरूरत है कि भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को संसद और विधानसभाओं से बाहर रखा जा सके। पिछले दिनों हमने संसद के समय के इस्तेमाल के बारे में लिखा ही है और देश की जनता अगर संसद और विधानसभा से, बाकी लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाओं से निराश है, तो यह तस्वीर भी बदलनी चाहिए वरना अन्ना हजारे जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोग भी देश की जनता को लोकतांत्रिक लगते रहेंगे।
फिलहाल हम इस बेदिमाग कानून को तो तुरंत सुधारने की मांग करते हैं जिसके तहत संसद के भीतर की रिश्वतखोरी के मामले भी कानून से परे हैं और जिन पर खुद सजा देने से संसद बची है। संसद की सदस्यता को खत्म करने को हम पर्याप्त सजा नहीं मानते और हमारा मानना है कि रिश्वत लेने वाले सांसदों को कैद देने का काम संसद को करना चाहिए था और वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई है। सांसदों के तबके को ही अगर भ्रष्ट सांसदों को सजा देने कहा जाएगा तो उसका यही हाल होगा। संसद का पूरा बर्ताव प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के ठीक खिलाफ है, और अपने भ्रष्ट-रिश्वतखोर सदस्यों को सजा न देने के लिए संसद देश के लिए जवाबदेह भी है, और ऐसा न करने पर वह अपने-आपको अन्ना-टोली की गालियों का हकदार ही साबित करके दिखाएगी।
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