22 सितंबर 11
पी. चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते हुए अफवाहों के बाजार में ऐसी चर्चा रहती थी कि उनका बेटा एक ऐसी कंपनी चलाता है जो कि शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान मोटी कमाई करती है। और वित्त मंत्री के रूप में शेयर बाजार में ऐसे उतार-चढ़ाव पैदा करना किसी के लिए भी एक मामूली बात हो सकती है। लेकिन यह बात सिर्फ अफवाहों तक रही और चिदंबरम किसी बड़े दाग से बचे रहे। लेकिन कल उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी ने जो दस्तावेज पेश किए उसमें वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन में किस-किस मंत्री की क्या भूमिका रही इसके बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए एक पत्र की कॉपी भी है जिसमें पिछले वित्त मंत्री चिदंबरम की भूमिका गहरे शक से घिर जाती है। जब यूपीए के गठबंधन में डीएमके के मंत्री राजा लंबा भ्रष्टाचार करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन में देश को लाख-दो लाख करोड़ का चूना लगा रहे थे तब वित्त मंत्री से जितनी दखल की उम्मीद की जाती थी उतनी उम्मीद उन्होंने नहीं की और चुप रहकर इस भ्रष्टाचार को देखते रहे। प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से गए तथ्य-पत्र में यह बात खुलकर उजागर हुई है और सूचना के अधिकार के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से निकाले गए इस पत्र का चिदंबरम के खिलाफ एक धमाकेदार इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के भीतर और बाहर दोनों जगह कल हुआ है।
पी. चिदंबरम सरकार और राजनीति से परे सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील हैं और उनकी बीवी अभी भी वकालत करती हैं। इसलिए नाजुक और जटिल मामलों पर उनकी कानूनी समझ को कम नहीं आंका जा सकता। वे सीधे जनता की अदालत से आए हुए सांसद से मंत्री बने हुए नेता नहीं हैं और वे देश के सौ-पचास सबसे बड़े वकीलों में से एक होंगे। इसलिए उनकी समझ को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता। जब देश में तरह-तरह के भ्रष्टाचार को लेकर रोज ही मामले उस समय भी उठ रहे थे तब चिदंबरम ने सरकार की संभावित कमाई को नाली में बहा देने जैसे दिख रहे 2जी फैसले को क्यों चुप रहकर हो जाने दिया यह हैरानी की बात है। एक वित्त मंत्री के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे गठबंधन के तमिल साथी के बजाय देश की जनता के खजाने का अधिक ख्याल रखते।
लेकिन यहां पर एक दूसरी बात भी सामने आती है। जब यह पूरा मामला प्रधानमंत्री के दफ्तर तक पहुंच गया था तो उसके बाद प्रधानमंत्री ने उस पर क्या किया? यह पूरा सिलसिला एक निहायत भ्रष्ट मंत्री की साजिश के जानकारी में आ जाने के बाद वित्त मंत्री द्वारा अनदेखा करने, प्रधानमंत्री द्वारा अनदेखा करने का मामला है और हम इसे किसी भी तरह प्रधानमंत्री की लापरवाही, भागीदारी, हिस्सेदारी को जिम्मेदार ठहराने से कम का मामला नहीं मान सकते। पाठकों को ध्यान होगा कि हम पिछले महीनों में बहुत बार यह बात लिख चुके हैं कि मंत्रिमंडल के मुखिया को मंत्रिमंडल के अपराधों की जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता और मनमोहन सिंह पर इस साजिश में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल होने या रहने को लेकर मुकदमा चलाना चाहिए। अब प्रणब मुखर्जी की जैसी भूमिका सामने आई है, उस पर उनके पास अगर कोई ठोस जवाब न हो, इस सुबूत को काटने के सुबूत न हों तो उन्हें भी इस साजिश में भागीदार मानकर अदालत में उन्हें पेश करना चाहिए। प्राकृतिक न्याय की मांग यह रहती है कि ऊपर बैठे लोग अपने-आपको संदेह से परे रखें। जब राज चलते थे तो यह बात राजाओं पर लागू होती थी कि सीजर की बीवी को शक से ऊपर रहना चाहिए, और अब जब लोकतंत्र है तो ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों को मामूली अपराधी की तरह अदालती कटघरे में संदेह का लाभ तलाशने के बजाय अपने-आपको एक पारदर्शी जांच के लिए पेश करना चाहिए। ऐसा न करके यूपीए और कांगे्रस के मंत्री इस पूरे गठबंधन को अगले चुनाव की संभावनाओं से दूर तो कर ही रहे हैं, देश के साथ बहुत बड़ी गद्दारी भी कर रहे हैं। हम राजनीति की, इस लोकतंत्र में चुनाव के अलग-अलग पहलुओं की बारीकियों पर जाने के बजाय जब एक नजर में आज देश की सरकार को देखते हैं तो यह साफ लगता है कि पिछले आम चुनाव में उसे पांच बरस राज करने का जो हक मिला था आज वह उस हक को पूरी तरह खो चुकी है। खुद प्रधानमंत्री बनने के बजाय उस वक्त काबिल और ईमानदार समझे जाने वाले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर सोनिया गांधी ने अपने उस 'त्यागÓ के लिए जो वाहवाही पाई थी, वह वाहवाही भी अब सोनिया गांधी के नाम के साथ किसी को याद भी नहीं पड़ती। जो मनमोहन सिंह एक वक्त ईमानदार समझे जाते थे वे आज एक अपराधी मंत्रिमंडल के सरदार की तरह दिख रहे हैं, जिनके घर दौलत का कोई हिस्सा पहुंचा हो या न पहुंचा हो इससे इस लुटे हुए देश की लुटी हुई जनता का कोई वास्ता न है न रहने की कोई जरूरत है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इन दोनों की अगुवाई में पिछले बरसों में इस सरकार ने जितने किस्म की लूटपाट की है, उससे उसके चले जाने की नौबत कबकी जा चुकी है। आज कानून किसी सरकार को कितने भी अपराधों के बाद हटाने का नहीं है इसलिए ये सब देश को और लूट लेने की गुंजाइश वाली जगहों पर जमे हुए हैं, लेकिन कब तक?
पी. चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते हुए अफवाहों के बाजार में ऐसी चर्चा रहती थी कि उनका बेटा एक ऐसी कंपनी चलाता है जो कि शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान मोटी कमाई करती है। और वित्त मंत्री के रूप में शेयर बाजार में ऐसे उतार-चढ़ाव पैदा करना किसी के लिए भी एक मामूली बात हो सकती है। लेकिन यह बात सिर्फ अफवाहों तक रही और चिदंबरम किसी बड़े दाग से बचे रहे। लेकिन कल उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी ने जो दस्तावेज पेश किए उसमें वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन में किस-किस मंत्री की क्या भूमिका रही इसके बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए एक पत्र की कॉपी भी है जिसमें पिछले वित्त मंत्री चिदंबरम की भूमिका गहरे शक से घिर जाती है। जब यूपीए के गठबंधन में डीएमके के मंत्री राजा लंबा भ्रष्टाचार करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन में देश को लाख-दो लाख करोड़ का चूना लगा रहे थे तब वित्त मंत्री से जितनी दखल की उम्मीद की जाती थी उतनी उम्मीद उन्होंने नहीं की और चुप रहकर इस भ्रष्टाचार को देखते रहे। प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से गए तथ्य-पत्र में यह बात खुलकर उजागर हुई है और सूचना के अधिकार के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से निकाले गए इस पत्र का चिदंबरम के खिलाफ एक धमाकेदार इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के भीतर और बाहर दोनों जगह कल हुआ है।
पी. चिदंबरम सरकार और राजनीति से परे सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील हैं और उनकी बीवी अभी भी वकालत करती हैं। इसलिए नाजुक और जटिल मामलों पर उनकी कानूनी समझ को कम नहीं आंका जा सकता। वे सीधे जनता की अदालत से आए हुए सांसद से मंत्री बने हुए नेता नहीं हैं और वे देश के सौ-पचास सबसे बड़े वकीलों में से एक होंगे। इसलिए उनकी समझ को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता। जब देश में तरह-तरह के भ्रष्टाचार को लेकर रोज ही मामले उस समय भी उठ रहे थे तब चिदंबरम ने सरकार की संभावित कमाई को नाली में बहा देने जैसे दिख रहे 2जी फैसले को क्यों चुप रहकर हो जाने दिया यह हैरानी की बात है। एक वित्त मंत्री के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे गठबंधन के तमिल साथी के बजाय देश की जनता के खजाने का अधिक ख्याल रखते।
लेकिन यहां पर एक दूसरी बात भी सामने आती है। जब यह पूरा मामला प्रधानमंत्री के दफ्तर तक पहुंच गया था तो उसके बाद प्रधानमंत्री ने उस पर क्या किया? यह पूरा सिलसिला एक निहायत भ्रष्ट मंत्री की साजिश के जानकारी में आ जाने के बाद वित्त मंत्री द्वारा अनदेखा करने, प्रधानमंत्री द्वारा अनदेखा करने का मामला है और हम इसे किसी भी तरह प्रधानमंत्री की लापरवाही, भागीदारी, हिस्सेदारी को जिम्मेदार ठहराने से कम का मामला नहीं मान सकते। पाठकों को ध्यान होगा कि हम पिछले महीनों में बहुत बार यह बात लिख चुके हैं कि मंत्रिमंडल के मुखिया को मंत्रिमंडल के अपराधों की जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता और मनमोहन सिंह पर इस साजिश में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल होने या रहने को लेकर मुकदमा चलाना चाहिए। अब प्रणब मुखर्जी की जैसी भूमिका सामने आई है, उस पर उनके पास अगर कोई ठोस जवाब न हो, इस सुबूत को काटने के सुबूत न हों तो उन्हें भी इस साजिश में भागीदार मानकर अदालत में उन्हें पेश करना चाहिए। प्राकृतिक न्याय की मांग यह रहती है कि ऊपर बैठे लोग अपने-आपको संदेह से परे रखें। जब राज चलते थे तो यह बात राजाओं पर लागू होती थी कि सीजर की बीवी को शक से ऊपर रहना चाहिए, और अब जब लोकतंत्र है तो ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों को मामूली अपराधी की तरह अदालती कटघरे में संदेह का लाभ तलाशने के बजाय अपने-आपको एक पारदर्शी जांच के लिए पेश करना चाहिए। ऐसा न करके यूपीए और कांगे्रस के मंत्री इस पूरे गठबंधन को अगले चुनाव की संभावनाओं से दूर तो कर ही रहे हैं, देश के साथ बहुत बड़ी गद्दारी भी कर रहे हैं। हम राजनीति की, इस लोकतंत्र में चुनाव के अलग-अलग पहलुओं की बारीकियों पर जाने के बजाय जब एक नजर में आज देश की सरकार को देखते हैं तो यह साफ लगता है कि पिछले आम चुनाव में उसे पांच बरस राज करने का जो हक मिला था आज वह उस हक को पूरी तरह खो चुकी है। खुद प्रधानमंत्री बनने के बजाय उस वक्त काबिल और ईमानदार समझे जाने वाले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर सोनिया गांधी ने अपने उस 'त्यागÓ के लिए जो वाहवाही पाई थी, वह वाहवाही भी अब सोनिया गांधी के नाम के साथ किसी को याद भी नहीं पड़ती। जो मनमोहन सिंह एक वक्त ईमानदार समझे जाते थे वे आज एक अपराधी मंत्रिमंडल के सरदार की तरह दिख रहे हैं, जिनके घर दौलत का कोई हिस्सा पहुंचा हो या न पहुंचा हो इससे इस लुटे हुए देश की लुटी हुई जनता का कोई वास्ता न है न रहने की कोई जरूरत है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इन दोनों की अगुवाई में पिछले बरसों में इस सरकार ने जितने किस्म की लूटपाट की है, उससे उसके चले जाने की नौबत कबकी जा चुकी है। आज कानून किसी सरकार को कितने भी अपराधों के बाद हटाने का नहीं है इसलिए ये सब देश को और लूट लेने की गुंजाइश वाली जगहों पर जमे हुए हैं, लेकिन कब तक?
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