21 सितंबर 11
योजना आयोग ने भारत में गरीबी का पैमाना तय करते हुए जब यह कहा कि गांव के गरीब वे हैं जिनका हर दिन का खर्च पचीस रूपए से कम है और शहर के गरीब वे हैं जिनका हर दिन का खर्च बत्तीस रूपए से कम है तो इससे बहुत से लोगों को एक झटका लगा। सरकार पिछली चौथाई सदी में धीरे-धीरे अपना हाथ बिजली और पानी की रियायतों से खींच रही है, डीजल पर से रियायत कम या खत्म सी हो गई है, सड़कों के निजीकरण से गरीबों की बस महंगी हो गई है, खाने के सामानों में चूल्हे पर चढऩे से पहले ही बाजार में आग लगी हुई है, और गरीब-बीमार के लिए इलाज नामुमकिन सा काम हो गया है, जब तक कि वे कुछ कर्ज न जुटा पाएं। ऐसे में सरकार का यह पैमाना एक सदमा पहुंचाता है। हम अभी दो-चार दिनों के भीतर ही यह बात लिख चुके हैं कि गरीबी को लेकर एक बड़ा सदमा इसलिए भी लगता है कि इन गरीबों के लिए सरकार चलाने वाले लोग लगातार डकैती करके अमीर हुए जा रहे हैं। और इसमें कांगे्रस और भाजपा के बीच किसी किस्म का कोई मतभेद नहीं है। एक तरफ कलमाड़ी और राजा जैसे कांगे्रस-यूपीए के लोग हैं तो दूसरी तरफ बेल्लारी के भाजपा मंत्री रहे रेड्डी हैं जिनके बारे में आज यह रिपोर्ट आई है कि वे कर्नाटक के भाजपा राज के मुख्यमंत्री से भी अधिक ताकतवर मंत्री रहते हुए दूसरे खदान मालिकों से एक हजार करोड़ रूपए रंगदारी टैक्स में वसूल कर चुके थे। सीबीआई इन आंकड़ों को अदालत में पता नहीं कितना साबित कर पाएगी लेकिन जनता को इस बात का पूरा भरोसा है कि ये आंकड़े असली डकैती का एक बहुत छोटा हिस्सा है।
ऐसे देश में जहां पर कि नेताओं और अफसरों की कमाई आसमान छू रही है वहां पर गरीब के पेट से झांकती पसलियों का गुजारा जब पचीस रूपए रोज पर तय किया जाता है तो आम जनता को नक्सली हिंसा किस्म के तमाम आतंक जायज लगने लगते हैं और शायद जरूरी लगने लगते हैं कि ये शहरों में अब तक क्यों शुरू नहीं हो रहे? गरीबी के पैमाने तय करने वाले योजना आयोग की सोच एक पश्चिमी उदारवादी अर्थव्यवस्था की सोच है और इसीलिए इसके कार्यकारी मुखिया मोंतेक सिंह अहलूवालिया का नाम अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुखिया की कुर्सी के लिए भी कुछ समय पहले छिड़ा था। गरीबों के लिए हमदर्दी के बिना जब एक उदार अर्थव्यवस्था लोगों को आर्थिक एकाधिकार का साम्राज्य खड़ा करने का माहौल बनाते चलती है तो उसे गरीब की जिंदगी की लागत पचीस रूपए रोज दिखने में कोई हैरानी नहीं है। और यह लागत शायद उस वक्त काम आ भी जाए जब देश के हर गरीब को सांसदों को संसद के आलीशान रेस्त्रां में मिलने वाले रेट पर खाना मिलने लगे, उनके भाड़े के रेट पर मकान मिलने लगे, उनकी तरह मुफ्त का फोन और सफर मिलने लगे, तो जरूर पचीस रूपए रोज में काम चल सकता है। देश की संसद में जिस तरह खरबपति, अरबपति और करोड़पति भर गए हैं, कोई हैरानी नहीं कि उन्हें पचीस रूपए में गुजर सकने वाले दिन का कोई अंदाज न हो। यही हाल अफसरों का है जिनमें से ईमानदार को भी अब लाख रूपए महीने तक की तनख्वाह मिलने लगी है, तो अब पचीस रूपए का अंदाज आखिर लग किसे सकता है?
यह एक बहुत शर्मनाक हाल है और यह इस देश के माथे से गरीबी और गरीबों के आंकड़ों को पोंछ देने की एक साजिश है। इंदिरा गांधी के वक्त भी जब गरीबी हटाओ का नारा चलता था तो लोगों का अनुभव यह था कि वह गरीबों को हटाने का नारा है और उसका सबसे काला चेहरा आपातकाल में सामने आया था जब राह चलते गरीबों को उठाकर उनकी नसबंदी की गई थी और तुर्कमान गेट जैसे इलाकों से गरीबों को बुलडोजरों और गोलियों से हटाया गया था। आजादी के बाद करीब आधी सदी से अधिक का राज इसी कांगे्रस सरकार का या उसकी अगुवाई का रहा है। आज भी अगर वह पचीस रूपए रोज पर एक जिंदगी के गुजर जाने को एक पैमाना मान रही है तो इसके कम से कम कुछ नेता तो एक दिन इस रकम में गुजारकर देखें। राजनीति और सरकार को हांकने वाले लोग इस कदर भ्रष्ट और संपन्न हो चुके हैं कि उन्हें हिंदुस्तानी गरीबी की हकीकत का कोई अहसास नहीं रह गया है। वे गरीब के खाने और जीने को उसी तरह तौल रहे हैं जिस तरह तौलकर किसी मुर्गीखाने में कतार में खड़ी मुर्गियों को दाना दिया जाता है। हिंदुस्तानी गरीब से उसी तरह मर जाने की भी उम्मीद की जाती है जिस तरह मुर्गीखाने की मुर्गियों का मरना तय रहता है। आजादी के बाद पचास बरस में अपने नेताओं की दौलत को हजारों गुना बढ़ा लेने वाली कांगे्रस पार्टी में अगर सौ-दो सौ बरस बाद कोई संवेदनशील नेता आएगा तो वह उस वक्त के इतिहास में दर्ज आज के इस वक्त के अपने इन आंकड़ों को लेकर देश से माफी मांगेगा। लेकिन फिलहाल हिंदुस्तानी गरीब कटने के पहले दाने के सामने खड़े हुए मुर्गे की तरह जीता रहे।
योजना आयोग ने भारत में गरीबी का पैमाना तय करते हुए जब यह कहा कि गांव के गरीब वे हैं जिनका हर दिन का खर्च पचीस रूपए से कम है और शहर के गरीब वे हैं जिनका हर दिन का खर्च बत्तीस रूपए से कम है तो इससे बहुत से लोगों को एक झटका लगा। सरकार पिछली चौथाई सदी में धीरे-धीरे अपना हाथ बिजली और पानी की रियायतों से खींच रही है, डीजल पर से रियायत कम या खत्म सी हो गई है, सड़कों के निजीकरण से गरीबों की बस महंगी हो गई है, खाने के सामानों में चूल्हे पर चढऩे से पहले ही बाजार में आग लगी हुई है, और गरीब-बीमार के लिए इलाज नामुमकिन सा काम हो गया है, जब तक कि वे कुछ कर्ज न जुटा पाएं। ऐसे में सरकार का यह पैमाना एक सदमा पहुंचाता है। हम अभी दो-चार दिनों के भीतर ही यह बात लिख चुके हैं कि गरीबी को लेकर एक बड़ा सदमा इसलिए भी लगता है कि इन गरीबों के लिए सरकार चलाने वाले लोग लगातार डकैती करके अमीर हुए जा रहे हैं। और इसमें कांगे्रस और भाजपा के बीच किसी किस्म का कोई मतभेद नहीं है। एक तरफ कलमाड़ी और राजा जैसे कांगे्रस-यूपीए के लोग हैं तो दूसरी तरफ बेल्लारी के भाजपा मंत्री रहे रेड्डी हैं जिनके बारे में आज यह रिपोर्ट आई है कि वे कर्नाटक के भाजपा राज के मुख्यमंत्री से भी अधिक ताकतवर मंत्री रहते हुए दूसरे खदान मालिकों से एक हजार करोड़ रूपए रंगदारी टैक्स में वसूल कर चुके थे। सीबीआई इन आंकड़ों को अदालत में पता नहीं कितना साबित कर पाएगी लेकिन जनता को इस बात का पूरा भरोसा है कि ये आंकड़े असली डकैती का एक बहुत छोटा हिस्सा है।
ऐसे देश में जहां पर कि नेताओं और अफसरों की कमाई आसमान छू रही है वहां पर गरीब के पेट से झांकती पसलियों का गुजारा जब पचीस रूपए रोज पर तय किया जाता है तो आम जनता को नक्सली हिंसा किस्म के तमाम आतंक जायज लगने लगते हैं और शायद जरूरी लगने लगते हैं कि ये शहरों में अब तक क्यों शुरू नहीं हो रहे? गरीबी के पैमाने तय करने वाले योजना आयोग की सोच एक पश्चिमी उदारवादी अर्थव्यवस्था की सोच है और इसीलिए इसके कार्यकारी मुखिया मोंतेक सिंह अहलूवालिया का नाम अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुखिया की कुर्सी के लिए भी कुछ समय पहले छिड़ा था। गरीबों के लिए हमदर्दी के बिना जब एक उदार अर्थव्यवस्था लोगों को आर्थिक एकाधिकार का साम्राज्य खड़ा करने का माहौल बनाते चलती है तो उसे गरीब की जिंदगी की लागत पचीस रूपए रोज दिखने में कोई हैरानी नहीं है। और यह लागत शायद उस वक्त काम आ भी जाए जब देश के हर गरीब को सांसदों को संसद के आलीशान रेस्त्रां में मिलने वाले रेट पर खाना मिलने लगे, उनके भाड़े के रेट पर मकान मिलने लगे, उनकी तरह मुफ्त का फोन और सफर मिलने लगे, तो जरूर पचीस रूपए रोज में काम चल सकता है। देश की संसद में जिस तरह खरबपति, अरबपति और करोड़पति भर गए हैं, कोई हैरानी नहीं कि उन्हें पचीस रूपए में गुजर सकने वाले दिन का कोई अंदाज न हो। यही हाल अफसरों का है जिनमें से ईमानदार को भी अब लाख रूपए महीने तक की तनख्वाह मिलने लगी है, तो अब पचीस रूपए का अंदाज आखिर लग किसे सकता है?
यह एक बहुत शर्मनाक हाल है और यह इस देश के माथे से गरीबी और गरीबों के आंकड़ों को पोंछ देने की एक साजिश है। इंदिरा गांधी के वक्त भी जब गरीबी हटाओ का नारा चलता था तो लोगों का अनुभव यह था कि वह गरीबों को हटाने का नारा है और उसका सबसे काला चेहरा आपातकाल में सामने आया था जब राह चलते गरीबों को उठाकर उनकी नसबंदी की गई थी और तुर्कमान गेट जैसे इलाकों से गरीबों को बुलडोजरों और गोलियों से हटाया गया था। आजादी के बाद करीब आधी सदी से अधिक का राज इसी कांगे्रस सरकार का या उसकी अगुवाई का रहा है। आज भी अगर वह पचीस रूपए रोज पर एक जिंदगी के गुजर जाने को एक पैमाना मान रही है तो इसके कम से कम कुछ नेता तो एक दिन इस रकम में गुजारकर देखें। राजनीति और सरकार को हांकने वाले लोग इस कदर भ्रष्ट और संपन्न हो चुके हैं कि उन्हें हिंदुस्तानी गरीबी की हकीकत का कोई अहसास नहीं रह गया है। वे गरीब के खाने और जीने को उसी तरह तौल रहे हैं जिस तरह तौलकर किसी मुर्गीखाने में कतार में खड़ी मुर्गियों को दाना दिया जाता है। हिंदुस्तानी गरीब से उसी तरह मर जाने की भी उम्मीद की जाती है जिस तरह मुर्गीखाने की मुर्गियों का मरना तय रहता है। आजादी के बाद पचास बरस में अपने नेताओं की दौलत को हजारों गुना बढ़ा लेने वाली कांगे्रस पार्टी में अगर सौ-दो सौ बरस बाद कोई संवेदनशील नेता आएगा तो वह उस वक्त के इतिहास में दर्ज आज के इस वक्त के अपने इन आंकड़ों को लेकर देश से माफी मांगेगा। लेकिन फिलहाल हिंदुस्तानी गरीब कटने के पहले दाने के सामने खड़े हुए मुर्गे की तरह जीता रहे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें