बाहुबल से उपजी बददिमागी

18 सितंबर 2011
गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सद्भावना मिशन के नाम से तीन दिन का सरकारी उपवास शुरू करके और बातों के साथ-साथ इतना तो साबित कर ही रहे हैं कि सत्ता पर काबिज इंसान कुछ भी कर सकते हैं। जिसे गुजरात में सत्ता के इशारे पर हजारों बेकसूर मुसलमानों को मार डाले जाने पर अफसोस भी गैरजरूरी लगता हो वह अब उपवास पर बैठा है। लेकिन सत्ता और भी कई किस्मों की बददिमागी करवाती है। हम इसकी मिसालें देखते हैं तो लगता है कि क्या कुर्सी पर बैठे हुए लोगों को यह अहसास ही नहीं रह जाता कि इस पर वे पूरी जिंदगी के लिए नहीं बैठे हैं? और यह बात हम दुनिया के तानाशाहों को लेकर नहीं कर रहे, लोकतांत्रिक संविधान के तहत  कुल पांच बरस के लिए चुनाव जीतकर आने वाले लोगों के बारे में कह रहे हैं।
कुछ ही वक्त पहले ऐसी खबर आई थी कि उत्तरप्रदेश की दलित-महिला मुख्यमंत्री मायावती के सैंडिल लाने के लिए विशेष विमान लखनऊ से मुंबई भेजा गया था। यह बात अमरीकी कूटनीतिज्ञों ने दिल्ली से अमरीका भेजे गए अपने गोपनीय संदेश में लिखी थी। इस बात में कितना सच है इसको परखे बिना लोग इस पर भरोसा करने को मजबूर इसलिए हैं क्योंकि एक दलित की इस बेटी ने अपने बुत खड़े करने के लिए सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए झोंक दिए। ऐसी ही बददिमागी इसी उत्तरप्रदेश में समाजवादी-लोहियावादी, अपने-आपको पिछड़े वर्ग का गांव का किसान कहने वाले मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री रहते हुए दिखाई थी जब उन्होंने अपने गांव में ऐसी हवाई पट्टी बनवाई थी जिस पर कि कोई बड़ा विमान भी उतर सके। ऐसी ही बददिमागी कुनबापरस्ती के मामले में, भ्रष्टाचार के मामले में लालू यादव ने बिहार में पन्द्रह बरस तक दिखाई और लालू या बिहार, इनमें से किसने अधिक खोया यह अंदाज लगाना आज भी मुश्किल है। ऐसी ही बददिमागी कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने दिखाई जिन्होंने खुला भ्रष्टाचार किया और लोकायुक्त रिपोर्ट के मुताबिक सोलह हजार करोड़ रूपए की चोरी भी उनके कार्यकाल के साथ, उनके मंत्रियों के नाम जुड़ी। ऐसी ही बददिमागी महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख या अशोक चव्हाण ने दिखाई, जिनके नाम आदर्श सोसायटी घोटाला जैसे मामलों से जुड़े और कांगे्रस की यह मजबूरी हो गई थी कि इन्हें बदला जाए। झारखंड में तो रिश्वत, भ्रष्टाचार, दलबदल, सत्तापलट, ऐसे तमाम कामों के लिए बहुत से नेताओं और पार्टियों ने ऐसी बददिमागी दिखाई कि जनता के सामने उन्हें कभी दुबारा जाना ही न हो।
लेकिन राजनीति से जरा हटकर बात करें तो पिछले महीनों में अन्ना हजारे और उनके साथियों ने जो बददिमागी दिखाई उसने सत्ता की बददिमागी को भी मात कर दिया और यह साबित किया कि ताकत कहीं भी हो उसका मिजाज सिर चढ़ जाने का होता है। हम मुंबई में मुकेश अंबानी के निजी मकान की आसमान छूती इमारत को याद करते हैं जिससे लेकर रतन टाटा ने भी एक इंटरव्यू में कुछ महीने पहले यह कहा था कि उन्हें समझ नहीं पड़ता कि किसी को इतने बड़े घर की क्या जरूरत पड़ती है। लेकिन लोकतंत्र और उदार अर्थव्यवस्था में यह तो हर किसी का हक है कि वह अपने पर कितना खर्च करे। इस सिलसिले में इस मुद्दे से हटी हुई एक दूसरी बात हमें यहां याद पड़ती है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कल ही एक ऐसे नए टैक्स ढांचे की वकालत की है जिसमें हर बरस दस लाख डॉलर से अधिक कमाने वाले लोगों पर एक न्यूनतम टैक्स ऐसा लगाया जाए जिसे ओबामा बफेट-टैक्स का नाम दे रहे हैं। अमरीका के अरबपति व्यवसायी वारेन बफेट के सुझाए हुए इस प्रस्ताव का कहना है कि करों के ढांचे में विसंगतियों के चलते धनाड्य वर्ग के लोग अपेक्षाकृत कम टैक्स भरते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निवेश से होने वाली आमदनी पर नौकरी से मिलने वाले वेतन की तुलना में कम टैक्स लगता है। दौलत की ताकत को कम करने के लिए वारेन बफेट और बिल गेट्स जैसे लोग लगातार कई तरह की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन भारत में हम देखते हैं कि लोग धर्म के अलावा बहुत कम ही जगहों पर अपनी कमाई का कोई निर्धारित हिस्सा देते हों।
एक दूसरी छोटी सी खबर यह है कि दुनिया में बिकने वाले बोर्ड पर खेले जाने वाले खेलों में सबसे अधिक बिक्री व्यापार में एकाधिकार सिखाने वाले खेल मोनोपोली की है जिसे कि हिंदी-भारत में व्यापार नाम से जाना जाता है। यह व्यापार में एकाधिकार से मिलने वाले फायदों को बच्चों के दिमाग में शुरू से भरते चलता है। इसके साथ एक दूसरी खबर यह है कि दुनिया के सबसे रईस चार सौ लोगों के पास जितनी दौलत है उतनी दौलत दुनिया के सबसे गरीब चार सौ करोड़ लोगों के पास मिलाकर भी नहीं है। यह गैरबराबरी किसी किस्म की बददिमागी खड़ी करती है जैसी बददिमागी अपने राज्य में हजारों हत्याओं के लिए आरोपों से घिरे मुख्यमंत्री की दिखती है, या अपनी प्रतिमाएं खड़ी करवाने वाली एक दलित की बेटी की दिखती है। जिस जनतंत्र में तंत्र पर काबिज नेता का जनता से हकों का फासला इतना अधिक हो जाता है वहां पर बददिमागी बढ़ती चलती है और वह लोकतंत्र को भावना से लेकर शब्दों तक हर किस्म से मिटाते जाती है। एकाधिकार सत्ता का हो या व्यापार का, सामाजिक आंदोलन द्वारा या अखबार का, बहुत अधिक ताकत एक हाथ में आ जाने से लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। यह बात ठीक है कि व्यापार पर काबू के लिए बने लायसेंस-परमिट राज के अपने खतरे और नुकसान भारत ने भुगते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उदारवादी अर्थव्यवस्था के नाम पर आज दुनिया के बहुत से देशों में जैसी आर्थिक तानाशाही बिना किसी सामाजिक जवाबदेही के खड़ी हो चुकी हैं, उनके खतरे कम नहीं हैं।
इस पूरी चर्चा का एक मकसद यह है कि जिस तरह एक बीज पौधा बनकर आसमान की तरफ खड़ा होता है, उसी तरह एक सीमा से अधिक बढ़ी हुई ताकत इंसान के सिर की तरफ बढऩे लगती है, वहां पहुंच ही जाती है। इसलिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि इस नौबत को कैसे रोका जाए? लोकतंत्र तो हर किसी के ताकत के ऐसे बड़े गोदाम बनाने की छूट देता है, लेकिन ऐसा विकराल आकार लोकतंत्र को भी खत्म करने लगता है। चलते-चलते आखिरी में यह बात अधूरी रह जाएगी अगर हम प्रधानमंत्री की हैसियत से राजीव गांधी के बूटों तले शाहबानो नाम की एक बूढ़ी मुस्लिम महिला को कुचलना याद न करें। संसद के भीतर जब कांगे्रस का बाहुबल किसी पहलवान को मात कर रहा था तो उस ताकत का सबसे बेशर्म और बददिमाग इस्तेमाल कांगे्रस ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ कानून बनाने में किया था जो शाहबानो को हक देता था। अब कुछ चुनिंदा बाहों पर मांसपेशियां इतनी अधिक जुट जाने के खिलाफ लोकतंत्र के भीतर क्या किया जा सकता है, यह राह तलाशने की भी जरूरत है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें