12 सितंबर 2011
मणिपुर में दस-ग्यारह बरस से आमरण अनशन कर रही शर्मिला की मोहब्बत की कहानी आज पहले पन्ने पर छप रही है जिसे लेकर इसे छापने वाले अखबार को मणिपुर के बाहर भी रोक दिया गया है। वहां पर सेना के विशेष अधिकारों वाले कानून को खत्म करने के लिए जो आंदोलन चल रहा है उसके लोगों का मानना है कि एक ब्रिटिश पत्रकार के साथ शर्मिला के प्रेम-प्रसंग की खबरें इस आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से छपवाई जा रही हैं। हालांकि इस प्यार की बात को खुद शर्मिला ने अपने इंटरव्यू में सही बताया है और यह जानकारी दी है कि अपने पे्रमी से उसकी शादी राज्य में यह कानून खत्म हो जाने के बाद ही हो सकती है। अन्ना हजारे के जैसे अनशन के ग्यारह दिन में देश का मीडिया बावला हो गया था, वैसा अनशन अस्पताल के बिस्तर पर भी शर्मिला ग्यारह बरस से कर रही है और आने वाले नवंबर में बारहवां साल शुरू हो जाएगा।
हमें मणिपुर के आंदोलकारियों के इस ताजा प्रतिबंध के पीछे बहुत समझदारी इसलिए नहीं दिखती है कि आंदोलन के नेता के एक स्वाभाविक और पूरी तरह कानूनी प्यार से इस आंदोलन को क्यों कोई नुकसान पहुंचना चाहिए? भारत के कुछ हिस्सों में तो अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच प्यार और शादी को लेकर कत्ल तक की नौबत आती है लेकिन बारह बरस से आंदोलन पर बैठी हुई एक महिला नेता के प्यार से मणिपुर के लोगों को इतनी शर्मिंदगी क्यों होनी चाहिए? भारत के समाज में प्यार या औरत-मर्द के किसी भी किस्म के संबंधों को लेकर लोगों के बीच बहुत अधिक संवेदनशीलता साधारण लोगों के बीच तो दिखती है लेकिन जागरूक समाज आमतौर पर इससे ऊपर उठ जाता है और जो लोग एक राजनीतिक-सामाजिक चेतना को लेकर एक लंबा लोकतांत्रिक आंदोलन चलाते हैं उन्हें तो अधिक चीजों को बर्दाश्त करने की आदत होनी चाहिए।
लेकिन इस साधारण तर्क के पीछे मणिपुर के बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि भारत का यह उत्तर-पूर्वी राज्य एक ऐसे सौतेले बच्चे की तरह है जिस पर कि दिल्ली की नजर नहीं पड़ती और इस भारतमाता की बाकी राष्ट्रवादी संतानों को भी यह मणिपुर इस देश का हिस्सा नहीं लगता है। इसीलिए जो कैमरे रामलीला मैदान पर मानो वेल्डिंग से कस दिए गए थे, वे कैमरे अस्पताल के बिस्तर पर जारी आमरण अनशन के दसवें बरस पर भी फोकस नहीं कर पाते। यही वजह है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों हों या फिर कश्मीर हो, भारत के कई सरहदी सूबे अपने-आपको इस देश की मुख्यधारा से बाहर रखा हुआ पाते हैं। यह सिलसिला देश की फौजी हिफाजत के लिए भी खतरनाक है लेकिन उससे भी परे हम यह मानते हैं कि यह विशाल लोकतंत्र अगर दिल्ली के इर्दगिर्द के इलाके को ही विशाल लोकतंत्र मानकर चलता रहेगा तो किनारे के राज्य अपने को सौतेला ही पाते रहेंगे। अगर इस देश के कमजोर तबके अपने-आपको दिल्ली की सल्तनत की जूतियों तले पाते रहेंगे तो उनका भावनात्मक और उत्पादक योगदान इस देश को कभी पूरी तरह नहीं मिल पाएगा। इसका एक दूसरा बड़ा नुकसान यह है कि जिन मुद्दों पर एक राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए, उन तमाम मुद्दों पर ऐसे उपेक्षित राज्य एक निहायत क्षेत्रीय या प्रांतीय सोच तक सीमित रह जाते हैं। इसके लिए सिर्फ दिल्ली जिम्मेदार है।
आज अगर मणिपुर के आंदोलनकारी यह मान रहे कि शर्मिला की मोहब्बत की खबरें दिल्ली सरकार की साजिश के तहत छप रही हैं तो हमारा यह मानना है कि ऐसी गलतफहमी को पैदा होने से रोकने के लिए दिल्ली की सरकार ने बहुत कम किया है, और बहुत बुरी तरह नाकामयाब रही है। यह सिलसिला बदलना चाहिए और यह भी याद रखने की जरूरत है कि चीन की सरहद पर अरूणाचल के मुख्यमंत्री कुछ महीने पहले जब एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे तो भी वहां के लोगों को यह लगा था कि क्या अगर भारत के किसी बीच के बड़े राज्य का मुख्यमंत्री हादसे का ऐसा शिकार हुआ होता तो भी क्या भारत की सेना और भारत के उपग्रह उसे तलाश करने में ऐसे ही चार दिन लगाते? हम इस शक को बेबुनियाद मानते हैं लेकिन ऐसा शक होने के पीछे की वजहों को जायज मानते हैं। भारतीय लोकतंत्र की मूलधारा में अगर किनारे के राज्यों को जोड़ा नहीं गया तो लोगों की ऐसी सोच बनी ही रहेगी। आज मणिपुर से लेकर कश्मीर तक की भावनाओं को समझने की जरूरत है।
मणिपुर में दस-ग्यारह बरस से आमरण अनशन कर रही शर्मिला की मोहब्बत की कहानी आज पहले पन्ने पर छप रही है जिसे लेकर इसे छापने वाले अखबार को मणिपुर के बाहर भी रोक दिया गया है। वहां पर सेना के विशेष अधिकारों वाले कानून को खत्म करने के लिए जो आंदोलन चल रहा है उसके लोगों का मानना है कि एक ब्रिटिश पत्रकार के साथ शर्मिला के प्रेम-प्रसंग की खबरें इस आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से छपवाई जा रही हैं। हालांकि इस प्यार की बात को खुद शर्मिला ने अपने इंटरव्यू में सही बताया है और यह जानकारी दी है कि अपने पे्रमी से उसकी शादी राज्य में यह कानून खत्म हो जाने के बाद ही हो सकती है। अन्ना हजारे के जैसे अनशन के ग्यारह दिन में देश का मीडिया बावला हो गया था, वैसा अनशन अस्पताल के बिस्तर पर भी शर्मिला ग्यारह बरस से कर रही है और आने वाले नवंबर में बारहवां साल शुरू हो जाएगा।
हमें मणिपुर के आंदोलकारियों के इस ताजा प्रतिबंध के पीछे बहुत समझदारी इसलिए नहीं दिखती है कि आंदोलन के नेता के एक स्वाभाविक और पूरी तरह कानूनी प्यार से इस आंदोलन को क्यों कोई नुकसान पहुंचना चाहिए? भारत के कुछ हिस्सों में तो अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच प्यार और शादी को लेकर कत्ल तक की नौबत आती है लेकिन बारह बरस से आंदोलन पर बैठी हुई एक महिला नेता के प्यार से मणिपुर के लोगों को इतनी शर्मिंदगी क्यों होनी चाहिए? भारत के समाज में प्यार या औरत-मर्द के किसी भी किस्म के संबंधों को लेकर लोगों के बीच बहुत अधिक संवेदनशीलता साधारण लोगों के बीच तो दिखती है लेकिन जागरूक समाज आमतौर पर इससे ऊपर उठ जाता है और जो लोग एक राजनीतिक-सामाजिक चेतना को लेकर एक लंबा लोकतांत्रिक आंदोलन चलाते हैं उन्हें तो अधिक चीजों को बर्दाश्त करने की आदत होनी चाहिए।
लेकिन इस साधारण तर्क के पीछे मणिपुर के बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि भारत का यह उत्तर-पूर्वी राज्य एक ऐसे सौतेले बच्चे की तरह है जिस पर कि दिल्ली की नजर नहीं पड़ती और इस भारतमाता की बाकी राष्ट्रवादी संतानों को भी यह मणिपुर इस देश का हिस्सा नहीं लगता है। इसीलिए जो कैमरे रामलीला मैदान पर मानो वेल्डिंग से कस दिए गए थे, वे कैमरे अस्पताल के बिस्तर पर जारी आमरण अनशन के दसवें बरस पर भी फोकस नहीं कर पाते। यही वजह है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों हों या फिर कश्मीर हो, भारत के कई सरहदी सूबे अपने-आपको इस देश की मुख्यधारा से बाहर रखा हुआ पाते हैं। यह सिलसिला देश की फौजी हिफाजत के लिए भी खतरनाक है लेकिन उससे भी परे हम यह मानते हैं कि यह विशाल लोकतंत्र अगर दिल्ली के इर्दगिर्द के इलाके को ही विशाल लोकतंत्र मानकर चलता रहेगा तो किनारे के राज्य अपने को सौतेला ही पाते रहेंगे। अगर इस देश के कमजोर तबके अपने-आपको दिल्ली की सल्तनत की जूतियों तले पाते रहेंगे तो उनका भावनात्मक और उत्पादक योगदान इस देश को कभी पूरी तरह नहीं मिल पाएगा। इसका एक दूसरा बड़ा नुकसान यह है कि जिन मुद्दों पर एक राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए, उन तमाम मुद्दों पर ऐसे उपेक्षित राज्य एक निहायत क्षेत्रीय या प्रांतीय सोच तक सीमित रह जाते हैं। इसके लिए सिर्फ दिल्ली जिम्मेदार है।
आज अगर मणिपुर के आंदोलनकारी यह मान रहे कि शर्मिला की मोहब्बत की खबरें दिल्ली सरकार की साजिश के तहत छप रही हैं तो हमारा यह मानना है कि ऐसी गलतफहमी को पैदा होने से रोकने के लिए दिल्ली की सरकार ने बहुत कम किया है, और बहुत बुरी तरह नाकामयाब रही है। यह सिलसिला बदलना चाहिए और यह भी याद रखने की जरूरत है कि चीन की सरहद पर अरूणाचल के मुख्यमंत्री कुछ महीने पहले जब एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे तो भी वहां के लोगों को यह लगा था कि क्या अगर भारत के किसी बीच के बड़े राज्य का मुख्यमंत्री हादसे का ऐसा शिकार हुआ होता तो भी क्या भारत की सेना और भारत के उपग्रह उसे तलाश करने में ऐसे ही चार दिन लगाते? हम इस शक को बेबुनियाद मानते हैं लेकिन ऐसा शक होने के पीछे की वजहों को जायज मानते हैं। भारतीय लोकतंत्र की मूलधारा में अगर किनारे के राज्यों को जोड़ा नहीं गया तो लोगों की ऐसी सोच बनी ही रहेगी। आज मणिपुर से लेकर कश्मीर तक की भावनाओं को समझने की जरूरत है।
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