शोएब ने क्या गलत लिखा?

25 सितंबर 2011
पाकिस्तान के तेजरफ्तार गेंदबाज शोएब अख्तर की एक किताब ने भारत के टेलीविजन समाचार चैनलों को कुछ दिनों के लिए दाना-पानी दे दिया है। सचिन के बारे में शोएब ने एक खास गेंद के बारे में लिखा कि उस पर सचिन डर गए थे और उसे खेल नहीं पाए थे। इस पर हिंदुस्तानी क्रिकेटपे्रमी, देशप्रेमी, सचिन प्रशंसक और पाकिस्तान-विरोधी तमाम लोग बुरी तरह उबल पड़े। शोएब ने पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडिय़ों और वहां के क्रिकेट मैनेजमेंट के बारे में भी बहुत सी कड़वी बातें लिखी हैं जिन्हें लेकर उन्हें जवाबी हमले का सामना भी वहीं पर झेलना पड़ रहा है। हम उन तमाम बातों के सच और झूठ के बारे में नहीं जानते लेकिन सचिन के बारे में उनकी लिखी गई एक बात और उस पर भारतीय समाचार चैनलों द्वारा खड़ा किया गया बवाल जरूर सोचने और लिखने के लायक है।
अगर किसी गेंदबाज को यह लगता है कि उसकी किसी तेजरफ्तार गेंद पर कोई बल्लेबाज सहम गया है, तो यह उसका अपना सोचना हो सकता है और यह भी हो सकता है कि शोहरत पाने की चाह से परे भी शोएब अख्तर ने ऐसा लिखा हो। कल दिन भर जब टीवी चैनलों पर यह मामला उठाया गया और लगातार शोएब के बारे में भारतीय टेलीविजन ने यह कहा कि यह शोहरत पाने की चाह है ताकि किताब अधिक बिके, तो किताब को पढ़े बिना इस तरह की बातों को रात-दिन टीवी पर दिखाने से शोएब के बारे में कुछ साबित हुआ हो या न हुआ हो, भारतीय टीवी के बारे में यह जरूर साबित हुआ कि अपने चैनल की शोहरत बढ़ाने के लिए, अपने अधिक दर्शक जुटाने के लिए उन्होंने जरूर इस विवाद को खड़ा किया है। क्रिकेट जैसे तेजरफ्तार खेल में किसी एक खिलाड़ी के सहम जाने या न सहम जाने के मुद्दे को इतना तूल देने का एक मतलब यह भी है कि लोग सचिन तेंदुलकर को इंसान से ऊपर मानते हैं। कहावतों और मुहावरों के रूप में तो ऐसा मानना ठीक है लेकिन कोई भी खिलाड़ी क्या यह कह सकता है कि वह किसी गेंद से कभी सहमा ही नहीं है? और क्रिकेट तो ऐसा खेल है जिसमें आऊट होने या न होने जैसे मामलों को दो-दो, तीन-तीन एंपायर कैमरों और कम्प्यूटरों के साथ मिलकर तय करते हैं, तो ऐसे खेल में अगर किसी खिलाड़ी को ऐसा लगा कि उसकी गेंद पर कोई सहम गया है तो क्या ऐसा लिखने के पहले कोई किसी कम्प्यूटर से सर्टिफिकेट लेकर आए?
हम आत्मकथाओं को किस्से कहानियों के मुकाबले अधिक दिलचस्प और अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। इनमें साहित्य जैसा चाहे कुछ न रहता हो लेकिन अपने वक्त के इतिहास पर अपना नजरिया जरूर रहता है। इसे उसी तरह देखना भी चाहिए और हमने इसके पहले भी कई किताबों के बारे में ऐसा लिखा है कि उन पर प्रतिबंध की मांग या उनके खिलाफ किसी प्रदर्शन या अदालती मामले मुकदमे के बजाय उनके जवाब में लिखना चाहिए। तर्कों और एक नजरिए के तथ्यों का जवाब तर्कों और जवाबी नजरिए के तथ्यों से ही होना चाहिए। कुछ लोग एक पक्ष को भक्तिभाव से देखते हुए दूसरे पक्ष को कोसना और गालियां देना शुरू कर देते हैं, जैसा कि कल से सचिन के प्रशंसक कर रहे हैं, इससे सिर्फ यही साबित होता है कि लोगों के पास तर्क की कमी है, लोगों के पास बर्दाश्त की कमी है और अपने नजरिए से परे की बात को वे किसी को कहने या लिखने देना भी नहीं चाहते। यह सिलसिला इसलिए खत्म होना चाहिए कि मानवीय सभ्यता में जैसे-जैसे लोकतंत्र दाखिल होता है वैसे-वैसे लोगों के बीच वैचारिक विविधता को लेकर सहनशीलता बढऩी चाहिए। ऐसा न होने का एक ही मतलब है कि लोगों के पास अपने मंदिरों में सदियों पहले गढ़ी गईं नग्न प्रतिमाओं को अनदेखा करने और मकबूल फिदा हुसैन के पीछे लाठी लेकर दौडऩे की बददिमागी है। ऐसी ही कमजोर समझ लोगों की आत्मकथाओं को लेकर होती है। कोई भी आत्मकथा कोई निर्विवाद इतिहास नहीं होती। आत्मकथा किसी एक व्यक्ति की नजर से उसकी अपनी जिंदगी की बात होती है जिससे दूसरे लोग सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। अब तो इंटरनेट का जमाना है जब किसी किताब का जवाब देने के लिए दूसरी किताब लिखना भी जरूरी नहीं होता और उस पर कुछ घंटों के भीतर पूरी दुनिया में उस मामले से जुड़े हुए लोगों के बीच एक ऐसी अंतहीन बहस छिड़ी जा सकती है जो कि किताब को कुछ दिनों में ही मात दे दे। किसी किताब को लेकर एक अंधा विरोध उस किताब को अधिक शोहरत दिला देता है जिससे कि सचमुच अगर कोई असहमत है तो उसका मकसद तो पिछड़ ही जाता है। इसलिए अंधे विरोध के बजाय तर्क और तथ्य से किसी बात का जवाब देना ही लोकतंत्र है, ऐसा न करके लोग किताब की बिक्री बढ़ाने में मदद करते हैं, और ऐसा करते हुए वे दरअसल अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने का काम भी करते हैं।

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