17 सितंबर 2011
महंगाई को लेकर पूरे देश की जनता का अधिकतर हिस्सा बहुत तकलीफ में है। निम्न और मध्यम आयवर्ग के लोग रोज की जिंदगी जीना बहुत मुश्किल पा रहे हैं। एक छोटी सी राहत की बात यह है कि सबसे कमजोर तबका सरकार की अलग-अलग रोजगार योजनाओं और रियायती राशन जैसी छूट के चलते महंगाई की मार को मध्यम वर्ग के मुकाबले कुछ कम कड़क पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी जरूरतें बहुत सीमित हैं। लेकिन कुल मिलाकर महंगाई से लोग इस कदर तकलीफ में हैं।
महंगाई की मार उस वक्त लोगों को और तकलीफ दे जाती है जब जनता रात-दिन यह पढ़ती है कि उसकी सेवा करने के नाम पर जो लोग सत्ता चला रहे हैं, वे नेता-अफसर, ठेकेदारों और कारोबारियों के साथ मिलकर जनता के हक को निचोड़ ले रहे हैं और उनकी दौलत जंगल के हिरन की तरह छलांगें लगाकर आगे बढ़ रही हैं। यह सिलसिला लगातार एक खतरनाक खाई की तरफ बढ़ रहा है जब लोगों का सब्र उसमें छलांग लगाकर मरने को तैयार हो जाए या उस खाई में किसी को धकेलकर मारने के लिए तैयार हो जाए। इस देश की तमाम भ्रष्ट और दुष्ट ताकतों के लिए आज यह एक राहत की बात है कि महंगाई की मार से सबसे अधिक तकलीफ पाने वाला तबका समाज का सबसे कमजोर तबका नहीं है। सफेद कॉलर वाले लोग बगावत से खासे दूर रहते हैं क्योंकि शहरी या संपन्न सहूलियतें उन्हें खतरा उठाकर बागी तेवर अपनाने से रोक देती हैं। लोगों की आदतें सहूलियतों से ऐसी हो जाती हैं कि वे कोई हथियार उठाने का दमखम नहीं रख पाते।
हम किसी हिंसा की तारीफ नहीं कर रहे और उसकी वकालत नहीं कर रहे, लेकिन देश की हकीकत यह है कि लोगों के मन में सत्ता भोग रहे लोगों के लिए नफरत के अलावा और कुछ नहीं है, और हाथों के खाली रहने पर भी अपने मन में वे तरह-तरह के हथियार उठाने की सोचते रहते हैं। जब लोग देखते हैं कि एक-एक नेता सैकड़ों और हजारों करोड़ कमा रहा है, जब एक-एक घोटाला दसियों हजार करोड़ से लाख-लाख करोड़ का हो रहा है तो उन्हें लगता है कि अगर जनता के हक की ऐसी लूटमार न हुई होती तो क्या देश में इतनी महंगाई हुई होती? जब लोग महंगा अनाज खरीदते हैं, दाल और तेल खरीद नहीं पाते, घर के बीमार के लिए दवाई नहीं खरीद पाते, तो नेताओं की असल दौलत के दो-चार फीसदी जैसे मामूली घोषित फर्जी आंकड़े उनकी आंखों में पिसी मिर्च की तरह जलने लगते हैं। ऐसी नफरत के बीच जीने को बेबस जनता न तो अपनी जिंदगी जी पाती और न ही इस देश के लिए उतना कुछ कर पाती जितना करने की उसकी ताकत हो सकती थी।
हम नारों पर जाना नहीं चाहते लेकिन अगर किसी वक्त यह देश सोने की चिडिय़ा रहा होगा तो तब से लेकर अब तक देशी राजाओं ने, मुगलों ने, अंगे्रजों ने, और अब आजाद हिंदुस्तानी तानाशाह-लुटेरे शासकों ने इस चिडिय़ा के सारे पंख नोंच दिए हैं और सोने के अंडों की चाह में इसके पेट को चीर दिया है। लेकिन इस देश की संभावनाएं इतनी अधिक थीं, कि इसके बावजूद यह चिडिय़ा अब तक जिंदा है। कोई अगर इस देश के पिछले कुछ दशकों के आर्थिक विकास को एक बड़ी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपाता है, तो यह समझने की जरूरत है कि ऐसी पीठ वाला की वजह से इतना विकास नहीं हुआ है, उनके बावजूद इतना विकास हुआ है, उनके रहते हुए इतना विकास फिर भी हो ही गया है। ऐसा देश अपने लोगों के ठीक से जीने का सामान नहीं दे पा रहा है और देश भर में सत्ता पर काबिज लोग सबसे गरीब लोगों के हक की सार्वजनिक संपत्ति को लूट रहे हैं, सरकार की योजनाओं में डाका डाल रहे हैं और लोकतंत्र पर जनता की आस्था के साथ बलात्कार कर रहे हैं।
कोई अगर यह समझता है कि देश की महंगाई डायन है तो देश के असली राक्षस तो झंडे और बत्तियों वाली गाडिय़ों ने सलामी लेते घूम रहे हैं, और जनता महंगाई से अपनी रोज की जिंदगी बचाने के लिए दौड़-भाग कर रही है। यह सिलसिला इंसानियत के लिए (यह भी एक बार तय हो जाए कि इंसानियत आखिर किस और कैसे इंसान को लेकर बना हुआ शब्द है?) खतरनाक है और लोकतंत्र के लिए भी। इससे जिस दिन शहरी लोगों के मन में नफरत हथियार उठा लेगी उस दिन पूरे देश के शहर नक्सली इलाके बन जाएंगे।
महंगाई को लेकर पूरे देश की जनता का अधिकतर हिस्सा बहुत तकलीफ में है। निम्न और मध्यम आयवर्ग के लोग रोज की जिंदगी जीना बहुत मुश्किल पा रहे हैं। एक छोटी सी राहत की बात यह है कि सबसे कमजोर तबका सरकार की अलग-अलग रोजगार योजनाओं और रियायती राशन जैसी छूट के चलते महंगाई की मार को मध्यम वर्ग के मुकाबले कुछ कम कड़क पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी जरूरतें बहुत सीमित हैं। लेकिन कुल मिलाकर महंगाई से लोग इस कदर तकलीफ में हैं।
महंगाई की मार उस वक्त लोगों को और तकलीफ दे जाती है जब जनता रात-दिन यह पढ़ती है कि उसकी सेवा करने के नाम पर जो लोग सत्ता चला रहे हैं, वे नेता-अफसर, ठेकेदारों और कारोबारियों के साथ मिलकर जनता के हक को निचोड़ ले रहे हैं और उनकी दौलत जंगल के हिरन की तरह छलांगें लगाकर आगे बढ़ रही हैं। यह सिलसिला लगातार एक खतरनाक खाई की तरफ बढ़ रहा है जब लोगों का सब्र उसमें छलांग लगाकर मरने को तैयार हो जाए या उस खाई में किसी को धकेलकर मारने के लिए तैयार हो जाए। इस देश की तमाम भ्रष्ट और दुष्ट ताकतों के लिए आज यह एक राहत की बात है कि महंगाई की मार से सबसे अधिक तकलीफ पाने वाला तबका समाज का सबसे कमजोर तबका नहीं है। सफेद कॉलर वाले लोग बगावत से खासे दूर रहते हैं क्योंकि शहरी या संपन्न सहूलियतें उन्हें खतरा उठाकर बागी तेवर अपनाने से रोक देती हैं। लोगों की आदतें सहूलियतों से ऐसी हो जाती हैं कि वे कोई हथियार उठाने का दमखम नहीं रख पाते।
हम किसी हिंसा की तारीफ नहीं कर रहे और उसकी वकालत नहीं कर रहे, लेकिन देश की हकीकत यह है कि लोगों के मन में सत्ता भोग रहे लोगों के लिए नफरत के अलावा और कुछ नहीं है, और हाथों के खाली रहने पर भी अपने मन में वे तरह-तरह के हथियार उठाने की सोचते रहते हैं। जब लोग देखते हैं कि एक-एक नेता सैकड़ों और हजारों करोड़ कमा रहा है, जब एक-एक घोटाला दसियों हजार करोड़ से लाख-लाख करोड़ का हो रहा है तो उन्हें लगता है कि अगर जनता के हक की ऐसी लूटमार न हुई होती तो क्या देश में इतनी महंगाई हुई होती? जब लोग महंगा अनाज खरीदते हैं, दाल और तेल खरीद नहीं पाते, घर के बीमार के लिए दवाई नहीं खरीद पाते, तो नेताओं की असल दौलत के दो-चार फीसदी जैसे मामूली घोषित फर्जी आंकड़े उनकी आंखों में पिसी मिर्च की तरह जलने लगते हैं। ऐसी नफरत के बीच जीने को बेबस जनता न तो अपनी जिंदगी जी पाती और न ही इस देश के लिए उतना कुछ कर पाती जितना करने की उसकी ताकत हो सकती थी।
हम नारों पर जाना नहीं चाहते लेकिन अगर किसी वक्त यह देश सोने की चिडिय़ा रहा होगा तो तब से लेकर अब तक देशी राजाओं ने, मुगलों ने, अंगे्रजों ने, और अब आजाद हिंदुस्तानी तानाशाह-लुटेरे शासकों ने इस चिडिय़ा के सारे पंख नोंच दिए हैं और सोने के अंडों की चाह में इसके पेट को चीर दिया है। लेकिन इस देश की संभावनाएं इतनी अधिक थीं, कि इसके बावजूद यह चिडिय़ा अब तक जिंदा है। कोई अगर इस देश के पिछले कुछ दशकों के आर्थिक विकास को एक बड़ी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपाता है, तो यह समझने की जरूरत है कि ऐसी पीठ वाला की वजह से इतना विकास नहीं हुआ है, उनके बावजूद इतना विकास हुआ है, उनके रहते हुए इतना विकास फिर भी हो ही गया है। ऐसा देश अपने लोगों के ठीक से जीने का सामान नहीं दे पा रहा है और देश भर में सत्ता पर काबिज लोग सबसे गरीब लोगों के हक की सार्वजनिक संपत्ति को लूट रहे हैं, सरकार की योजनाओं में डाका डाल रहे हैं और लोकतंत्र पर जनता की आस्था के साथ बलात्कार कर रहे हैं।
कोई अगर यह समझता है कि देश की महंगाई डायन है तो देश के असली राक्षस तो झंडे और बत्तियों वाली गाडिय़ों ने सलामी लेते घूम रहे हैं, और जनता महंगाई से अपनी रोज की जिंदगी बचाने के लिए दौड़-भाग कर रही है। यह सिलसिला इंसानियत के लिए (यह भी एक बार तय हो जाए कि इंसानियत आखिर किस और कैसे इंसान को लेकर बना हुआ शब्द है?) खतरनाक है और लोकतंत्र के लिए भी। इससे जिस दिन शहरी लोगों के मन में नफरत हथियार उठा लेगी उस दिन पूरे देश के शहर नक्सली इलाके बन जाएंगे।
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