23 सितंबर केरल के मुख्यमंत्री ओमेन चांडी अभी हैदराबाद पहुंचे तो वहां का मीडिया यह देखकर हक्का-बक्का रह गया कि उनकी कमीज फटी हुई थी और एक बटन भी गायब थी जिसकी जगह पिन लगी हुई थी। हैदराबाद के मीडिया को नेताओं की ऐसी सादगी देखने की आदत रह नहीं गई है क्योंकि वहां एक तरफ तो जगन मोहन रेड्डी का साम्राज्य मुगल बादशाहों को टक्कर देते दिखता है और दूसरी तरफ लगे हुए कर्नाटक के दूसरे रेड्डी बादशाह अपने राज्य से लेकर आंध्र तक अवैध खुदाई और रंगदारी में दसियों हजार करोड़ का साम्राज्य बना चुके हैं। ऐसे में अपने साधारण कपड़ों से भी बेफिक्र एक राज्य का मुख्यमंत्री हैदराबाद को कुछ अटपटा लग रहा था। लेकिन जैसा कि राजनीति में हर तस्वीर के दो पहलू हो सकते हैं, कुछ का कहना है कि ओमेन चांडी की जिंदगी ऐसी ही सादगी और लापरवाही की है, कुछ का कहना है कि वे घर से खुद के कपड़े फाड़कर, बटन तोड़कर निकलते हैं ताकि जनता के बीच उनकी तस्वीर एक गरीब, ईमानदार की बन सके।
अभी हम चांडी के सच पर जाने के बजाय यह सोच रहे हैं कि सार्वजनिक जीवन में जनता के पैसों पर सरकारी कुर्सियों पर रहने वाले लोग अपने बर्ताव और अपने तौर-तरीकों को कैसा रखें? लोकतंत्र में जिस गांधी का नाम लेकर यह देश अपने को एक महान विरासत का वारिस बताता है, उस गांधी की सादगी किसी कोने में धर दी गई है और उस कमरे को ताला डालकर उस पर सरकारी सील लगा दी गई है कि कहीं वह सादगी सामने आकर मुंह न चिढ़ाने लगे। पूरे देश में हम नेताओं को, अफसरों को और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को इस गरीब जनता के पैसों पर इस कदर ऐश करते देखते हैं कि लगता है कि गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले लोगों के मन में किस कदर नफरत नहीं पनपी हुई होगी? सत्ता के सीधे बेजा इस्तेमाल और सत्ता की ताकत से अपने दो नंबरी से लेकर दस नंबरी तक के कारोबार बढ़ाने वाले राजनीतिक-कारोबारी बहुत ही अश्लील और हिंसक तरीके से अपनी दौलत की नुमाइश करते हैं।
कुछ लोग जो एक मिसाल की तरह दिखते हैं, और हम आज तक की ही बात कर रहे हैं, हो सकता है कि आने वाले दिनों में वे भी भ्रष्ट साबित हो जाएं, उनमें चांडी के ही केरल के एक दूसरे कांगे्रसी केंद्रीय मंत्री ए.के. एंटोनी का नाम है, जो सादगी से जीते हैं और ईमानदार माने जाते हैं। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के बेटे के बारे में हमारी निजी जानकारी है कि वह दिल्ली में विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए बस और मेट्रो से आना-जाना करता है और गरीबी के अंदाज में जीता है। कुछ ऐसे अफसर हमारी जानकारी में हैं जो अपने घर-दफ्तर पर सरकार का कोई खर्च नहीं करते और सादगी से जीते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जनता के पैसों पर ढेरों फिजूलखर्ची करने वाले अफसर भी हर किसी के सामने रहते हैं।
सूचना के अधिकार के तहत जानकारी पाने में लगे हुए लोगों को जनता के पैसों की बर्बादी के बारे में लगातार खोजबीन करनी चाहिए और ऐसी जानकारी को लेकर आगे लड़ाई लडऩी भी चाहिए। लेकिन जो बात हमें अधिक परेशान करती है वह है चुनाव के रास्ते नेतागिरी और कारोबार में ऊपर पहुंचने वाले नेताओं के दौलत के हिंसक प्रदर्शन की। चुनाव लडऩे वाले नेता दस-दस, बीस-बीस लाख रूपयों की घडिय़ां पहनते हैं, पचास लाख की गाड़ी में घूमते हैं और पचीस-पचास करोड़ की कोठियां बनवाकर उनमें रहते हैं। वे किस तरह इस पूरे सिलसिले के अपराध से अपने दिल-दिमाग को परे रख पाते हैं यह सोचना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन यह सोचना ही मुश्किल होता है, उनके लिए ऐसा करना शायद जरा भी मुश्किल नहीं होता और एक चोर की मिसाल दूसरे चोर के लिए काम आती है, सरकारी बेजा इस्तेमाल का एक मामला दूसरों के लिए परंपराएं खड़ी कर देता है। इस देश में वामपंथियों के अलावा कोई ऐसी पार्टी नहीं दिखती जो कि पार्टी के स्तर पर सादगी, किफायत और ईमानदारी पर पूरा अमल करती हो। देश की राजधानी दिल्ली में वामपंथी दलों के सांसदों को जो मकान मिलते हैं उनमें अनिवार्य रूप से उनकी पार्टी के संगठन के दफ्तर भी चलते हैं और सांसदों को मकान का एक हिस्सा ही इस्तेमाल करने दिया जाता है। यह बात भी शायद बहुत से पाठकों को न मालूम हो कि वामपंथी सांसदों को संसद से मिलने वाली तनख्वाह पूरी की पूरी पार्टी के फंड में जमा हो जाती है और वहां से उन्हें उतना ही महीना मिलता है जितना कि उस पार्टी के किसी फुलटाईम कार्यकर्ता को मिलता है। जिस गांधी से वैचारिक रूप से वामपंथी बहुत करीब नहीं थे, आज वे ही वामपंथी गांधी की सादगी, किफायत और ईमानदारी का झंडा उठाकर चलते हैं, वैसी जिंदगी जीते हैं। दूसरी तरफ अपने आपको गांधी की औलाद साबित करने के लिए डीएनए रिपोर्ट लेकर घूमने वाले कांगे्रसियों को देखें, या आरएसएस की तखत पर सोने वाली सादगी को देखें, न भाजपा के नेता न कांगे्रस के नेता किसी सादगी में भरोसा रखते और न ही जनता के पैसों की फिजूलखर्ची से परहेज करते। नतीजा यह है कि उनके मातहत काम करने वाले सरकारी अफसर भी नौकरशाह की तरह शाही फिजूलखर्ची करते हैं। और यह देश बत्तीस रूपए रोज पर जीने वालों को गरीब न मानने वाला देश है।
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