अलग-अलग नस्ल, अलग-अलग रेट

26 सितंबर 2011
सुनील कुमार
अमरीका के कैलिफोर्निया में जिस जाने-माने और चर्चित बर्कले शहर और विश्वविद्यालय में मुझे पिछले तीन बरसों में दो बार जाने का मौका मिला वहां इन दिनों एक नया विवाद छिड़ा हुआ है। जिन लोगों ने मेरी अमरीका यात्रा के संस्मरण पढ़े होंगे उन्हें इस शहर के बारे में याद होगा कि किस तरह जुड़े हुए सानफ्रांसिस्को अब इस बर्कले में एक वक्त हिप्पी आंदोलन शुरू हुआ था, यहीं पर परमाणु विरोध का आंदोलन शुरू हुआ था, किस तरह विश्वविद्यालय में पेड़ों को कटने से बचाने के लिए वहां के लड़के-लड़कियां महीनों तक उन पेड़ों पर ही बस गए थे। अमरीका के भीतर कैलिफोर्निया का यह हिस्सा खासे वामपंथी रूझान का माना जाता है और यह अपने उग्र आंदोलनों के लिए इतिहास में अच्छी तरह दर्ज भी है। तीन बरस पहले इन्हीं दिनों जब बर्कले विश्वविद्यालय में भारत के लोकतंत्र पर हुए एक सेमिनार में छत्तीसगढ़ के उस वक्त के पुलिस प्रमुख विश्वरंजन एक वक्ता थे और एक दूसरे वक्ता के रूप में मैं यह देख रहा था कि बिनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ वहां किस तरह सैकड़ों नौजवान सेमिनार के भीतर ही प्रदर्शन कर रहे थे।
ऐसे बर्कले में इन दिनों जाहिर है कि वामपंथी रूझान के ठीक खिलाफ भी एक विचारधारा मौजूद होगी। अमरीका की जातिवादी व्यवस्था भारत की मनुवादी-ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था से कुछ अलग है और वह नस्लवादी है, जिसमें दुनिया के अलग-अलग इलाकों से आई हुई नस्लों के लोगों के बीच एक सामाजिक-आर्थिक तनाव, टकराव और अंतरसंबंध चलते रहते हैं। अभी वहां छात्रों के एक समूह ने बेकरी के कुछ सामानों को एक प्रतीक के रूप में एक अलग तरीके से बेचने का आंदोलन शुरू किया है। इसे वे 'विविधता बढ़ाओÓ आंदोलन कह रहे हैं और यहां पर डबलरोटी जैसे साधारण सामानों को बेचने के रेट खरीददारों की नस्लों के आधार पर कम या अधिक तय किए गए हैं। इनमें सभी नस्लों की महिलाओं को एक अलग दर्जा दिया गया है।
दरअसल बर्कले विश्वविद्यालय सहित कैलिफोर्निया के बाकी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए एक नए नियम को लागू करने की तैयारी चल रही है और यह अभी वहां के गवर्नर के पास विचार के लिए रखा हुआ है। इसके तहत विश्वविद्यालय नस्ल, सेक्स, जाति, राष्ट्रीय या भौगोलिक इलाके के आधार पर दाखिला देते समय भेदभाव कर पाएगा।
यह नया आंदोलन छेडऩे वाले लोग अमरीका की संकीर्णतावादी, विविधता-विरोधी समझी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक हैं और उनका मानना है कि प्रतिभा के आधार पर दाखिला देने के बजाय अगर नस्ल के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो वह नस्लवादी होगा। ये लोग इसे एक व्यंग्य के रूप में समाज के सामने पेश कर रहे हैं जिसमें श्वेत लोगों के लिए बेकरी का कोई सामान अगर दो डॉलर का होगा, तो वही सामान एशियाई लोगों के लिए डेढ़ डॉलर का होगा, अफ्रीकन-अमेरिकन के लिए पौन डॉलर का, अमरीका के मूलनिवासियों (आदिवासियों) के लिए चौथाई डॉलर का होगा और सभी महिलाओं को इन रेट्स पर चौथाई डॉलर की अतिरिक्त छूट मिलेगी।
इन आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं ने कहा है कि अगर उनके इस आंदोलन को नस्लवादी करार देते हुए लोग इसे कोस रहे हैं, तो इससे भेदभाव की तरफ ध्यान खींचने का उनका मकसद पूरा हो रहा है।
इंटरनेट पर फेसबुक पर इस आंदोलन के लिए बनाए गए पेज पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक अश्वेत छात्र ने लिखा कि यह पूरा सिलसिला उसके लिए बहुत ही चिड़चिड़ाहट  पैदा करने वाला है क्योंकि उसके आसपास के लोग चाहते हैं कि वह उनके लिए सस्ते में सामान खरीदकर दे।
जब इस आंदोलन को हम भारत के आज के हाल से जोड़कर देखते हैं तो ध्यान पड़ता है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के खिलाफ दलित उठकर खड़े हुए थे और उन्होंने अन्ना के आंदोलन को ब्राम्हणवादी, दलित-विरोधी करार दिया था। इसी अखबार में अन्ना के आंदोलन के और पहले से जब लोकपाल मसौदा कमेटी बनी, तब से हमारे लिखे हुए संपादकीय लोगों ने पढ़े होंगे जिनमें हमने इस बात का कड़ा विरोध किया था कि इस कमेटी में सामाजिक आंदोलनकारियों के नाम पर न सिर्फ एक ही टोली के पांच लोगों को ले लिया गया था बल्कि इनमें दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और महिलाओं को कोई जगह नहीं दी गई थी। इसके खिलाफ हमने बार-बार लिखा और अन्ना-टोली के तौर-तरीकों को गांधीवाद विरोधी भी कहा था।
समाज में समानता को देखने के अलग-अलग नजरिए होते हैं। कुछ लोगों को बराबरी का मौका समानता लग सकता है और कुछ लोगों को यह लग सकता है कि बराबरी के मौके के इस्तेमाल के लायक जब तक सब लोगों को बराबर से नहीं पहुंचाया जा सकेगा तब तक समानता नहीं आएगी। इसलिए भारत में आरक्षण की व्यवस्था की गई ताकि हजारों बरस से जिन तबकों के लोग एडिय़ों तले कुचलकर रखे गए हैं, उनके बच्चों को आज के भारतीय समाज के मुकाबले में शामिल होने लायक तो बनाया जा सके। इसके लिए अलग-अलग तबकों को अलग-अलग तरह के आरक्षण के फायदे दिए गए जो कि संविधान के पहले अंदाज के बरस पूरे हो जाने तक भी कमजोर तबकों को नहीं मिल पाए।
आरक्षण की तैयारी के खिलाफ अमरीका में संकीर्णतावादी लोगों में जो यह प्रतीकात्मक आंदोलन शुरू किया है, इससे वहां आरक्षण की जरूरत और नस्लवाद पर एक बहस छिड़ी है। इससे एक दूसरी बात जो मुझे याद पड़ती है वह कोई बीस बरस पहले की है जब विश्वनाथ प्रताप सिंह मेरे शहर आए थे। उस वक्त शायद वे प्रधानमंत्री नहीं रह गए थे। उनको इंटरव्यू करते समय जब यह पूछा गया कि मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर जब जातिवाद पर पूरे देश में एक बहस छिड़ी तो क्या उससे एक खत्म हो चुके बहस के मुद्दे को फिर से जिंदगी नहीं मिली? तो उनका कहना था कि जातिवाद किसी तरह से खत्म नहीं हुआ है और 'जाति-व्यवस्था के पीछे तो निहित हिंसा है, निहित अन्याय है वह हजारों वर्ष से है। लेकिन जूता पहने हुए कभी याद नहीं आता कि जूता भी है। जिसका अंगूठा दबता है उसे याद आता है कि अंगूठा भी है, उसे ही जूता दिखता है, अब जाति-व्यवस्था से जो लोग कभी दबे नहीं हैं उनका लगता है जाति-व्यवस्था है ही नहीं। तो जो जाति-व्यवस्था के तले दबे हैं उन्हें रोज याद आता है कि वे दबे हैं लेकिन वे मुखर नहीं हैं इसलिए लगता है कि जाति-व्यवस्था लोप हो गई है।Ó
वीपी सिंह से वह एक लंबी बातचीत थी जिसकी बातें आज भी पढऩे और सोचने लायक हैं क्योंकि जब सत्ता की किसी अहमियत वाली, मायने रखने वाली बस पर सवार होने की बात आती है तो अन्ना की टोली को पांचों गैरदलित, गैरआदिवासी, गैरअल्पसंख्यक और गैरमहिला सदस्य कूदकर बस पर सवार हो जाते हैं और एक जोड़ी बाप-बेटे भी एक ही पेशे से आए हुए दो सीटों पर काबिज हो जाते हैं, बिना यह फिक्र किए कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस विशाल विविधता वाले देश में हर कमजोर तबके से उनके जैसे काबिल पाए और लाए जा सकते हैं।
अमरीका में पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा के आने से वहां की अश्वेत जनता की जिंदगी पर उतना ही फर्क पड़ा है जितना कि उत्तरप्रदेश में एक दलित की बेटी के मुख्यमंत्री बनने से या वहीं की एक दलित महिला के लोकसभा अध्यक्ष बनने से वहां की दलित महिलाओं की जिंदगी पर पड़ा है, वे पहले के मुकाबले अधिक बड़ी संख्या में बलात्कार झेल रही हैं और बलात्कार के बाद उन्हें जला भी दिया जा रहा है। इसलिए अलग-अलग नस्लों को अलग-अलग रेट पर डबलरोटी बेचने का प्रतीकात्मक व्यंग्य भारत में बिना दूकान लगाए भी मजबूत तबकों के लोगों की जुबान से लगातार झड़ते-बरसते रहता है। यहां पर उसके लिए किसी दूकान लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

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